बिजनेस स्टैंडर्ड - भाजपा और मोदी के 'उपयोगी मूर्ख'
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भाजपा और मोदी के 'उपयोगी मूर्ख'

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  September 02, 2018

किसी को नहीं पता कि 'उपयोगी मूर्ख' शब्द किसने गढ़ा है? यद्यपि लेनिन ने उदार किंतु गैर वामपंथियों के लिए इस शब्द का जमकर प्रयोग किया। ये वे लोग थे जो लेनिन के प्रवक्ता साबित होते थे। अमेरिकी लेखक विलियम सफायर ने कहा था कि उन्हें इस कहावत के लेनिन से संबंध के कोई प्रमाण नहीं मिले। यह वैसा ही है जैसे किसी भी अच्छी पंक्ति को कन्फ्यूशियस, कौटिल्य या सुन जू से जोड़ दिया जाता है। भारत में पिछले दो दशक से हिंदुत्व अभियान के बौद्धिक समर्थकों ने वाम रुझान वालों, उदारवादियों, शहरी बौद्धिकों आदि के लिए इसका इस्तेमाल किया है। फिलहाल उन्हें शहरी नक्सल का नाम देने की कवायद चल रही है जिसे अपेक्षित कामयाबी नहीं मिल सकी। यह बात अलग है कि इसे लेकर हैशटैग की दोतरफा जंग तेज हुई है।

 
मैं यह बात कह रहा हूं तो संभव है कि दोनों ओर के योद्धा इससे भ्रमित हो जाएं परंतु अब ऐसे प्रमाण सामने आ रहे हैं जिनसे लगता है कि वे शहरी नक्सल हों या नहीं लेकिन भाजपा और आरएसएस का उनको उपयोगी मूर्ख कहना शायद सही साबित हुआ। परंतु यहां एक महत्त्वपूर्ण बात पर ध्यान दें। वे 'महान भारतीय क्रांति' से जुड़े वे उपयोगी मूर्ख नहीं हैं जो निरापद ढंग से कुछ केंद्रीय विश्वविद्यालयों में मिलते हैं। भाजपा को अपने ये उपयोगी मूर्ख बस्तर जैसे इलाकों में मिले हैं जो अपेक्षाकृत खतरनाक है।
 
शहरी या ग्रामीण नक्सल कुछ नहीं होता। नक्सल सिर्फ नक्सल होता है और माओवादी भी। इन दोनों को आपराधिक भी नहीं माना जा सकता है। यहां तक कि अवैधानिक गतिविधि निवारण अधिनियम (यूएपीए) भी किसी भारतीय को केवल अपनी मान्यता के आधार पर जेल की सजा नहीं सुना सकता। आप सार्वजनिक रूप से यह भी कह सकते हैं कि भारत ने कश्मीर पर अवैध रूप से कब्जा कर रखा है या फिर यह कि हमारा लोकतंत्र एक दिखावा और सवर्ण षडयंत्र है। क्या इसके लिए सरकार आपको जेल में बंद कर सकती है? नहीं। भाजपा की समस्या अलग है। उसका दावा चाहे जो भी हो लेकिन उसे अच्छी तरह पता है कि वृद्धि हासिल करने का जो वादा पार्टी ने किया था, उस एजेंडे पर उसे बहुत अधिक नंबर मिलने वाले नहीं हैं। ऐसे में उसे कोई तो चाहिए जिसके खिलाफ वह वोट हासिल कर सके। कोई ऐसा खतरनाक आदमी जिसके सामने लोग भाजपा के किए वादे भूल जाएं और राष्ट्रीय अस्तित्व की रक्षा के लिए वोट करे। ठीक सन 1984 के राजीव गांधी की तरह। उस वक्त नारा दिया गया था: राजीव गांधी का ऐलान/नहीं बनेगा खालिस्तान? मुस्लिमों को शत्रु के रूप में पेश करने का मूल फॉर्मूला अब पुराना पड़ चुका है। यह केवल तभी सफल होता जबकि मुस्लिम यानी पाकिस्तानी यानी कश्मीरी अलगाववादी यानी आतंकवादी यानी लश्कर ए तैयबा/अल कायदा/आईएसआईएस का समीकरण स्थायी होता। ऐसा है नहीं। भारतीय मुस्लिम प्राय: शांत बने रहे हैं और सभी हिंदू मुस्लिमों से भयभीत भी नहीं हैं। एक और बात यह कि तनाव बना रहे, इसके लिए नियंत्रण रेखा पर निरंतर गोलीबारी जरूरी है। चीन ने भी स्पष्ट कर दिया है कि वह अपने मित्र पाकिस्तान के खिलाफ किसी भी कार्रवाई की अनदेखी नहीं करेगा। डॉनल्ड ट्रंप के नेतृत्व वाले अमेरिका पर तो शायद ही कोई यकीन कर सकता है।
 
