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देरी पर बीमा का दावा हो सकता है खारिज : शीर्ष न्यायालय

अदालत से
एम जे एंटनी /  September 02, 2018

उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि अगर बीमा का दावा देर से किया गया है तो बीमा कंपनी की तरफ से नुकसान के आकलन के लिए सर्वेयर नियुक्त करने के बावजूद दावा खारिज किया जा सकता है। नुकसान के आकलन के लिए सर्वे की प्रक्रिया शुरू करने का यह मतलब नहीं है कि बीमा कंपनी ने दावा करने की समयसीमा में राहत दे दी है। सर्वोच्च न्यायालय ने सॉनेल क्लॉक्स ऐंड गिफ्ट्स लिमिटेड बनाम न्यू इंडिया एश्योरेंस वाद में दिए अपने फैसले में कहा है कि सर्वेयर की नियुक्ति से दावाकर्ता की तरफ से की गई देरी की अनदेखी नहीं होती है। इस मामले में बीमित संयंत्र और उसकी मशीनें बाढ़ में तबाह हो गई थीं। कंपनी ने चार महीनों के बाद क्षतिपूर्ति का दावा किया जिसके बाद सर्वेयर नियुक्ति किया गया। लेकिन सर्वेयर ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि दावे में देरी होने से नुकसान का सटीक आकलन नहीं किया जा सकता है। इस आधार पर दावे को खारिज कर दिया गया। जब प्रभावित कंपनी ने इसे राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग में चुनौती दी तो उसने भी देरी के चलते दावा खारिज करने को सही ठहराया। सॉनेल ने उच्चतम न्यायालय में दायर अपनी अपील में कहा कि सर्वे के लिए तैयार होने के बाद दावे में देरी का कोई मतलब नहीं रह गया। इस पर बीमा कंपनी ने कहा कि बीमा सर्वेयर एवं क्षति आकलनकर्ता नियम के तहत वह सर्वेयर नियुक्त करने के लिए बाध्य थी। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि दावे को विलंब एवं अन्य वजहों से खारिज ही नहीं किया जा सकता है। इस पर उच्चतम न्यायालय ने कहा कि यहां मामला तकनीकी न होकर केंद्रीय विषय है लिहाजा दावे में देरी से बीमा की क्षति का नतीजा भुगतना होगा।

 
हिमाचल में पूरे 10 साल के लिए कर छूट नहीं मिलेगी
 
उच्चतम न्यायालय ने हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के फैसले को पलटते हुए कहा है कि इस पर्वतीय राज्य में इकाइयां लगाने वाले उद्योग 10 साल के लिए कर छूट का दावा नहीं कर सकते हैं। इन उद्योगों ने कहा था कि इस अवधि में अपना विस्तार करने के नाते उन्हें कर छूट मिलनी चाहिए। हिमाचल और सिक्किम जैसे पर्वतीय राज्यों में उद्योगों को आकर्षित करने के लिए 2004 में जोड़ी गई आयकर अधिनियम की धारा 80-आईसी की व्याख्या करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि अलग राज्यों के लिए अलग प्रावधान लागू होते हैं। हिमाचल में उद्योगों को 5 साल के लिए कर अदायगी से पूरी छूट मिली हुई है जबकि अगले 5 साल तक उन्हें 25 फीसदी कर छूट मिलती है। कई कंपनियों ने कहा कि उन्हें पूरे 10 साल के लिए कर अदायगी से पूरी छूट मिलनी चाहिए क्योंकि इस दौरान उन्होंने अपनी इकाइयों का विस्तार किया है। अधिकरणों और उच्च न्यायालय ने भी इस दलील पर हामी भरी थी लेकिन उच्चतम न्यायालय ने इसे नकार दिया है। आयकर आयुक्त बनाम क्लासिक बाइंडिंग इंडस्ट्रीज वाद पर सुनाए अपने फैसले में शीर्ष न्यायालय ने कहा है कि हिमाचल में लगी इकाइयां पूरे 10 साल के लिए 100 फीसदी कर राहत का दावा नहीं कर सकती हैं लेकिन उन्हें इस अवधि के दूसरे 5 वर्षों में 25 फीसदी रियायत मिलेगी।
 
मध्यस्थता पर अपील में प्रक्रियागत छूट देनी होगी
 
मध्यस्थता अधिकरण के फैसले को दरकिनार करने के लिए दायर अपील संक्षिप्त प्रक्रिया है लिहाजा इसके निपटारे में देर नहीं की जानी चाहिए। उच्चतम न्यायालय ने एम्के ग्लोबल फाइनैंस लिमिटेड बनाम रिधर सोंढी मामले में कहा है कि आरोप तय करने और मौखिक साक्ष्य दर्ज करने के नियम का हवाला देते हुए इस अपील के निपटान में देरी नहीं होनी चाहिए। विवादों के समाधान में तेजी लाने के लिए मकसद से ही मध्यस्थता एवं मेलमिलाप अधिनियम लाया गया है। मध्यस्थता अधिकरण के फैसले को चुनौती देने वाली अर्जी दायर होने के बाद उसका निपटारा उन्हीं साक्ष्यों के आधार पर होना चाहिए जिसके आधार पर मध्यस्थ ने अपना फैसला सुनाया था। न्यायालय ने कहा है कि अगर नए साक्ष्यों की जरूरत महसूस होती है तो हलफनामों के जरिये उन्हें पेश करने को कहा जा सकता है। जब तक बहुत जरूरी न हो, तब तक जिरह की भी इजाजत नहीं दी जा सकती है। नैशनल स्टॉक एक्सचेंज के साथ पंजीकृत एक ब्रोकर और उसके एक ग्राहक के बीच शेयरों एवं प्रतिभूतियों के लेनदेन को लेकर हुए विवाद के बाद यह मामला मध्यस्थता के लिए गया था। इस फैसले को खारिज करने के लिए दायर अर्जी पर दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्णय को भी सर्वोच्च अदालत ने निरस्त कर दिया है।
 
