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देश के निर्माताओं की उम्मीद के विपरीत बनता 'नया भारत'

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  August 30, 2018

इस मामले में स्कूल का नाम लिया जाना उचित नहीं होगा लेकिन करीब दो सप्ताह पहले राजधानी दिल्ली के एक स्कूल में घटी घटना बताती है कि देश की राजनीति किस कदर ध्रुवीकृत हो चुकी है और सामाजिक माहौल कितना संवेदनशील हो चुका है। ध्यान रहे कि यह घटना देश की राजधानी के स्कूल की है, किसी दूरदराज ग्रामीण इलाके की नहीं।  चार किशोरों ने 14 अगस्त को अपनी कक्षा में एक झंडा बनाया था। यह पाकिस्तान का झंडा था। संयोग से 14 अगस्त को पाकिस्तान का स्वतंत्रता दिवस भी था। कक्षाध्यापक ने इसकी जानकारी प्रधानाध्यापिका को दी। बच्चों से सवाल किए गए और पता चला कि उनमें से एक मुस्लिम था। इस बात ने घटना को एक नया मोड़ दे दिया और प्रधानाध्यापिका ने बच्चों को चेतावनी जारी कर दी। 

 
यहां इस घटना का जिक्र करना दो मायने रखता है। पहला, यह बताता है कि देश के स्कूलों में शिक्षा का स्तर कितना दयनीय है और दूसरा यह शायद बताता है कि देश का मध्य वर्ग किस हद तक ध्रुवीकृत हो चुका है। यह कहना शायद सही होगा कि सामाजिक मूल्यों में यह गिरावट ऐसी ही या अधिक गहन घटनाओं के वक्त राज्य की ओर से अपर्याप्त प्रतिक्रिया की वजह से आई है।  बल्कि यह एक तरह के कच्चे राष्ट्रवाद को बढ़ावा देने वाली बात हो सकती है। यानी जो लोग बहुसंख्यक समाज की विश्व दृष्टिï से सहमत नहीं हों उन्हें अलग-थलग कर दिया जाए या उनके साथ असहिष्णुता बरती जाए। 
 
आखिर शिक्षक इस नतीजे पर क्यों पहुंचे कि बच्चों ने कक्षा में जो झंडा बनाया है वह आपत्तिजनक है? उन्हें क्यों लगा कि इस घटना को प्रधानाध्यापिका के संज्ञान में लाया जाना चाहिए? अगर बच्चों ने पाकिस्तान के स्वाधीनता दिवस के दिन उसका झंडा बना भी दिया तो इसमें गलत क्या था? क्या शिक्षक भी राष्ट्रवाद की गलत परिभाषा के शिकार हैं? क्या शिक्षक और प्रधानाध्यापिका इस मौके का इस्तेमाल बच्चों को पड़ोसी राष्ट्र के बारे में और जानकारी देने के लिए नहीं कर सकते थे? ऐसा न करके क्या उन्होंने शिक्षा के व्यापक लक्ष्यों में से एक गंवा नहीं दिया? 
 
यकीनन शिक्षकों की प्रतिक्रिया बताती है कि उन्मादी राष्ट्रवाद के जाल में फंस जाना कितना आसान है। इसके साथ ही यह भी कि जिज्ञासा को बढ़ावा देने और ज्ञान की भूख किस कदर कम होती जा रही है? इसे यह संकेत भी मिलता है कि कैसे भारतीय समाज निम्रतम स्तर के ध्रुवीकरण का शिकार होता जा रहा है।  उन बच्चों को पाकिस्तान का झंडा बनाने की प्रेरणा चाहे जैसे भी मिली हो, उस पर जो प्रतिक्रिया दी गई वह उन्हें हमेशा के लिए भयभीत कर देगी। दुनिया को देखने का उनका नजरिया बदल जाएगा। वे सभी गलत झूठे राष्ट्रवाद के शिकार हैं जिसकी एक समावेशी, स्वतंत्र और सहिष्णु समाज में कोई जगह नहीं। 
 
