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कृत्रिम बुद्धिमत्ता, असमानता और हमारा चयन

अरुणाभ घोष /  August 30, 2018

कृत्रिम बुद्धिमत्ता हमारी सामाजिक प्रक्रिया में काफी अहम भूमिका निभा सकती है। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं अरुणाभ घोष 

 
एमआईटी के कंप्यूटर विज्ञान और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) प्रयोगशाला के पूर्व निदेशक रूडनी ब्रूक्स चेतावनी देते हैं, 'भविष्य का पूर्वानुमान लगाना कठिन काम है, खासतौर पर समयपूर्व ऐसा करना।' एआई को लेकर आम जनता के बीच वार्तालाप बढ़ रहा है। इसके आधार पर लोग अपनी धारणा बना रहे हैं और यह नीतियों को प्रभावित कर रहा है। हमें तकनीक से अपने जुड़ाव को लेकर किस तरह अनुमान लगाने चाहिए? हम किस तरह का प्रभाव उत्पन्न कर सकते हैं? पहली बात तो यह कि एआई और स्वचालन एक ही आर्थिक तंत्र में अलग-अलग गति से काम कर सकते हैं। कहा जा रहा है कि एआई चौथी औद्योगिक क्रांति के लिए वही काम करेगा जो पिछली क्रांति के लिए बिजली ने किया था। एआई, बिग डेटा, स्वचालन और क्वांटम कंप्यूटिंग आदि आर्थिक प्रगति को बहुत हद तक प्रभावित कर सकते हैं। सरकारें राष्ट्रीय नीतियों को आगे बढ़ाती हैं। चीन 2030 तक एआई के क्षेत्र में महाशक्ति बनने का लक्ष्य लेकर चल रहा है। यूरोपीय संघ, फ्रांस और जापान इस क्षेत्र में शोध एवं विकास पर काफी धनराशि खर्च कर रहे हैं। इस दौरान वे वैधानिक ढांचे में रहकर एआई के विकास पर कार्य कर रहे हैं। अमेरिका के एक कार्यबल ने विस्तृत शोध एवं विकास योजना की बात कही है और वह एआई को लेकर कार्यबल गठित कर रहा है। नीति आयोग का चर्चा पत्र भारत में 'सबके लिए एआई' की समावेशी दृष्टिï की बात करता है। 
 
परंतु यह बदलाव अलगाव लाने वाला नहीं होगा। पुराने और नए उद्योग, तकनीक और उत्पादन के तरीके सब एक साथ अस्तित्व में रहेंगे। यह बहुगतिक स्वचालन औद्योगिक नीतियों को जटिल बनाएगा। उभरती तकनीक और बड़ी बाजार हिस्सेदारी को लेकर पहले ही प्रयास शुरू हो चुके हैं। चीन की 2025 संबंधी नीति 10 क्षेत्रों को चिह्निïत करती है जिसमें रोबोटिक्स और सेमी कंडक्टर शामिल हैं। इन क्षेत्रों में स्वदेशी कंपनियां स्वदेशी बाजार पर काबिज रहने के साथ वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने की इच्छा रखती हैं। अनुमान लगाना आसान नहीं है। चीन जिन 10 क्षेत्रों में रोबोट्स की बहुत अधिक भूमिका देखता है उनमें ऊर्जा और खनन, चिकित्सा और रक्षा क्षेत्र शामिल हैं। इनके अलावा सफाई, फिल्म निर्माण और साहचर्य भी शामिल हंै।
 
औद्योगिक नीतियां अगर ऊपर से निर्धारित हों तो वे बहुत सीमित लक्ष्य हासिल कर पाती हैं। तकनीक हमें सक्षम बनाती है लेकिन वह अपने आप में लक्ष्य नहीं है। जवाबदेह उत्पादन और खपत इस बात पर निर्भर करती है कि एआई और स्वचालन की मदद से संसाधनों की किफायत किस तरह बढ़ाई जा सकती है, खाद्य क्षेत्र के नुकसान को कम किया जा सकता है और सामग्री का पुनर्चक्रण और दोबारा इस्तेमाल तय किया जा सकता है। नीतियां वह दिशा तय कर सकती हैं जो नवाचार की ओर ले जा सकते हैं।
 
दूसरा, भविष्य के रोजगार के बारे में अनुमान लगाने से बचना चाहिए। एआई और स्वचालन को लेकर जो भी टिप्पणियां की जा रही हैं वे रोजगार को होने वाले नुकसान की बातों से भरी रहती हैं। इसमें उच्च कौशल वाले रोजगार की बात भी शामिल है। इस बीच अमेरिका 78,000 एआई शोधकर्ता तैयार कर चुका है और चीन में उनकी संख्या इसके करीब आधी है। यह तकनीकी विकास का अहम संकेतक है लेकिन इससे रोजगार के नुकसान की बात तो सामने नहीं आती। कन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री (स्पष्टïीकरण: मैं संचालन समूह का सदस्य था) की 2017 की एक रिपोर्ट कई ऐसे कारकों की पहचान करती है जो रोजगार के माहौल को आकार देंगे। इसमें शिक्षण तंत्र, उद्यमों का आकार और ढांचा, सामाजिक सुरक्षा तंत्र और तकनीक और नवाचार के माध्यम से समावेशी वृद्घि की बात शामिल थी। 
 
