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जानकारियों से भरे खजाने हैं सरकारी गजेटियर

विवेक देवरॉय /  August 28, 2018

भारतीय इतिहास एवं संस्कृति के अध्ययन में सरकारी गजेटियर काफी उपयोगी साबित हो सकते हैं। सूचना संकलित करने वाले इन सरकारी प्रकाशनों की महत्ता पर प्रकाश डाल रहे हैं विवेक देवरॉय

 
भारत में सबसे पुराना कानून कौन है? कई पुराने कानूनों को खत्म किया जा चुका है। फिर भी भारत में मौजूद सबसे पुराना कानून 1836 का है। बंगाल जिला अधिनियम के तौर पर चर्चित इस कानून में महज एक पंक्ति ही है। इस कानून के मुताबिक 'पश्चिम बंगाल के किसी भी हिस्से में नए जिलों के गठन की शक्ति राज्य सरकार के पास होगी। नए जिले बनाने के लिए सरकारी गजट में अधिसूचना जारी करनी होगी।' हालांकि इस कानून का यह मौलिक आख्यान न होकर मौजूदा स्वरूप है। इस कानून में 1874, 1903, 1920, 1948 और 1950 में संशोधन किए गए। सवाल उठता है कि जब पुराने कानूनों को समाप्त किया जा रहा है तो फिर यह कानून अभी तक क्यों चला आ रहा है? इसका ताल्लुक संविधान के अनुच्छेद 372(1) के तहत केंद्र एवं राज्य सरकारों के बीच किए गए शक्ति विभाजन से है। अगर बंगाल जिला अधिनियम को खत्म किया जाना है तो वह पश्चिम बंगाल की विधानसभा ही कर सकती है, देश की संसद नहीं। संभवत: नए जिलों के गठन के लिए ऐसे कानून की जरूरत है तभी तो बांग्लादेश ने इस कानून को अपने यहां अब भी लागू किया हुआ है? लेकिन मुझे इस तर्क पर संदेह है और अधिक संभावना यही लगती है कि निष्क्रियता के चलते ऐसा है। राज्यों के पास भूमि राजस्व कानून के तहत नए जिलों एवं अनुमंडलों के गठन की समुचित शक्ति है। ऐतिहासिक रूप से यह निष्क्रियता अविभाजित बंगाल में बने भूमि राजस्व नियमों से उपजी है। 
 
राज्यों के पास जिलों के गठन की शक्ति होने से जिलों की संख्या लगातार बदलती रहती है। वर्ष 2001 की जनगणना में देश में 593 जिले थे लेकिन 2011 की जनगणना में यह संख्या बढ़कर 640 हो गई थी। वर्तमान में इनकी संख्या 700 को भी पार कर चुकी है। विकास के किसी भी पैमाने से देखें तो इनमें से कुछ जिले विकसित हैं जबकि कुछ जिले मूल सुविधाओं से भी वंचित हैं। अभी आकांक्षी जिला कार्यक्रम चल रहा है जिसमें मार्च 2018 को आधार मानते हुए 115 पिछड़़े जिलों का विकास किया जाना है। इस तरह का निर्धारण नया नहीं है। वर्ष 2003 में लवीश भंडारी के साथ मैंने एक पुस्तक 'नई सहस्राब्दी में जिला-स्तरीय वंचना' का संपादन किया था। शंकर अय्यर ने इस तरह के निर्धारण के इतिहास पर एक शोध पत्र भी लिखा था। उनका कहना था कि अब तक 11 समितियों ने पिछड़े जिलों के निर्धारण का काम किया है। इनके अलावा पिछड़े जिलों की कुछ तदर्थ सूचियां भी बनी थीं। भले ही इन सूचियों में भिन्नताएं थीं लेकिन सभी सूचियों में कुछ जिले समान थे जो स्वतंत्रता के बाद से ही पिछड़े और आकांक्षी बने हुए हैं। 
 
जब हम राज्यों के बीच असमानताओं के बारे में सोचते हैं तो कई बार उसकी वजह बड़े राज्यों के भीतर की अंदरूनी असमानता भी होती है। बड़े राज्य अमूमन अधिक विविधताओं वाले होते हैं। पीछे छूट चुके जिले छोटे राज्यों की तुलना में बड़े राज्यों के विकास की रफ्तार को अधिक प्रभावित करते रहे हैं। राज्यों का सीमांकन ऐतिहासिक एवं प्रशासनिक कारणों से हुआ था और वे विकास एवं वंचना की परिसीमा का सम्यक अनुसरण नहीं करते हैं। हमें राज्यों से परे जिलों पर ध्यान देने की जरूरत है। आधे जिले औसत से थोड़ा बेहतर स्थिति में हैं (अगर मैंने यह कहा होता कि आधे जिले औसत से नीचे हैं तो लोग नाराज हो जाते)। जिलों को समझने के लिए जिला गजेटियर सूचना के भंडार हैं। 
 