केवल शिक्षकों को दोष क्यों देना? एक सहयोगी का हालिया अनुभव भी देश के मौजूदा हालात के बारे में बताता है। एक पुलिस मंजूरी प्रमाणपत्र के सिलसिले में उसके घर आए पुलिस अधिकारी ने कहा कि उसका काम बहुत कठिन हो गया है क्योंकि बांग्लादेश समेत विभिन्न देशों के अवैध प्रवासी बहुत बड़ी तादाद में देश में आ गए हैं। परंतु अधिकारी ने यह भी स्पष्टï किया कि लोगों के नाम और उनका रहन-सहन भी यह बता देता है कि वे अवैध प्रवासी हैं या नहीं।  जाहिर है किसी को अवैध प्रवासी बताने का यह तरीका निहायत भौंडा तरीका है जो देश के कमजोर वर्ग का केवल इसलिए शोषण कर सकता है क्योंकि शायद उनका धर्म हिंदू न हो या उनके नाम उन लोगों जैसे हों जो बांग्लादेश में रहते हैं। क्या देश के नागरिकों की पहचान के बेहतर तरीके हमारे पास नहीं हैं? परंतु एक ऐसे देश में जहां असम जैसे देश में नागरिकों की राष्ट्रीय नागरिक पंजी बनाना राजनीतिक मोलभाव की वजह बन सकता है और अन्य राज्य उसकी मांग कर सकते हैं, वहां कानून प्रवर्तन एजेंसियों का यह रुख कतई चौंकाने वाला नहीं है। 
 
परंतु इससे भारतीय समाज का भला नहीं बल्कि नुकसान ही होता है। यह देश के संस्थापकों की उम्मीद से एकदम परे हैं। उन्होंने यही सोचा था कि देश का हर नागरिक जाति, धर्म आदि से परे समान अधिकार और स्वतंत्रता के साथ रह सकेगा। समावेशी भारत के स्वप्न में यह बात शामिल थी। परंतु देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा आज जैसी बातें कर रहा है उसे देखकर आश्चर्य होता है कि क्या समावेशी भारत की राह में गंभीर बाधा खड़ी हो चुकी है।  इसके लिए आप बहुसंख्यक वाद और केंद्र के सत्ताधारी दल की ध्रुवीकरण की राजनीति को जिम्मेदार ठहरा सकते हैं। परंतु चिंतित करने वाली बात यह भी है कि ऐसी राजनीति को समाज के एक बड़े तबके का समर्थन मिल रहा है। खासतौर पर तेजी से बढ़ते मध्य वर्ग के बीच। आर्थिक अधिकार और वृद्घि से लाभान्वित होने वाला वर्ग भी इसके लिए कम जिम्मेदार नहीं है। अधिकांश मध्यवर्गीय परिवारों में  होने वाली चर्चा चौंकाने की हद तक अल्पसंख्यकों के बरअक्स बहुसंख्यकों के दबदबे की बातों से भरी रहती है।
 
यह विडंबना ही है कि एक देश एक कर के लुभावने नारे के साथ देश में वस्तु एवं सेवा कर की शुरुआत करने वाले देश में अल्पसंख्यकों को अलग-थलग करने और बहुसंख्यकवाद के दबदबे की प्रवृत्ति बढ़ रही है।  जिस नए भारत का चौतरफा शोर सुनाई दे रहा है वह जाति, धर्म और संप्रदाय आदि को लेकर समावेशी नहीं है। सन 2022 में देश की आजादी की 75वीं वर्षगांठ मनाने के पहले हमें हालात में सुधार करने की अत्यंत आवश्यकता है। तभी हम उसे गर्व और संतुष्टिï के साथ मना सकेंगे। 
Keyword: india, secular, minority,,
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