ऐसे में देश का कोई नया शत्रु तो तलाशना होगा। यह माओवाद हो सकता है। अगर आप इसे इस्लाम से जोड़ सकें तो और अच्छा। दुनिया भर की बाहरी और आंतरिक शक्तियां देश को नष्ट करने का षडयंत्र कर रही हैं और आपको रोजगार की पड़ी है? कैसे देशभक्त हैं आप? आप इन बातों को चाहे किसी भी वाद से जोड़ें, हकीकत में केवल राजनीति हो रही है। सन 1980 के दशक के आखिर में राजीव गांधी के पराभव के बाद से एक ही बात ने यह तय किया है कि देश पर किसका शासन होगा? जाति ने जो अंतर पैदा किया, क्या भाजपा और आरएसएस धर्म को उस अंतर को पाटने वाला कारक बना सकेंगे? लालकृष्ण आडवाणी ने अयोध्या कांड के साथ इस लक्ष्य को हासिल कर लिया। 
 
सन 2004 में पार्टी में जोश की कमी थी। इस मामले में मोदी का प्रदर्शन बेहतर रहा। उनका व्यक्तित्व और उनका पुराना रिकॉर्ड हिंदू मतदाताओं को अपनी ओर खींचने में कामयाब रहा। उन्होंने मजबूत सरकार और वृद्धि का दोहरा वादा किया और कामयाब रहे। आगामी चुनाव में यह काम नहीं आएगा, उन्हें एक और शत्रु की जरूरत है। अगर माओवादियों को मुस्लिमों में मिला दिया जाए तो यह उनके लिए सटीक बैठेगा। 2019 में 'राष्ट्र गहरे खतरे में हैं' जैसी बात सुनने को मिल सकती है। हममें से कई लोगों ने कॉलेज में माओवादियों को देखा होगा जो एकदम निरापद थे। नक्सल अधिक खतरनाक प्रतीत होते क्योंकि वे हथियारबंद होते थे। लेकिन वे हमारी टेलीविजन स्क्रीन पर नहीं आते न ही वे ट्विटर पर हैं। मध्य प्रदेश या महाराष्ट्र में मतदाताओं को उनके नाम पर नहीं डराया जा सकता। ऐसे में शहरी नक्सली कारगर साबित हो सकते हैं।
 
