बिजनेस स्टैंडर्ड - आईआईएम में अकादमिक विविधता बढ़ाने की जरूरत
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आईआईएम में अकादमिक विविधता बढ़ाने की जरूरत

इंसानी पहलू
श्यामल मजूमदार /  August 31, 2018

भारतीय प्रबंध संस्थान (आईआईएम), कोझिकोड ऐसा पहला आईआईएम बनना चाहता है जहां शीर्ष स्नातकोत्तर प्रबंधन पाठ्यक्रम में महिलाओं के लिए 60 अतिरिक्त सीटों की व्यवस्था हो। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार इससे संस्थान में लैंगिक विविधता यानी महिला और पुरुष छात्रों की संख्या में बराबरी लाने में मदद मिलेगी। अक्सर पुरुषों के प्रभुत्व वाली कक्षाओं के कारण आईआईएम की आलोचना होती रही है। इसलिए उनमें अब आवेदकों के चयन की प्रक्रिया में बदलाव के साथ लैंगिक विविधता लाने का प्रयास किया जा रहा है। आईआईएम बेंगलूरु में वर्ष 2017-18 के बैच में छात्राओं का अनुपात 28 फीसदी था जो अब तक का सर्वोच्च स्तर है। आईआईएम कलकत्ता का प्रदर्शन और भी बेहतर रहा। इसकी एक तिहाई छात्राएं लड़कियां थीं। जबकि इससे पिछले बैच में यह आंकड़ा केवल 16 फीसदी का था। दोनों आईआईएम ने साझा प्रवेश परीक्षा के अंकों में तवज्जो देकर लैंगिक विविधता का यह लक्ष्य हासिल किया। 

 
आईआईएम अहमदाबाद (आईआईएम ए) ने भी उच्च लैंगिक विविधता हासिल की है। वर्ष 2017-18 के पीजीपी बैच में 28 फीसदी महिलाओं की भागीदारी से इसे समझा जा सकता है। इससे पिछले वर्ष यह महज 21 प्रतिशत था। आईआईएम ए का कहना है कि उसने यह लक्ष्य बिना अतिरिक्त तवज्जो या बिना विशेष कोटा के हासिल किया है। उसने एक ऐसा तरीका निकाला है जो गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं करता। विभिन्न आईआईएम को महिलाओं की संख्या बढ़ाने के प्रयास करने चाहिए। बहरहाल, एक सवाल यह भी है कि क्या महिला-पुरुष समानता हासिल करने का एकमात्र तरीका यही है कि उन्हें अधिक तवज्जो दी जाए? इस विषय पर ज्यूरी के बीच मतभेद है। कई लोगों का कहना है कि लैंगिक विविधता को लेकर कृत्रिम जोर देने से देश के सर्वश्रेष्ठï संस्थानों में योग्यता आधारित दाखिले को नुकसान पहुंच सकता है। आखिरकार, आईआईएम में दाखिले को कोटा पूरा करने के रूप में तो नहीं ही देखा जा सकता। 
 
कॉर्पोरेट भारत की भी इस बात को लेकर आलोचना होती रही है कि उसके बोर्ड रूम में महिलाओं की तादाद ज्यादा नहीं है। परंतु वरिष्ठï महिला कार्याधिकारियों के बीच भी इस बात को लेकर सहमति है कि कंपनियों को वरिष्ठï पदों पर महिलाओं की भागीदारी की कमी दूर करने की कोशिश करनी चाहिए लेकिन महिला निदेशकों के लिए कोटे की अवधारणा कतई समझदारी भरी बात नहीं है। किसी भी कंपनी के सीईओ से बात कीजिए। भले ही वह कोई महिला क्यों न हो, उत्तर एक समान रहेगा: इससे महिला बोर्ड सदस्यों की आलोचना होगी। इससे ऐसा संकेत जाएगा मानो वे उस पद पर बने रहने लायक नहीं हैं और केवल संख्या बल दिखाने के लिए रखी गई हैं। कॉर्पोरेट बोर्ड रूप में ऐसी व्यवस्था के लिए कोई जगह नहीं है। शायद यही वजह है कि बोर्ड रूम में महिलाओं के लिए आरक्षण को तमाम बार खारिज किया जाता रहा है। 
 