ग्रैच्युटी को स्वत: जब्त नहीं कर सकता नियोक्ता
 
उच्चतम न्यायालय ने व्यवस्था दी है कि नियोक्ता किसी बर्खास्त कर्मचारी की ग्रैच्युटी को स्वत: नहीं रोक सकता है और उसे ग्रैच्युटी भुगतान अधिनियम की धारा 4 में वर्णित प्रावधानों का पालन करना होगा। ग्रैच्युटी केवल तभी जब्त की जा सकती है जब कर्मचारी की वजह से कंपनी को कोई वित्तीय क्षति हुई हो। न्यायालय ने यूनियन बैंक ऑफ इंडिया बनाम सीजी अजय बाबू मामले में यह फैसला सुनाया है। कर्मचारी को बैंक ने जांच के बाद बर्खास्त कर दिया था और उसके आचरण को नैतिक रूप से भ्रष्ट बताते हुए उसकी ग्रैच्युटी को भी रोक लिया था। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि अगर कर्मचारी ने इस तरह की कोई हरकत की थी तो उसके बारे में फैसला लेने का अधिकार फौजदारी अदालत को है, बैंक को नहीं। ग्रैच्युटी की इजाजत केवल तभी दी जा सकती है जब फौजदारी अदालत ने उसे नैतिक भ्रष्टता का दोषी पाया हो और उसके आधार पर उसे बर्खास्त किया गया हो। लेकिन इस मामले में बैंक ने आपराधिक मामला नहीं दर्ज किया था लिहाजा उसे दोषी भी नहीं ठहराया गया। बैंक की तरफ से नैतिक भ्रष्टता का आरोप भर लगा देना काफी नहीं है। उसने यह भी कहा कि बैंक के किसी भी नियम पर ग्रैच्युटी भुगतान अधिनियम को वरीयता दी जाएगी।
 
डीआरआई बैंक खाते को फ्रीज नहीं करा सकता
 
दिल्ली उच्च न्यायालय ने राजस्व खुफिया निदेशालय (डीआरआई) की तरफ से एक कंपनी के बैंक खाते को फ्रीज करने के लिए यूनियन बैंक ऑफ इंडिया को लिखे गए खत को निरस्त कर दिया है। डीआरआई ने बैंक को खत लिखकर आर के इम्पेक्स कंपनी के चालू खाते में लेनदेन अगले आदेश तक बंद करने को कहा था। रेडिमेड कपड़े बनाने वाली इस कंपनी के मालिक के बैंक खाते में लेनदेन पर रोक लगा दी गई थी। कुछ दूसरी फर्मों की तरफ से निर्यात में की गई धांधली के बाद डीआरआई ने इस तरह की रोक लगाई थी। उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा है कि डीआरआई के पास बैंक खाते में लेनदेन पर रोक लगाने के लिए खत लिखने की कोई शक्ति नहीं है। कस्टम अधिनियम के तहत डीआरआई को संदिग्ध के परिसरों की तलाशी लेने का अधिकार तो है लेकिन ऐसा खत नहीं लिख सकते हैं।
 
गौशाला ईएसआई कानून के दायरे में नहीं
 
पटना उच्च न्यायालय ने कर्मचारी राज्य बीमा (ईएसआई) निगम की दलील को खारिज करते हुए कहा है कि पटना शहर में मौजूद एक गौशाला ईएसआई अधिनियम के दायरे में नहीं आती है। ईएसआई ने इस गौशाला को भेजे नोटिस में कहा था कि 20 से अधिक कर्मचारी होने के नाते वह भी अधिनियम के दायरे में आएगा। इस गौशाला को दूध और चारे की बिक्री करने वाली एक लाभपरक इकाई बताया गया था। लेकिन गौशाला प्रबंधन ने जब इस नोटिस को ईएसआई अदालत में चुनौती दी तो वहां उसे निरस्त कर दिया गया। गौशाला ने खुद को धर्मार्थ संस्था बताते हुए कहा था कि इसका असली मकसद बीमार गायों की देखभाल करना है, लाभ कमाना नहीं। इसके साथ ही उसने 20 कर्मचारी होने के दावे को भी नकारते हुए कहा कि उसके कई कर्मचारी वालंटियर हैं। उच्च न्यायालय ने ईएसआई बनाम श्रीकृष्ण गौशाला मामले में अपील पर सुनवाई के बाद इसमें दखल देने से इनकार कर दिया। उसने ईएसआई अदालत के फैसले को कानून पर नहीं बल्कि तथ्यों पर आधारित बताया है।
Keyword: supreme court, high court, उच्चतम न्यायालय,
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