गजेटियर में अत्यधिक महत्त्व की सूचनाएं होती हैं। उनकी महत्ता इसी से समझी जा सकती है कि प्रधानमंत्री ने लोकसभा में 28 अप्रैल, 1965 को दिए गए अपने भाषण में कच्छ के रण को भारत का हिस्सा बताने के लिए विभिन्न गजेटियर से प्राप्त सूचनाओं का जिक्र किया था। लिहाजा गजेटियर चाहे वे जिला, राज्य या केंद्र के हों, असल में राष्ट्रीय पूंजी हैं। इसमें शोध की भी काफी गुंजाइश है। स्वीडन स्थित अंतरराष्ट्रीय दस्तावेजी केंद्र ने इस तरफ इशारा करते हुए कहा है, 'भारतीय गजेटियर भारत के इतिहास एवं संस्कृति से जुड़े सभी अध्ययनों के लिए सूचना का जरूरी स्रोत होने के साथ ही शोध सामग्री के अतुलनीय संग्रह हैं।' रायबरेली जिला गजेटियर की वेबसाइट पर कहा गया है कि 'कुछ देशों के दस्तावेज संकलन केंद्रों ने नए एवं पुराने गजट की समूची शृंखला की माइक्रोफिल्म बनाने पर बड़ी धनराशि खर्च की है। अब इस बात को दूसरे देशों में भी स्वीकार किया जा रहा है।' मुझे हमेशा इस बात पर ताज्जुब हुआ है कि अधिक जिलों ने अपने गजेटियर क्यों नहीं तैयार किए हैं? ये तो जानकारी के खजाने हैं।
 
कुछ जिलों के गजेटियर पुराने हैं तो कुछ नए बनाए गए हैं। 'पुराना' होने का मतलब यह है कि ये गजेटियर उपनिवेश काल में 1870 के बाद से शुरू होकर 1930 तक के हैं। वहीं 'नये' गजट का मतलब है कि उन्हें आजादी के बाद आकार दिया गया। महाराष्ट्र और तमिलनाडु जैसे कुछ राज्यों ने आजादी के बाद भी गजेटियर के नए संस्करणों का प्रकाशन शुरू किया था। गजेटियर के प्रकाशन को 1957 में राष्ट्रीय परियोजना के तौर पर शुरू किया गया। सभी राज्यों को अपने गजट प्रकाशित करने थे और उनके पास गजेटियर विभाग भी होने चाहिए थे। पहली बात तो पूरी तरह सच है लेकिन दूसरी बात नहीं क्योंकि कुछ राज्यों में ही गजेटियर विभाग मौजूद हैं। अधिकतर लोग इससे सहमत होंगे कि ब्रिटिश सूचनाओं के अंकन में शानदार थे और मेरी निजी राय है कि औपनिवेशिक काल के पुराने गजेटियर की गुणवत्ता नए गजेटियर से बेहतर थी।
 
मैं सभी राज्यों के पुराने गजेटियर नहीं हासिल कर पाया हूं। लेकिन कर्नाटक, पश्चिम बंगाल, हरियाणा, मध्य प्रदेश, ओडिशा, महाराष्ट्र और पंजाब के गजेटियर मुझे मिले हैं। मुझे नहीं लगता है कि मेरे पास मौजूद गजेटियर भी अपने आप में पूर्ण हैं लेकिन अपने स्तंभों में साझा करने लायक पर्याप्त जानकारियां उनमें भरी पड़ी हैं। ऐसी ही एक जानकारी विलुप्त हो चुकी सरस्वती नदी से संबंधित है। 
 
'कहा जाता है कि यमुना पहले पुरानी सरस्वती नदी के अपवाह मार्ग पर ही प्रवाहित होती थी और घग्गर नदी की एक सहायक नदी होती थी। घग्गर अपने आप में एक सशक्त एवं स्वतंत्र नदी प्रणाली थी जिसकी धारा हकरा (पुरानी सरस्वती) नदी की तलहटी से बहती थी। अनजान कारणों से यमुना-सतलज जल-विभाजक का स्तर ऊंचा हो गया जिससे इस नदी प्रणाली में विभाजन हो गया। यमुना पूर्व दिशा की ओर मुड़ गई जबकि घग्गर नदी प्रणाली की सहायक नदी सतलज का प्रवाह पश्चिम की ओर होने लगा।' इतिहास में रुचि रखने वाले लोग इस तरह की धारणा से परिचित हैं। मुझे यह काफी रोमांचित लगा कि 1883-84 के रोहतक के गजेटियर में इसका जिक्र है। 
 
(लेखक प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के चेयरमैन हैं। लेख में व्यक्त विचार निजी हैं)
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