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भारतीय उद्यमों के लिए वियतनाम में अपार अïवसर

सुरजीत दास गुप्ता /  August 28, 2018

दक्षिण कोरिया की दिग्गज कंपनी सैमसंग ने पिछले महीने नोएडा में अपनी मोबाइल फैक्टरी के उद्घाटन के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आमंत्रित किया था। कंपनी ने इसे अपनी सबसे बड़ी मोबाइल फैक्टरी बताया है। इस फैक्टरी पर निवेश लगभग 5,000 करोड़ रुपये से थोड़ा कम है। वही सैमसंग भारत से 3,000 किलोमीटर दूर स्थित देश वियतनाम में आठ फैक्टरियां लगाने पर पहले ही 1,09,200 करोड़ रुपये का निवेश कर चुकी है। इसमें से ज्यादातर निवेश मोबाइल फोन निर्माण के लिए किया गया है। इससे सैमसंग वियतनाम में सबसे बड़ी निवेशकों में से एक बन गई है। इन कंपनियों और सरकार द्वारा मुहैया कराए गए आकर्षक प्रोत्साहनों (सस्ती जमीन, कुछ समय तक कर में छूट, औद्योगिक पार्कों में अच्छा बुनियादी ढांचा) की बदौलत वियतनाम मोबाइल फोनों का विश्व में दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक बन गया है, जबकि पहले इस क्षेत्र में उसकी कोई मौजूदगी नहीं थी। मोबाइल फोन के वैश्विक निर्यात में वियतनाम की हिस्सेदारी 11 फीसदी पर पहुंच गई है। 

 
भारत की हिस्सेदारी कितनी है? भारत ने मोबाइल विनिर्माण के लिए अपने आक्रामक 'मेक इन इंडिया' कार्यक्रम और तेजी से बढ़ते घरेलू बाजार के बावजूद वियतनाम से 1.2 अरब डॉलर कीमत के मोबाइल फोन का आयात किया। भारत में आयातित एक-तिहाई फोन वियतनाम से आए हैं। नए वियतनाम का स्वागत कीजिए। कुछ दशक पहले तक वियतनाम की अर्थव्यवस्था बदहाल थी। लेकिन आज यह देश निर्यात का प्रमुख केंद्र बन गया है। वियतनाम मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, परिधान, फुटवियर और बहुत से कृषि उत्पादों का निर्यात करता है। कृषि उत्पादों में वह ब्राजील के बाद सबसे बड़ा निर्यातक है। काजू का सबसे बड़ा निर्यातक है। वियतनाम में चावल की उत्पादकता भारत से दोगुनी है। 
 
पिछले छह वर्षों में वियतनाम की प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) करीब 70 फीसदी बढ़कर 2,173 डॉलर (वर्ष 2016) पर पहुंच गया है। वियतनाम के घरेलू बाजार का दायरा बढ़ा है क्योंकि वियतनामी ज्यादा दोपहिया, कार, दवा उत्पाद खरीद रहे हैं और ज्यादा बिजली की खपत कर रहे हैं। इन सब तथ्यों का सार यह है कि वियतनाम में भारतीय उद्यमों के लिए बहुत मौके हैं। हालांकि भारतीय उद्यमों ने विदेशों में वित्त वर्ष 2018 में तेज रफ्तार से निवेश किया है। इस दौरान भारत से विदेश में निवेश दोगुना यानी 11.3 अरब डॉलर हो गया। लेकिन फिर भी भारत से वियतनाम में कुल एफडीआई 1 अरब डॉलर से कम रहा। दोनों देशों के बीच व्यापार महज 7.6 अरब डॉलर रहा, जो उनके व्यापार का एक फीसदी भी नहीं है। हालांकि दोनों देशों की वृद्धि अच्छी रही है। वियतनाम ने एक दशक में सबसे अधिक वृद्धि दर 6.8 फीसदी दर्ज की है, जबकि भारत की वृद्धि दर 6.7 फीसदी रही। 
 
