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क्रूर कानून, आक्रामक सत्ता

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  August 31, 2018

वर्ष 2014 में एक जानेमाने लेखक और टीकाकार ने कहा था कि वह समाज और अर्थव्यवस्था के बीच संतुलन कायम करने के इच्छुक हैं और नरेंद्र मोदी का समर्थन करना चाहते हैं क्योंकि वह अर्थव्यवस्था की बेहतरी के लिए काम करेंगे। उनका कहना था कि भले ही मोदी की पार्टी समाज में नकारात्मक गतिविधियों को बढ़ावा दे लेकिन मोदी अर्थव्यवस्था के हित में काम करेंगे। लेकिन बाद के दिनों में यह संतुलन नहीं दिखा क्योंकि वादे के मुताबिक कोई आर्थिक लाभ नजर नहीं आया (याद कीजिए दो अंकों की वृद्धि दर की बात)। उधर पिछले दिनों देश भर में उस समय स्तब्धता छा गई जब पुलिस ने कुछ ऐसे मध्यवर्गीय लोगों को पकड़ा जो सत्ता को उखाड़ फेंकने पर आमादा हिंसक क्रांतिकारियों के बजाय वंचित वर्ग के लोगों से सहानुभूति रखने वाले ज्यादा नजर आते हैं। ये गिरफ्तारियां एक ऐसे 'सुरक्षा राज्य' की स्थापना की ओर पेशकदमी हैं जो खुलकर कानून व्यवस्था के प्रति पक्षपात का रुख रखता है। इससे इतर गाली गलौज करने वाले ट्रोल (ऑनलाइन बदतमीजियां करने वाले), मीडिया पर दबाव, अल्पसंख्यकों को लेकर घृणास्पद बातें (मुस्लिम पाकिस्तान जा सकते हैं या फिर रामजादे और हरामजादे वाला बयान) वगैरह। कथित निगरानी दस्ते राजमार्गों पर घूम रहे हैं, गो संरक्षण के नाम पर लोगों को मार रहे हैं और आजाद घूम रहे हैं। हाल में एक मंत्री ने लिंचिंग के आरोपियों को माला पहनाई। लव जिहाद के नाम पर व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मूलभूत अधिकारों का हनन किया जा रहा है। 

 
ध्यान देने लायक बात यह है कि एक ऐसा राजनीतिक दल जिसके नेताओं को सन 1975-77 के बीच इंदिरा गांधी की सरकार द्वारा लगाए आपातकाल में जेल की सजा भुगतनी पड़ी, वही दल आज नागरिक आजादी के हिमायतियों की आवाज तक सुनना नहीं चाहता और मतभेदों को लेकर असहिष्णु हो चुका है। पूर्व भाजपा नेता गोविंदाचार्य वैचारिक तौर पर व्यक्तिगत आजादी के पक्षधर नहीं हैं लेकिन वह एक अपवाद के रूप में सामने आए हैं। अच्छे दिनों के जो वादे किए गए थे उनमें तेज आर्थिक वृद्धि की बात शामिल थी लेकिन उसकी रही सही आशा भी नोटबंदी के साथ गायब हो गई। नोटबंदी ने बहुत अधिक अस्थिरता पैदा की और उससे शायद ही कुछ हासिल हुआ। किसान और छोटे कारोबारी नाखुश हैं, शायद बड़े कारोबारी भी। मेक इन इंडिया और निर्यात की हालत खराब है। जिन लोगों को लग रहा था कि आर्थिक मजबूती के चलते मोदी के कार्यकाल में रुपया 60 रुपये प्रति डॉलर से घटकर 40 रुपये प्रति डॉलर तक आ जाएगा, वे यह देखकर दुखी होंगे कि यह 70 रुपये तक पहुंच गया है (हालांकि यह कोई बुरी बात नहीं)। इन गिरफ्तारियों ने महाराष्ट्र की एक समय सक्षम मानी जाने वाली पुलिस की छवि को भी धूमिल किया है। वह मसखरी पुलिस नजर आ रही है। गिरफ्तारी वारंट मांगने पर प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। प्राथमिकी पर उस व्यक्ति का नाम नहीं है जिसे गिरफ्तार किया जाना है। गिरफ्तारी के वक्त प्रबुद्ध नागरिकों को साक्षी बनाना होता है ताकि यह तय हो सके कि पुलिस कोई गड़बड़ी न करे। परंतु इन मामलों में ऐसे लोगों को पुलिस अपने साथ लाई थी।
 
कस्टडी के लिए दलील दे रहा लोक अभियोजक ऐसी दलीलें देता है जो प्रस्तुत दस्तावेजों से मेल नहीं खातीं। एक मजिस्ट्रेट जो अपने सामने रखे दस्तावेजों की भाषा तक से अनभिज्ञ है वह आदेश पारित कर देता है। टेलीविजन चैनल पुलिस से मिली जानकारी पर काल्पनिक लगती कथाएं बुनते हैं। आमतौर पर असहिष्णुता का माहौल है। इस कदर कि एक गाने के दौरान आंख झपका देने वाली अभिनेत्री का मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंच जाता है। राहुल गांधी सतर्कता बरतें।  मौजूदा दौर में तो आम नागरिक कृत्यों को आपराधिक करार देने की प्रवृत्ति है। महाराष्ट्र सरकार का बस चले तो किसी कारोबारी को सरकारी क्रय मूल्य से कम दाम पर अनाज खरीदने पर जेल भेज दिया जाएा। तीन तलाक का इस्तेमाल करने वालों पर भी यही बात लागू होती है। हालांकि इससे पीडि़त पत्नी की क्या मदद होगी यह रहस्य ही है। पंजाब की कांग्रेस सरकार पाकिस्तान के ईशनिंदा कानून का अनुकरण करना चाहती है। आतंकित करने वाले कर कानून अभी भी मौजूद हैं। सच यह है कि देश में क्रूर और अधिनायकवादी कानून शेष हैं और इसके लिए तमाम दल उत्तरदायी हैं। सरकारी तंत्र आपको कुचल सकता है। नागरिकों को अहसास तक नहीं है कि वे कितनी आसानी से इनके नीचे आ सकते हैं। अगर जागरूकता बढ़ती है और हमारे यहां थॉमस पेन जैसा कोई राजनीतिक कार्यकर्ता उभरता है तभी आशा की कोई किरण दिख सकती है।
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