बिजनेस स्टैंडर्ड - एमएसपी की उलझन
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एमएसपी की उलझन

संपादकीय /  August 29, 2018

महाराष्ट्र सरकार ने ऐसे किसी भी प्रस्ताव से इनकार किया है कि कृषि जिंसों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर नहीं खरीदने वाले कारोबारियों को दंडित किया जाएगा। भले ही राज्य सरकार ने ऐसा कहने में थोड़ी देर की लेकिन इससे इस अफवाह के कारण कृषि बाजार में मची अफरातफरी कम होगी। बहरहाल इसने कारोबारियों को सरकार के इरादों के प्रति सतर्क भी कर दिया है। राज्य की कई प्रमुख कृषि मंडियों में पिछले कुछ दिनों में या तो बहुत सीमित कारोबार हुआ है या फिर वे बंद रहीं। यह किसानों के लिए नुकसानदेह रहा। 
 
जैसा कि एक सरकारी अधिकारी ने स्वीकार भी किया, किसानों को एमएसपी देना सरकार की प्रतिबद्धता है, न कि कारोबारियों की। कारोबारियों को बाजार द्वारा निर्धारित मूल्य के अलावा कोई भी मूल्य चुकाने पर मजबूर नहीं किया जा सकता है। ऐसा केवल तभी हो सकता है जब सरकार कारोबारियों को होने वाले नुकसान की भरपाई करे। अगर मान लिया जाए कि गड़बड़ी करने वाले कारोबारियों को जेल भेजने से सरकार की मंशा यह कहने की थी कि वह नए एमएसपी (लागत से 50 फीसदी अधिक) को लागू करने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं छोडऩा चाहती है तो भी यह कहा जा सकता है कि इससे कोई हल नहीं निकलने वाला। अधिकांश कृषि जिंस आधिकारिक दरों से कम पर कारोबार कर रही हैं। किसान इससे अनभिज्ञ नहीं होंगे।
 
संयोगवश, एमएसपी को किसानों का कानूनी अधिकार बनाना, महाराष्ट्र तथा अन्य राज्यों में हाल में हुए किसान आंदोलनों की एक प्रमुख मांग थी। कृषि जिंसों के मूल्य निर्धारण पर सरकार को सलाह देने वाले कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) ने भी वर्ष 2017-18 की खरीफ मूल्य नीति रिपोर्ट में यह सुझाव दिया था। अच्छी बात यह है कि बाजार के अनुकूल कई उपाय भी मौजूद हैं जिनकी मदद से यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि किसानों को आधिकारिक रूप से निर्धारित मूल्य प्राप्त हो सके। एमएसपी के क्रियान्वयन के तरीके या तरीकों के बारे में अंतिम निर्णय केंद्र को ही लेना होता है क्योंकि इसमें उसकी वित्तीय भागीदारी अनिवार्य है। महाराष्ट्र सरकार को केंद्र के निर्णय की प्रतीक्षा करनी चाहिए।
 
केंद्र सरकार ने नीति आयोग से भी कहा था कि वह किसानों को एमएसपी मिलना सुनिश्चित करने के तरीके सुझाए। उसने इस विषय में तीन सुझाव दिए थे जिन पर विचार किया जा सकता है। इनमें से एक तरीका यह है कि मूल्य समर्थन व्यवस्था में निजी क्षेत्र की व्यापक भागीदारी इस तरह सुनिश्चित की जाए कि बाजार में कोई विसंगति न आए। इसके लिए उसने कर रियायत और राजकोषीय प्रोत्साहन जैसे उपाय सुझाए थे। आयोग ने यह भी कहा था कि निजी कारेाबारियों को आधिकारिक मूल्य पर जिंस खरीद और पारदर्शी ढंग से भंडारण प्रबंधन के लिए प्रोत्साहित करने की खातिर उन्हें नीतिगत प्रोत्साहन भी दिया जाना चाहिए। अन्य दो तरीकों में मौजूदा बाजार आश्वस्ति योजना (राज्य सरकार खरीद और वितरण का काम संभालती है और केंद्र नुकसान की भरपाई करता है) और चुनिंदा फसलों के लिए मध्य प्रदेश और हरियाणा में अपनाई जा रही भावांतर भुगतान योजना शामिल हैं। नीति आयोग ने राज्य सरकारों से जो चर्चा की उनमें प्रोत्साहन आधारित निजी खरीद की व्यवस्था सबसे बेहतर मानी गई है। अनुमान है कि यह करदाताओं पर सबसे कम बोझ डालेगी, बाजार को प्रभावित नहीं करेगी और सरकार को खरीद के बाद भंडारण और प्रबंधन के दायित्व से बचाएगी। यह निजी क्षेत्र को कृषि विपणन में प्रमुखता प्रदान करेगी। केंद्र को इस विषय में जल्दी निर्णय लेना चाहिए ताकि राज्यों को खरीफ विपणन सत्र के पहले तैयारी का वक्त मिल सके और महाराष्ट्र जैसी स्थिति न पैदा हो।
Keyword: maharashtra, MSP, crop, jins,,
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