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अच्छी समाधान प्रणाली की तरफ बढ़ा सराहनीय कदम

बाअदब
सोमशेखर सुंदरेशन /  August 28, 2018

भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) की बनाई एक समिति ने विवाद समाधान प्रक्रिया के नियामकीय ढांचे में सुधारों पर अपनी अनुशंसाएं दे दी हैं। भारतीय पूंजी बाजार इस मामले में लगातार जूझता रहा है। इस समिति ने कुछ पहल की है और कुछ मोर्चों पर चूक भी की है लेकिन सुधार संबंधी कुछ अहम सुझावों के साथ सामने आना काफी मायने रखता है। इस रिपोर्ट में इस विषय पर अमेरिकी जानकारी की भरमार है लेकिन फैसला सुनाने संबंधी जटिल सुधारों की कमी है। हालांकि इसमें मौजूदा समाधान प्रणाली के कुछ मनमाने एवं असाध्य पहलुओं को दुरुस्त करने पर ध्यान दिया गया है। समिति ने अर्जित लाभों और निहित हानियों के परिमाणन संबंधी सिद्धांतों पर एक और रिपोर्ट जारी करने की बात कही है जिसका बेसब्री से इंतजार किया जाना चाहिए। रिपोर्ट में कुछ अहम सुधारात्मक उपायों का जिक्र होना प्रशंसनीय है।

 
पहला, केवल दो सदस्यीय समिति बनाने के लिए सेबी की तारीफ की जानी चाहिए। इस समिति में एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश और उच्चतम न्यायालय में सेबी के स्थायी वकील को जगह दी गई है। दरअसल अधिक सदस्यों वाली बड़ी समितियां किसी जटिल एवं तकनीकी मुद्दे की बारीकियों पर ध्यान केंद्रित करने में चुनौतीपूर्ण साबित होती हैं। दूसरा, मौजूदा समाधान ढांचे में अपकृत्यों का जातीय स्वरूप भी सुधारों के दायरे में रखा गया है। समिति ने मौजूदा विनियमों में दिखने वाले बेतुकेपन से दूर रहने की बात कही है। मसलन कुछ अपकृत्यों का कभी भी समाधान नहीं हो सकता है, सेबी भले ही अपने विवेक पर उन मामलों का निपटारा भी कर सकता है। 
 
इसके बजाय समिति ने सिद्धांतों पर आधारित समाधान ढांचे की तरफ बढऩे का सुझाव रखा है जिसमें बाजार पर व्यापक असर रखने वाले, अधिक निवेशकों को हुए नुकसान और बाजार की निष्ठा को चोट पहुंचाने वाले मामलों का समाधान नहीं करने की बात कही गई है। वैसे यह पैमाना काफी हद तक व्यक्तिनिष्ठ है क्योंकि हरेक मामला तकनीकी रूप से बाजार की प्रामाणिकता को प्रभावित कर सकता है। लेकिन इस तरह का रवैया रखने से कम-से-कम यह संकेत तो जाएगा कि कुछ अपकृत्य दूसरों से बेहतर या बदतर होते हैं। इससे इन मामलों की सुनवाई होने पर न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े लोगों को भी संदेश भेजे जा सकेंगे। ऐसे मामलों का भी निपटारा कर सकने की सेबी की क्षमता को काफी हद तक वस्तुनिष्ठ मानक के जरिये बरकरार रखा गया है, जैसे कथित आरोपी की तरफ से कोई उपचारात्मक उपाय करना।
 
तीसरा, समाधान का प्रस्ताव पेश कर पाने की समयसीमा को बदला गया है लेकिन सेबी ने प्राकृतिक न्याय के अनुरूप सुधार करने का शानदार मौका गंवा दिया है। फिलहाल नोटिस मिलने के 60 दिनों के भीतर समाधान के लिए प्रस्ताव रखे जा सकते हैं। मौजूदा दौर में भी प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुपालन को लेकर एक अद्र्ध-न्यायिक अधिकारी का नजरिया दूसरे अधिकारी से अलग होता है। कुछ अधिकारी मामले से संबंधित रिकॉर्ड का पूरा मुआयना करने की इजाजत देते हैं जबकि कुछ अधिकारी चुनिंदा तथ्यों तक ही पहुंच होने देते हैं। कई बार तो निष्पक्ष मुआयने की मांग को लेकर महीनों तक कानूनी लड़ाई चलती रहती है। 
 