अच्छी खबर यह है कि हालात बदल रहे हैं। मोदी सरकार ने अपनी 'पूर्व की तरफ देखो नीति' के तहत वियतनाम के साथ द्विपक्षीय व्यापार वर्ष 2020 तक बढ़ाकर 15 अरब डॉलर करने का महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है। गुणवत्ता को लेकर सवाल उठने के बावजूद भारतीय दवा कंपनियां उन शीर्ष तीन देशों की कंपनियों में शामिल हैं, जहां से वियतनाम दवाओं का आयात कर रहा है। गुणवत्ता से संबंधित मसले को लेकर वियतनाम ने 2016 में 39 भारतीय दवा कंपनियों को काली सूची में डाल दिया था।  अन्य क्षेत्रों में टाटा पहली कंपनी है, जिसने वियतनाम में 12 अरब डॉलर से अधिक का निवेश किया है। कंपनी की कुछ परियोजनाओं पर काम चल रहा है। यह फिलहाल फ्रीज-ड्राइड कॉफी प्रोसेसिंग प्लांट का काम पूरा कर रही है, जो अगले साल मार्च तक तैयार हो जाएगा। अगर टाटा समूह की वियतनामी सरकार के साथ बातचीत कुछ वर्षों पहले हासिल 2.2 अरब के निवेश वाले विद्युत संयंत्र के सौदे को लेकर पक्की हो जाती है तो निवेश के आंकड़े में और बढ़ोतरी हो सकती है। 
 
वियतनाम में टाटा संस के मुख्य कार्याधिकारी इंद्रनील सेनगुप्ता ने कहा, 'वियतनाम ट्रांस पैसिफिक पार्टनरशिप का हिस्सा है, जिसके यूरोपीय संघ, आसियान और दक्षिण कोरिया के साथ मुक्त व्यापार समझौते हैं। यह विनिर्माण के लिए एक आकर्षक जगह है क्योंकि इसकी निकट भविष्य में 60 फीसदी वैश्विक बाजार तक पहुंच होगी।' टाटा समूह ने कॉफी परियोजना के अलावा वियतनाम में एक रोलिंग मिल भी स्थापित की है।  यह देश आकर्षक घरेलू बाजार भी मुहैया कराता है। वियतनाम में एक ऐसा बाजार दोपहिया का है। वियतनाम एसोसिएशन ऑफ मोटरसाइकिल मैन्युफैक्चरर्स के मुताबिक देश में वर्ष 2017 के दौरान 32 लाख मोटरसाइकिल बिकीं। यह दोपहिया वाहनों का विश्व में चौथा सबसे बड़ा बाजार है। शीर्ष तीन बाजार चीन, भारत और इंडोनेशिया हैं। वियतनाम के दोपहिया वाहन बाजार में होंडा का दबदबा है, जिसकी बाजार हिस्सेदारी 60 फीसदी से अधिक है। 
 
इन संभावनाओं को देखते हुए भारतीय कंपनियां वियतनाम में रुचि दिखा रही हैं। इन कंपनियों में से एक बजाज ऑटो है। अन्य बहुत से वैश्विक बाजारों में सस्ती चीनी मोटरसाइकिलों का दबदबा है। इससे इतर वियतनाम का बाजार परिपक्व है। वहां के उपभोक्ता केवल कीमत देखने के बजाय उत्पाद की गुणवत्ता पर ध्यान देते हैं। कंपनी के प्रबंध निदेशक राजीव बजाज ने कहा, 'हां, हम जल्द ही इस बाजार में उतरेंगे। हमारा विश्लेषण दर्शाता है कि यह हमारे उत्पादों के लिए एक आकर्षक जगह है।' एत अन्य भारतीय कंपनी आयशर मोटर्स एक कदम आगे निकल गई है। इसने पिछले साल हो ची मिन शहर में एक बाइक स्टोर खोला है ताकि वह अपने तीन मॉडलों- बुलेट, क्लासिक 500 और कॉन्टिनेंटल जीटी 535 की मदद से वहां के मध्यम आकार की बाइकों का बाजार हासिल कर सके। रॉयल एनफील्ड के प्रमुख (अंतरराष्ट्रीय कारोबार) अरुण गोपाल ने कहा, 'विश्व के सबसे बड़े दोपहिया वाहन बाजारों में से एक होने के बावजूद वियतनाम ने बड़े आकार की बाइकों को तीन साल पहले मंजूरी दी है। रॉयल एनफील्ड ने वियतनाम में उपभोक्ताओं को वर्तमान विकल्पों से बेहतर उत्पाद मुहैया कराने के लिए प्रवेश किया है। पिछले 9 महीनों में रॉयल एनफील्ड को बाजार से अच्छा फीडबैक मिला है।' 
 
