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नहर सिंचाई को लेकर जागने का है वक्त

रमेश चंद और शांभवी शरण /  August 29, 2018

यह विडंबना ही है कि तमाम निवेश के बावजूद नहर के माध्यम से सिंचाई का रकबा स्थिर ही नहीं है बल्कि इसमें गिरावट भी देखने को मिल रही है। बता रहे हैं रमेश चंद और शांभवी शरण

 
नहरों के माध्यम से सिंचाई पहली पंचवर्षीय योजना से ही देश की सरकार की प्राथमिकता रही है। इसे ध्यान में रखते हुए ही मझोली और बड़ी सिंचाई परियोजनाओं में निवेश भी किया गया है। यही वजह है कि सरकारी नहरों से सिंचित रकबा सन 1950-51 के 71 लाख हेक्टेयर से बढ़कर सन 1980-81 तक 144 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गया। इन तीन दशक में कुल सिंचाई में सरकारी नहरों से सिंचित क्षेत्र की हिस्सेदारी भी 34 प्रतिशत से बढ़कर 37 फीसदी हो गई।  सरकारी नहरों से सिंचित क्षेत्र अगले दशक में भी बढ़ता रहा और सन 1991-92 में यह 173 लाख हेक्टेयर के उच्चतम स्तर पर भी पहुंचा। परंतु इस अवधि में भूजल सिंचाई कहीं अधिक तेजी से बढ़ी। सन 1991-92 के बाद से करीब आठ वर्ष तक नहरों से सिंचाई का राष्ट्रीय स्तर ठिठका रहा। उसके बाद से इसमें तेज गिरावट आनी शुरू हो गई और वर्ष 2002-03 में यह 138.7 लाख हेक्टेयर के निम्रतम स्तर पर आ गया। 
 
अगले चार वर्ष में कुछ सुधार हुआ लेकिन उसके बाद फिर ठहराव और गिरावट का दौर आ गया। वर्ष 2011-12 से 2014-15 के बीच नहरों द्वारा सिंचित क्षेत्र 160 लाख हेक्टेयर के करीब बना रहा। यह 20 वर्ष पहले से 10 लाख हेक्टेयर कम था। देश में मझोली और बड़ी सिंचाई परियोजनाओं में इतने निवेश के बावजूद नहरों के जरिये सिंचाई के रकबे में ठहराव और कमी चकित कर सकती है। वर्ष 1993 से 2014 के बीच देश में इन सिंचाई परियोजनाओं में पूंजीगत व्यय के मौजूदा मूल्य से औसतन 176.63 अरब रुपये वार्षिक व्यय किए गए। यह रुझान बताता है कि सिंचाई परियोजनाओं पर किए गए संसाधनों के व्यय की करीबी जांच पड़ताल की जरूरत है।
 
अब भूतपूर्व हो चुके योजना आयोग को भी नहर सिंचाई रकबे में आए ठहराव और गिरावट पर ध्यान देने में करीब दो दशक का वक्त लगा। 12वीं पंचवर्षीय योजना (2011) के लिए तैयार दृष्टिïकोण पत्र में यह स्वीकार किया गया कि इन बड़ी और मध्यम आकार की सिंचाई परियोजनाओं में काफी निवेश किया गया लेकिन सिंचित क्षेत्र में कोई खास इजाफा देखने को नहीं मिला। पत्र यह भी बताता है कि इन परियोजनाओं में से अनेक तो 30-40 वर्ष तक पूरी ही नहीं हो सकीं। जबकि बड़ी परियोजनाओं को 15-20 वर्ष में जबकि मझोली परियोजनाओं को 5 से 10 वर्ष तक की अवधि में पूरा हो जाना चाहिए। पत्र के अनुसार इससे पता चलता है कि देश भर में सिंचाई परियोजनाओं की क्या स्थिति है। 
 
नहरों से सिंचाई के क्षेत्र में कमजोर प्रगति के लिए सिंचाई क्षमताओं की निर्मित क्षमताओं का पूरा इस्तेमाल न हो पाना भी एक वजह बनता है। नौवीं पंचवर्षीय योजना (1997-2002) के बीच संभावित निर्मित और संभावित इस्तेमाल के बीच का अंतर  25 फीसदी था और 10वीं योजना (2002-07) के बीच यह बढ़कर 36 फीसदी हो गया। 11वीं योजना (2007-12) के दौरान यह घटकर 21 फीसदी रहा। जबकि 11वीं योजना की अवधि में बड़ी और मझोली सिंचाई परियोजनाओं पर 17,447.3 करोड़ रुपये की राशि व्यय की गई। आंकड़ों में कहीं यह नजर नहीं आया कि नहरों से सिंचाई क्षमता का विस्तार हुआ हो। हमें राज्यवार आंकड़ों पर नजर डालनी चाहिए क्योंकि सभी राज्य एक समान रुझान का पालन नहीं करते।
 