रिकॉर्ड का मुआयना पूरा हो जाने के बाद 60 दिनों के भीतर जवाब देने की समयसीमा शुरू होनी चाहिए ताकि कारण बताओ नोटिस में आरोपित व्यक्ति के पास पूरे मामले को समझ पाने का मौका मिले और उसके गुण-दोषों के आधार पर वह समाधान प्रस्ताव रख सके। आरोपों को चुनौती देने का मन बना चुके पक्ष के लिहाज से भी ऐसा करना सही होगा। समिति इस प्रक्रिया में भी सुधारों का प्रस्ताव रख सकती थी लेकिन ऐसा नहीं किया गया है। असल में समिति ने यह प्रस्ताव रखा है कि अब 60 दिनों के बजाय 120 दिनों के भीतर समाधान प्रस्ताव रखा जा सकता है लेकिन उसे विलंब के लिए 25 फीसदी वार्षिक दर से ब्याज देने के लिए राजी होना होगा।
 
चौथा, विवाद निपटान संबंधी नजरिये के संदर्भ में इस समिति ने कहा है कि सेबी को पड़ताल पूरी किए बगैर किसी भी समाधान प्रस्ताव पर विचार नहीं करना चाहिए। वास्तव में, समिति ने यह कहा है कि सेबी को ऐसा रवैया तभी अपनाना चाहिए जब इससे जांच पूरी करने में मदद मिलती हो। यह पीछे की तरफ जाने वाला कदम है। इसके बजाय समिति को इस पर गौर करना चाहिए था कि आज भी सेबी कुछ मामलों में जांच पूरी किए बगैर नोटिस जारी करता है। अगर किसी मामले में कारण बताओ नोटिस जारी किया जा सकता है तो उसे समाधान के लायक भी माना जाना चाहिए। समिति ने समाधान प्रक्रिया जारी रहने के दौरान भी अंतरिम आदेश पारित कर पाने की सेबी के अधिकारों को बरकरार रखने की बात कही है। अगर ऐसा है तो नोटिस जारी होने के पहले ही सेबी के पास जाने के लिए भारतीय प्रतिस्पद्र्धा आयोग की तर्ज पर इनाम भी रखा जाना चाहिए। आखिर में, इस समिति ने माना है कि समाधान की शर्तों से संबंधित हिस्से या पहचान को गोपनीय रखना भी समाधान की एक शर्त हो सकती है। समिति ने गोपनीयता पर विस्तृत चर्चा की है लेकिन वह इसे एक विचारणीय विषय के तौर पर स्वीकार करने के लिए ही राजी हुई है। इस पर अधिक तवज्जो और चर्चा की जरूरत है। संभवत: सार्वजनिक टिप्पणियां आने से इस पर एक जानकारीपरक चर्चा हो सकेगी। 
 
समिति ने अस्वीकृति संबंधी नियमों का विस्तृत खाका भी पेश किया है लेकिन सेबी और आरोपित व्यक्ति के बीच होने वाली शुरुआती चर्चाओं के नियमन पर कोई बात नहीं की है। इस समय दो सिद्धांतों के बीच विरोधाभास नजर आता है। जहां बचाव पक्ष की ताकत अप्रासंगिक मानी जाती है वहीं कथित उल्लंघन के 'बड़े' एवं 'छोटे' चरित्र को ध्यान में रखने की बात कही जाती है। यह एक ऐसा क्षेत्र है जिस पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है। 
 
(लेखक अधिवक्ता एवं स्वतंत्र परामर्शदाता हैं)
Keyword: share, market, sebi, भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी),
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