उत्पादक रोजगार और उत्कृष्टï काम के लिए हमें नए कौशल और नए क्षेत्रों में अवसर तलाशने होंगे। पानी, स्वच्छता, कचरा प्रबंधन और स्वच्छ ऊर्जा वृद्घि के लिहाज से महत्त्वपूर्ण क्षेत्र होंगे। जरा कल्पना कीजिए कि छतों पर विद्युत व्यवस्था लगाने में कितने नए रोजगार आएंगे या जल एवं स्वच्छता क्षेत्र के बुनियादी ढांचे में विकेंद्रीकरण अथवा अहम खनिज और अन्य संसाधनों के सही इस्तेमाल, पुनर्चक्रण और दोबारा इस्तेमाल का प्रशिक्षण पाने वालों को मिलने वाला काम।  परंतु श्रमिकों के अधिकारों का क्या? नई तकनीक से संचालित होने वाली अर्थव्यवस्था में किसी का व्यक्तिगत आर्थिक मूल्य कामों के मानकीकरण के व्युत्क्रमानुपाती होता है। काम जितना विशिष्टï होगा, कामगारों में उसका मोल भी उतना ही अधिक होगा। कामगार कई तरह के कौशल विकसित कर सकते हैं। इस नई व्यवस्था में अगर हर कोई अपना मालिक खुद होगा तो वेतन वृद्घि या स्वास्थ्य कवरेज की मांग किससे की जाएगी?
 
तीसरी बात, लोकतांत्रिक सहभागिता पर पडऩे वाले दबाव को भी समझना होगा। सन 1949 में आंबेडकर ने कहा था कि सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र की असमानता राजनीतिक लोकतंत्र को खतरे में डाल सकती है। अगर एआई स्वचालन और अन्य उभरती तकनीक आर्थिक असमानता को बढ़ावा देंगी तो लोकतांत्रिक प्रणाली में सांकेेतिक राजनीतिक असमानता पर क्या असर होगा?  कराधान की बात करें तो अगर रोबोट मनुष्यों से अधिक उत्पादक हो गए तो क्या उन पर कर लगेगा? कई विकासशील अप्रत्यक्ष कराधान पर भरोसा करते हैं। अगर रोबोटों की संख्या बढ़ेगी तो अप्रत्यक्ष कर राजस्व बढ़ेगा। इसे स्वचालन बढऩे से प्रभावित वर्ग में वितरित किया जा सकता है। अगर रोबोट अनिवार्य सेवाओं को भी सस्ता बना देंगे तो सरकारों को नई तकनीक के बारे में सोचना होगा। 
 
ऐसे राजनीतिक माहौल में रोबोट की बात सुनी जाएगी या उसके मालिकों की? या पीडि़तों की? अगर एआई अवसर की असमानता तथा सामाजिक और सांस्कृतिक पूर्वग्रह को बढ़ाएगा तो दिक्कत होगी।  चौथा, तकनीक स्थायी विकास में मददगार हो सकती है। एआई ऊर्जा, जल, शहरों या जलवायु परिवर्तन के लिए ऐप्लीकेशंस विकसित करता है तो यह बहुत अहम होगा। अल्गोरिथम आधारित मशीन अन्य मॉडलों के पर्यवेक्षण की प्रामाणिकता के आधार पर आकलन कर सकती है। एआई अधिक लचीले और स्वायत्त बिजली ग्रिड को नवीकरणीय ग्रिड से जोडऩे में मदद कर सकता है। विंड टर्बाइन के प्रोपेलर अगर हवा की गति और दिशा का अंदाजा लगा सकें तो उनका प्रदर्शन बेहतर हो सकता है। सेंसर और कंट्रोल सिस्टम की मदद से पानी की कमी वाले इलाकों में सिंचाई सुविधा बढ़ाई जा सकती है। किसानों को बेहतर उपज वाली बुआई की जानकारी दी जा सकती है। चक्रवात की पहचान में एआई पहले ही मददगार है। 
 
एआई को अब तकनीक से समाज की ओर ले आना होगा। हम अभी भी आम कृत्रिम बुद्धिमत्ता से दूर हैं। सन 2013-14 में 82,944 प्रोसेसर वाले एक सुपर कंप्यूटर को वह आकलन करने में 40 मिनट लगे थे जो इंसानी दिमाग एक सेकंड में कर सकता है। तकनीकी विकास का क्रम चलता रहेगा। असमानता और अवसर इस प्रक्रिया का हिस्सा हैं। महत्त्वपूर्ण यह है कि हम उनकी क्षमताओं का अपनी बेहतरी के लिए कैसे इस्तेमाल कर सकते हैं। 
 
(लेखक काउंसिल ऑन एनर्जी, एन्वॉयरनमेंट ऐंड वाटर के सीईओ हैं। लेख में प्रस्तुत विचार निजी हैं।)
Keyword: artificial intelligence, AI, robot, कृत्रिम बुद्धिमत्ता,
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