आंध्र प्रदेश ने वर्ष 1992-93 से 2011-12 तक हर वर्ष सिंचाई पर 3,537 करोड़ रुपये खर्च किए जबकि इस दौरान नहर से सिंचाई के रकबे में कोई इजाफा नहीं हुआ। वर्ष 1992-93 से 2004-05 के बीच महाराष्ट्र ने नहर सिंचाई क्षमता विस्तार में शीर्ष स्थान हासिल किया। उसके बाद से सालाना 6,669 करोड़ रुपये खर्च किए जाने के बाद भी नहर सिंचाई का रकबा 10.80 लाख हेक्टेयर के इर्दगिर्द थमा रहा। मध्य प्रदेश और बिहार में इसमें 3.5 फीसदी की गिरावट देखने को मिली लेकिन अन्य बड़े राज्यों में यह गिरावट 10 से 65 फीसदी के बीच रही। झारखंड नहर सिंचाई के क्षेत्र में 65 फीसदी की गिरावट के साथ सबसे ऊपर रहा। हिमाचल प्रदेश 42 प्रतिशत के साथ दूसरे स्थान पर और तमिलनाडु 23 फीसदी के साथ तीसरे स्थान पर रहा। मात्र 6.82 लाख हेक्टेयर के साथ उत्तर प्रदेश में नहर सिंचाई क्षेत्र में अत्यधिक गिरावट देखने को मिली जबकि उसने 1992-93 से 2013-14 के बीच उसने सिंचाई परियोजनाओं पर सालाना 921 करोड़ रुपये व्यय किए। पश्चिम बंगाल में नहर सिंचाई का रकबा वर्ष 1992-93 से 2003-04 के बीच 6.2 फीसदी घटा। जबकि मौजूदा दर पर सालाना पूंजीगत व्यय 86.49 करोड़ रुपये रहा। वर्ष 2003-04 के बाद राज्य में नहर सिंचाई के आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। 
 
दूसरी ओर, कर्नाटक, गुजरात, राजस्थान तथा जम्मू कश्मीर में सन 1992-93 से 2013-14 के बीच नहर सिंचाई के रकबे में 30 फीसदी से अधिक का इजाफा हुआ। छत्तीसगढ़ में यह बढ़ोतरी 29 फीसदी और असम में 11 फीसदी रही।  नहर सिंचाई के रकबे में आ रही गिरावट भूजल के इस्तेमाल पर दबाव बढ़ा रही है। इससे अलग तरह की समस्याएं उत्पन्न होती हैं। कुल सिंचित रकबे में नहर सिंचाई की हिस्सेदारी सन 1984-85 के 37.5 फीसदी से घटकर 2014-15 में 23.43 फीसदी रह गई। नहर सिंचाई के कमजोर प्रदर्शन की एक और वजह जल बहाव की गति में कमी भी है। इसके चलते किसान भूजल सिंचाई को अपना रहे हैं। नहरों का रखरखाव खराब होना भी इसके लिए जिम्मेदार है। अधिक पानी के इस्तेमाल वाली फसलों की खेती भी भूजल दोहन के लिए जिम्मेदार है। 
 
वर्ष 2015 में प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना की शुरुआत की गई। इसका लक्ष्य है मझोली और बड़ी सिंचाई परियोजनाओं के कमजोर प्रदर्शन की समस्या को दूर करना और नहर सिंचाई की व्यवस्था को दुरुस्त करना। इसके तहत सिंचाई परियोजनाओं में सार्वजनिक निवेश में आमूलचूल बदलाव लाना है ताकि संभावित क्षमता और इस्तेमाल के बीच के अंतर को पूरा किया जा सके और अधूरी परियोजनाओं को तेज गति से पूरा किया जा सके।  उम्मीद है कि सार्वजनिक सिंचाई को लेकर रुख में यह बदलाव हमें मध्यम और बड़ी सिंचाई परियोजनाओं में किए जा रहे निवेश पर सही प्रतिफल प्रदान करेगा। 
 
(रमेश चंद नीति आयोग के सदस्य हैं। शांभवी शरण युवा पेशेवर हैं। लेख में प्रस्तुत विचार उसके निजी हैं।)
Keyword: irrigation, farmer, agriculture,,
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