कंपनियों को भी ऐसे कदम उठाने चाहिए ताकि वरिष्ठï पदों पर अधिक से अधिक महिलाएं पहुंचें। कॉर्पोरेट एशिया में महिलाओं पर अपने अध्ययन में मैकिंजी ने कहा कि बढ़ी हुई लैंगिक विविधता 70 फीसदी सीईओ की नीतिगत प्राथमिकता नहीं रही। एशिया में करीब 50 फीसदी स्नातक महिला हैं लेकिन मध्य स्तर के प्रबंधन में इनमें से बहुत कम महिलाएं ही पहुंच पाती हैं। शीर्ष पर पहुंचने की तो बात ही छोड़ दीजिए। औसतन देखा जाए तो कॉर्पोरेट बोर्ड की कुल सीटों में से 6 फीसदी पर महिलाएं रहती हैं। जबकि कार्यकारी समितियों के आठ फीसदी पर। भारत में हालात अधिक बुरे हैं। इस मामले में हम नीचे से तीन देशों में शामिल हैं। 
 
इस स्थिति में सुधार लाना आवश्यक है लेकिन महिलाओं को बोर्ड रूम में केवल लिंग के आधार पर प्रवेश नहीं मिलना चाहिए। अगर कोई ऐसा करता है तो उसे ऐसा पेशेवर काम के पुख्ता टै्रक रिकॉर्ड के माध्यम से करना चाहिए। कंपनियों को वही मानक पुरुष प्रत्याशियों का आकलन करते समय भी अपनाने चाहिए।  आईआईएम की बात करे तो लैंगिक विविधता पर जोर देने के बजाय, इन संस्थानों को अकादमिक विविधता पर अधिक ध्यान देना चाहिए। यानी इंजीनियरिंग से बाहर के अधिक से अधिक छात्रों को दाखिला देना। यह सच है कि आईआईएम लंबे समय से इंजीनियरिंग स्नातकों के केंद्र रहे हैं लेकिन अब इसमें बदलाव की आवश्यकता है। अधिकांश इंजीनियरिंग कॉलेजों में पुरुष छात्रों की संख्या महिलाओं से अधिक है लेकिन आईआईएम मे दाखिला लेने वाली महिलाओं की तादाद कम है। यह बात कैट परीक्षा के लिए आने वाले आवेदनों से भी स्पष्टï होती है जिनमें 70 प्रतिशत पुरुष और 30 प्रतिशत महिलाएं हैं। 
 
अगर इस परीक्षा को परिमाणात्मक कौशल से परे किया जा सका तो अधिक तादाद में महिलाओं को भागीदारी के लिए प्रोत्साहित किया जा सकेगा। परिमाणात्मक कौशल के कारण इंजीनियरों को बढ़त मिलती है। सवाल कुछ इस प्रकार तैयार किए जाने चाहिए कि वे सभी पाठ्यक्रमों के विद्यार्थियों के लिए समान हों, चाहे वे मानविकी के विद्यार्थी हों या वाणिज्य के। कुछ आईआईएम ने ऐसा करना शुरू किया है जिसके परिणामस्वरूप गैर इंजीनियरिंग छात्रों की संख्या में इजाफा हो रहा है।  उदाहरण के लिए आईआईएम ए में 2017-18 में गैर इंजीनियरिंग छात्रों की भागीदारी 32 फीसदी रही जबकि एक साल पहले यह 20 फीसदी थी। इससे स्वयं लैंगिक विविधता आएगी। 
Keyword: IIM, students, girls, women, skill,
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