कंपनी के सीईओ सिद्धार्थ लाल ने पहले एक साक्षात्कार में संकेत दिया था कि इन बाजारों में प्रति व्यक्ति आय और दोपहिया वाहन की औसत कीमतें भारत से अधिक हैं। वियतनाम में शुरुआती स्तर की मोटरसाइकिल की कीमत करीब 68,000 रुपये है, जबकि भारत में यह 30,000 रुपये से 35,000 रुपये है। लाल कहते हैं कि अगर मांग बढ़ती है तो कंपनी इस क्षेत्र में एक असेंबली प्लांट लगाने के बारे में विचार कर सकती है।  आईटी सेवा क्षेत्र भी एक अन्य बड़ा मौका है। कैनन के पूर्व वरिष्ठ कार्याधिकारी और वियतनाम को लेकर योजना बना रही कंपनियों के लिए सलाहकार आलोक भारद्वाज ने कहा, 'पहले उनका जोर विनिर्माण पर था, लेकिन अब वियतनामी कंपनियों को अपने आईटी सिस्टम को सुधारने की जरूरत है। ये कंपनियां बैंकिंग और वित्तीय सेवा क्षेत्र में बहुत पीछे हैं। इससे छोटी भारतीय आईटी कंपनियों के लिए वहां मौके निकल रहे हैं।' 
 
भारद्वाज भारतीय कंपनी को एक वियतनामी बैंक को आईटी सेवाएं देने में मदद कर रहे हैं। उनका कहना है कि वियतनाम में एक फायदा यह है कि वह अपनी श्रम लागत स्थिर और भारत से कम रखने में सफल रहा है। उन्होंने कहा, 'एक औसत सेल्स पर्सन 250 से 300 डॉलर में उपलब्ध है, जबकि भारत में यह लागत कम से कम 400 डॉलर प्रति महीना है।' कुछ छोटी एवं मझोली कंपनियों ने उस क्षेत्र में अपना निर्यात आधार बनाया है। कुछ भारतीय मार्बल कारोबारियों ने वहां संयंत्र स्थापित किए हैं ताकि वियतनामी खदानों से निकलने वाले सफेद मार्बल को तराश कर दुनियाभर में निर्यात किया जा सके।  भारत ने वियतनाम के साथ रक्षा सहयोग को लेकर बातचीत भी तेज की है। रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस प्रतिनिधिमंडल की अगुआई की। मंत्री ने घोषणा की कि भारतीय कंपनियों के लिए प्लेटफॉर्म, स्पेयर्स और ओवरहॉल सर्विसेज में सह-उत्पादन के लिए असीम संभावनाएं हैं। कुछ कंपनियां पहला कदम बढ़ा चुकी हैं। सार्वजनिक क्षेत्र की भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड ने हनोई में एक कार्यालय खोला है। वहीं एलऐंडटी ने वियतनाम बॉर्डर गाड्र्स के लिए हाई स्पीड पेट्रोल बोट के डिजाइन और निर्माण का 10 करोड़ डॉलर का ठेका हासिल किया है। 
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