याद कीजिए भारत के टुकड़े-टुकड़े करने की बात जेएनयू से निकली थी। वहां कश्मीर के लोगों के साथ एकजुटता दिखाने का कार्यक्रम आयोजित था। उस आयोजन का नाम था 'द कंट्री विदाउट अ पोस्ट ऑफिस' (बिना डाकघर का देश)। यह नाम उर्दू के एक आलातरीन शायर आगा शाहिद अली की नज्म से लिया गया था। उन्हें बौद्धिक वाम के बीच काफी लोकप्रियता हासिल थी। पहले ऐसे पर्चे सामने आए जिनमें कहा गया कि उस आयोजन में कश्मीर की आजादी के समर्थन की बात की गई। उसके बाद एक वीडियो सामने आया जिसमें कथित तौर पर 'भारत तेरे टुकड़े होंगे इंशाअल्ला-इंशाअल्ला' के नारे लगाए गए। दो वामपंथी छात्रों पर देशद्रोह के झूठे इल्जाम थोप दिए गए। उनमें से एक अधिक कट्टर वामपंथी भी था और मुस्लिम भी। कई और वीडियो आए। एक वीडियो में जेएनयू की एक प्रोफेसर अपने छात्रों के बीच कश्मीर की आजादी की मांग का समर्थन करते दिखीं। वह कह रह थीं कि पूरी दुनिया कश्मीर पर भारत के अवैध कब्जे के खिलाफ है। एक नई पटकथा लिखी जा रही थी कि कट्टर बौद्धिक वाम, देशद्रोही मुस्लिमों के साथ मिलकर देश को तोडऩा चाह रहा है। कट्टर बौद्धिक वाम ने कश्मीरी अलगाववादियों के सुर में सुर मिलाकर उनका आधा काम कर दिया। बाकी का काम सरकार के मित्र टीवी चैनलों ने कर दिया। भारत को चीनी मिट्टी का बना हुआ नहीं है कि नारों, चित्रों, कविताओं या मुठ्ठीभर बंदूकधारी उसके टुकड़े कर देंगे। यह बात मतदाताओं को अवश्य लुभा सकती है। 
 
किसी वाम बौद्धिक द्वारा सशस्त्र नक्सलों के समर्थन या कश्मीर में जनमत संग्रह की बात करने के उसके अधिकार की रक्षा करना जायज है, बशर्ते कि वह स्वयं हथियार न उठा ले। परंतु अगर आप एक चर्चित पाकिस्तानी-कश्मीरी-आईएसआई से जुड़े व्यक्ति(गुलाम नबी फई), जो अमेरिका में सजा पा चुका है, का आतिथ्य स्वीकार करते हैं और उसे कश्मीरी देशभक्त बताते हैं तो सरकार को हर कश्मीरी को देशद्रोही बताने में सहूलियत होती है। वैश्विक वाम के बीच यह मान्यता है कि कट्टर इस्लाम अमेरिकी साम्राज्यवाद समेत उन तमाम बुराइयों का नाश करने में सफल होगा जिनसे निपटने में सोवियत संघ विफल रहा। रूमानी लोग भारत में उसका अनुकरण करने का प्रयास कर रहे हैं। परंतु कश्मीर और बस्तर के जिन लोगों के लिए लडऩे का वे दावा करते हैं, वे तो लगातार मर रहे हैं। न तो उनकी लाश पर कोई रोने वाला है न ही उनके पास कोई बचाव है। जैसे ही आप हथियार उठाते हैं सरकार को आपको मारने की वजह मिल जाती है। जाहिर है सरकार भारी भी पड़ेगी। केवल इसलिए नहीं कि वह मजबूत है बल्कि इसलिए भी कि जन भावना उसके साथ है। हममें से बहुत कम लोग इतने बौद्धिक हैं कि वे देश के खिलाफ जंग छेडऩे वालों की मूल समस्याओं को समझेंगे। अदालत से आपको बचाव हासिल होगा जो कि उचित भी है। मोदी सरकार भले ही इस मोर्चे पर कानूनी और नैतिक लड़ाई हार जाए लेकिन उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। परंतु उसे इससे कोई दिक्कत नहीं। यह आपको सोचना होगा कि क्रांतिकारी रूमानियत से जुड़ी आपकी 15 मिनट की ख्याति किसका फायदा बन रही है? उन्हें तो आपका धन्यवाद ज्ञापित करना चाहिए। आप उनके लिए उपयोगी मूर्ख साबित हो रहे हैं। आप वाम का नहीं उनका हित साध रहे हैं।
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