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अनुचित प्रस्ताव

संपादकीय /  August 28, 2018

भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने खुदरा निवेशकों को शेयर बाजार में बड़ा जोखिम उठाने से रोकने के लिए आय या शुद्ध परिसंपत्ति मूल्य के आधार पर कारोबारी सीमा तय करने का प्रस्ताव रखा है। यह सुविचारित कदम नहीं है। टी के विश्वनाथन की अध्यक्षता में उचित बाजार आचरण को लेकर गठित समिति के प्रस्ताव के मुताबिक सेबी को खुदरा प्रतिभागियों की कारोबारी गतिविधि सीमित करना चाहिए। यह सीमा परिसंपत्ति मूल्य पर आधारित हो सकती है। जानकारी के मुताबिक बाजार नियामक अब ब्रोकरों को ऐसी व्यवस्था बनाने को कह रहा है जहां क्लाइंट ब्रोकरों के पास अपना विशुद्ध परिसंपत्ति मूल्य प्रमाणपत्र पेश करेंगे। उसी के अनुसार कारोबारी सीमा निर्धारित की जाएगी।

 
माना जा रहा है कि ऐसा करने से छोटे निवेशकों को बड़ा नुकसान होने से रोका जा सकेगा। परंतु इस प्रस्ताव को नकारने की तमाम वजह मौजूद हैं। बाजार नियामक का काम यह सुनिश्चित करना है कि कारोबार सही और पारदर्शी ढंग से हो और बाजार से किसी तरह की छेड़छाड़ न की जाए। इसमें ब्रोकरों की निगरानी करना और यह सुनिश्चित करना भी शामिल है कि विभिन्न एक्सचेंज उचित मार्जिन संग्रह करें ताकि डिफॉल्ट से बचा जा सके। परंतु किसी खास प्रतिभागी को होने वाला नुकसान कम करना बाजार नियामक का काम नहीं है।
 
परंतु इस मूलभूत सिद्धांत से परे जाकर जोखिम करने की इस व्यवस्था को लागू करने में व्यावहारिक और नैतिक दोनों तरह की कठिनाइयां हैं। किसी भी व्यक्ति की कुल परिसंपत्ति नितांत व्यक्तिगत मसला है, बशर्ते कि वह चुनाव मैदान में नहीं उतर रहा हो, क्योंकि चुनाव लडऩे पर आय की घोषणा अनिवार्य है। भारतीय शुद्ध आय पर कर नहीं चुकाते हैं, इसलिए उसका ब्योरा देने की भी कोई आवश्यकता नहीं है। अगर इसकी घोषणा का दबाव डाला गया तो यह सूचना सार्वजनिक हो जाएगी और ऐसे में अमीर व्यक्तियों के शोषण की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। अगर ऐसी व्यवस्था बनी तो इससे लागत में इजाफा होगा और खुदरा निवेशकों के बाजार में प्रवेश को लेकर अनुपालन संबंधी बाधा उत्पन्न होगी। हर खुदरा प्रतिभागी को कारोबार के पहले मूल्यांकन प्रमाणपत्र हासिल करने के लिए शुल्क चुकाना होगा। ब्रोकरों को ऐसे प्रमाणपत्रों के प्रमाण के लिए बुनियादी सुविधाएं जुटानी होंगी। अगर वे ऐसा नहीं कर पाए तो उनको नियामक का कोपभाजन बनना होगा।
 
इतना ही नहीं शुद्ध आय किसी भी व्यक्ति की निवेश करने की क्षमता का विश्वसनीय संकेतक नहीं है। इससे यह भी पता नहीं चलता है कि उसे वित्तीय निवेश के जोखिम की कितनी समझ है। अगर एक युवा पेशेवर शिक्षा ऋण चुकाने वाला है तो संभव है उसकी शुद्ध आय नकारात्मक हो। परंतु अगर उसकी बचत दर अच्छी है तो वह नकदी वाला भी हो सकता है और निवेश सक्षम भी। ऐसी कोई भी सीमा लागू की गई तो ऐसे निवेशक निवेश करने से वंचित रह जाएंगे। वहीं एक बुजुर्ग भूस्वामी का परिसंपत्ति मूल्य काफी अधिक हो सकता है जबकि हो सकता है उसे वित्तीय बाजारों की समझ ही न हो। 
 
निवेशकों को शिक्षित करना यकीनन सेबी के दायरे में आता है और उन ब्रोकरों पर भी लगाम लगानी चाहिए जो जानबूझकर लोगों को भ्रमित करते हैं। इसके लिए जागरूकता कार्यक्रम चलाए जा सकते हैं और सक्षम कष्ट निवारण तंत्र बनाया जा सकता है। हर निवेशक को निवेश के मूलभूत सिद्धांतों के प्रति जागरूक रखने के अलावा बाजार नियामक को इस प्रक्रिया में कोई हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। निवेशकों के धन का सूक्ष्म प्रबंधन करने की कोशिश सही नहीं होगी। यह बात खासतौर पर तब अधिक सही है जबकि इसमें शुद्ध परिसंपत्ति मूल्य और निवेशकों के लिए नए तरह के अनुपालन की शर्त शामिल हो।
Keyword: share, market, sebi, भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी),
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