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सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर, क्या है हकीकत?

नीति नियम
मिहिर शर्मा /  August 29, 2018

सरकार लगातार मतदाताओं को यह यकीन दिलाने का प्रयास कर रही है कि देश के आर्थिक प्रदर्शन के बारे में दो परस्पर विरोधाभासी बातें सही हैं। पहला, नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली मौजूदा सरकार सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि के मामले में बेहतरीन रही है। दूसरा, यह कि उन्होंने तंत्र की सफाई करने और उसे अधिक पारदर्शी बनाने की कोशिश की है, भले ही इसकी कीमत जीडीपी वृद्धि के रूप में चुकानी पड़ी। ऐसा करने की तात्कालिक वजह है सरकार द्वारा नियुक्त समिति द्वारा सन 2000 के दशक के जीडीपी बैक सीरीज के अनुमानों का जारी करना। कहा गया है कि उन आंकड़ों की मौजूदा आंकड़ों से तुलना की जा सकती है। इन आंकड़ों के मुताबिक (मुझे आशंका है कि इन आंकड़ों में 2000 के दशक की वृद्धि को बहुत सीमित करके बताया गया है) जीडीपी वृद्धि के मामले में संप्रग सरकार का प्रदर्शन मोदी सरकार की तुलना में काफी बेहतर था। उस दौर में भारत ने बाजार मूल्य के संदर्भ में दो बार दो अंकों की वृद्धि दर हासिल की थी।

 
शायद ही कोई होगा जिसे इन आंकड़ों से आश्चर्य हुआ होगा। वृद्धि के मोर्चे पर मोदी सरकार का प्रदर्शन अप्रत्याशित रूप से कमजोर रहा है। ऐसा उसकी अपनी गलतियों की वजह से हुआ है। सरकार ने लंबे समय तक निजी निवेश के संकट की अनदेखी की, उसने बैंकिंग क्षेत्र के आवश्यक सुधार को अंजाम नहीं दिया, वस्तु एवं सेवा कर के रूप में एक अनावश्यक जटिलता वाला कर सुधार किया जबकि इसे आसान और वृद्धि को गति देने वाला बनाया जा सकता था। नोटबंदी की कवायद ने देश की अर्थव्यवस्था को ऐतिहासिक क्षति पहुंचाई। इन बातों के चलते देश की वृद्धि दर 7 फीसदी के आसपास ठिठकी रही जबकि वैश्विक व्यापार और वृद्धि में सुधार होता गया। मोदी के कार्यकाल के अधिकांश वक्त तेल कीमतें भी कमजोर रहीं लेकिन उनका भी फायदा वृद्धि के मोर्चे पर नहीं दिखा। जहां तक चीन के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन की बात है तो सच यह है कि हमने कोई सुधार नहीं किया है, चीन जानबूझकर धीमा पड़ गया है। उसने ऐसा अपनी अर्थव्यवस्था को नए सिरे से संतुलित करने के लिए किया है। वह अपने पुराने तयशुदा निवेश आधारित वृद्धि मॉडल को बदलना चाहता है। असली सवाल तो यह होगा कि भारत की वृद्धि ने वैश्विक वृद्धि को पीछे छोड़ा या नहीं? इस मानक पर देखें तो संप्रग के दूसरे कार्यकाल की सरकार मोदी सरकार से बेहतर थी। 
 
वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अपने एक ब्लॉग में लिखा है कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने देश की वृहद आर्थिक स्थिति को लेकर जो अनुमान लगाया है वह अब 2014 की तुलना में अधिक सकारात्मक है। अन्य लोगों ने 2013 के खतरे की याद दिलाई है जब भारत को चालू खाते के घाटे की स्थिति के कारण अत्यंत कमजोर माना जा रहा था। फिर भी सच तो यही है कि तब से अब तक बहुत कम ढांचागत बदलाव आए हैं। रुपया इस वर्ष एशिया की सबसे खराब प्रदर्शन वाली मुद्रा बना हुआ है। आयात की तुलना में भारत का विदेश मुद्रा भंडार बेहतर है जिससे चालू खाते की स्थिति सहज होने का अनुमान लगता है लेकिन उसके लिए तेल तथा अन्य जिंसों की कमजोर कीमत बड़ी वजह है। वैश्विक तेल कीमतों को लेकर हमारी संवेदनशीलता का कोई हल नहीं निकल सका है। वह कमजोरी आज भी वैसी ही है जैसी 2013 में या 1991 में थी। आज हमें बिना ऊंची तेल कीमतों के भी चालू खाते का घाटा 2.8 फीसदी या 3 फीसदी के स्तर पर देखने को मिल रहा है।
 
दूसरे शब्दों में कहें तो मोदी सरकार यह दावा नहीं कर सकती कि उसने बिना वैश्विक कारकों के वृहद आर्थिक स्थिरता उत्पन्न की है। वह यह भी नहीं कह सकती कि संप्रग सरकार का आर्थिक प्रदर्शन वैश्विक परिस्थितियों की बदौलत था। उसे कोई एक दलील चुननी होगी और उसके साथ रहना होगा। जहां तक पारदर्शिता लाने का दावा है, एक हद तक यह बात सही है। डेटाबेस के डिजिटलीकरण के कारण कर संग्रह को आसानी से जांचा-परखा जा सकता है और प्राकृतिक संसाधनों को बाजार या नीलामी प्रक्रिया के तहत देने की प्रक्रिया मजबूत हुई है। परंतु यह दलील गलत है कि इससे भविष्य में बेहतर जीडीपी दर हासिल करने में मदद मिलेगी। निवेश और वृद्घि को तेजी प्रदान करने के लिए एक स्पष्टï नीतिगत और वैधानिक निरंतरता की आवश्यकता है जो मौजूदा प्रशासन में नहीं दिखती। कर सुधार लंबित हैं, प्रत्यक्ष कर संहिता को त्याग दिया गया और छापेमारी के दौर की आशंका बनी रहती है।
 
शुल्क और क्षेत्रवार प्रोत्साहनों की मदद से अर्थव्यवस्था के खास हिस्से को गति दी जा रही है। इससे भविष्य में नीतिगत पलटाव की आशंका उत्पन्न हो रही है। फंसे हुए कर्ज की समस्या को ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता की मदद से एक हद तक हल किया गया है। यह मोदी सरकार के बड़े सुधारों में से एक है। परंतु बिजली और नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में नई संभावित फंसी हुई परिसंपत्ति के सामने आने की आशंका है।  सीधी बात यह है कि मनमोहन सिंह की सरकार ने कुछ बड़ी गलतियां की थीं लेकिन उसका आकलन कुछ बुरे वर्षों के आधार पर किया जाता है। मोदी सरकार ने भी बड़ी गलतियां की हैं लेकिन उसका आकलन अनुकूल आधार पर किया जाता है और भविष्य को लेकर जबरन उम्मीद जताई जाती है। 2014 में जब मोदी सत्ता में आए तो उन्हें अनुकूल हालात मिले। तेल कीमतें ढह गईं। लोकसभा में उनकी पार्टी का बहुमत था और वे पर्याप्त राजनीतिक पूंजी के साथ सत्ता में आए। वैश्विक वृद्घि सुधर रही थी, चीन में धीमापन आ रहा था, अन्य विकासशील देशों के लिए अवसर थे। वर्ष 2003 के बाद से ही भारत ने वृद्घि हासिल करने में परिस्थितियों का लाभ लिया। 2014 के बाद ऐसा नहीं हुआ। जीडीपी के आंकड़ों का आकलन इसी सामान्य मानक पर होना चाहिए। चाहे कितना भी प्रचार किया जाए, सच को नहीं बदला जा सकता है। 
Keyword: GDP, fiscal deficit, राजकोषीय घाटा जीडीपी,
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