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शौचालय क्रांति ही पूरा कर सकेगी स्वच्छता अभियान का लक्ष्य

जमीनी हकीकत
सुनीता नारायण /  August 27, 2018

करीब दशक भर पहले जब दुनिया ने स्वच्छता संबंधी लक्ष्यों को लेकर चर्चा शुरू की तो यह काफी सरल लग रहा था। वर्ष 2000 में निर्धारित संयुक्त राष्ट्र सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों की समयसीमा जब 2015 में खत्म हुई तो 2 अरब से अधिक लोगों की पहुंच बेहतर स्वच्छता सुविधाओं तक हो चुकी थी। लेकिन उसके बाद भी करीब 2.6 अरब लोगों की पहुंच स्वच्छता साधनों तक नहीं हो पाई थी। यह दुनिया का एक आधा-अधूरा एजेंडा था। सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों के बाद लागू किए गए संपोषणीय विकास लक्ष्यों ने एक महत्त्वाकांक्षी वैश्विक लक्ष्य रखा कि स्वच्छता सुविधाओं तक पहुंच की समस्या का 2030 तक दुनिया से नामो-निशान मिट जाए। इस लक्ष्य को हासिल कर पाने में भारत (खासकर उत्तर प्रदेश, झारखंड, बिहार एवं ओडिशा) और अफ्रीका की भूमिका सबसे अहम है। 

 
पिछले दो दशकों ने दुनिया को कुछ अहम बातें सिखाई हैं। पहला, यह स्पष्ट है कि केवल शौचालयों का निर्माण ही स्वच्छता नहीं है। अगर मल-मूत्र जमीन में खराब ढंग से बने गड्ढïे के भीतर जमा होता है या शौचालय को खुली नाली से जोड़ा गया है तो उससे गंदगी फैलेगी और लोगों की सेहत पर बुरा असर पड़ेगा। अगर घरों में बने शौचालयों से जलजनित बीमारियों पर लगाम लगाने, बच्चों की पोषण क्षमता में सुधार और उत्पादकता बढ़ाने जैसे वांछित लाभ उठाने हैं तो फिर स्वच्छता गतिविधियां अलग तरह से चलानी होंगी। शौचालय का निर्माण इंसानी मल के प्रबंधन के हिसाब से करना होगा। पानी की उपलब्धता को भी ध्यान में रखना होगा। एक बार फिर, अगर लोग अपने हाथ नहीं धोएंगे और शौचालयों की सफाई नहीं करेंगे तो उससे उनकी सेहत पर बोझ बढ़ेगा। यह टॉयलट प्लस रणनीति है।
 
दूसरा, लोगों की आदतों में बदलाव के बगैर शौचालय भी असरदार नहीं होंगे। शौचालय बनाए जा सकते हैं लेकिन उनका इस्तेमाल लोगों को ही करना है। यही वजह है कि आज दुनिया इस पर सहमत है कि शौचालयों के इस्तेमाल से होने वाले लाभों के बारे में लोगों को शिक्षित किया जाना चाहिए। शौचालय के इस्तेमाल को सार्वजनिक स्वास्थ्य पर होने वाले असर से भी जोडऩा होगा। यह भी साफ है कि समूचे समुदाय को शौचालय उपयोग के लिए तैयार किया जाए ताकि इसे सामाजिक स्वीकृति मिले और इससे भटकने वाले लोगों पर सामाजिक दबाव बनाया जा सके। यह टायलट प्लस प्लस रणनीति है। 
 
सवाल है कि क्या इतना सबक काफी है? फिलहाल भारत खुले में शौच से आजादी के अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए कड़ी मशक्कत कर रहा है। इसमें कोई शक नहीं है कि शौचालयों के निर्माण और स्वच्छता के संदेश के प्रसार में काफी प्रगति हुई है। भारत सरकार स्वच्छता के इस लक्ष्य के लिए काफी हठधर्मी और  आक्रामक नजर आई है जिसकी जरूरत भी है। सरकार ने इस मद में पैसा भी खूब लगाया है। सरकार के स्वच्छ भारत अभियान में कोई वित्तीय अवरोध नहीं है। उम्मीद है कि वर्ष 2019 पूरा होने तक इस अभियान के तहत अधिकांश शौचालयों का निर्माण हो जाएगा और शहरों एवं गांवों को खुले में शौच से मुक्त घोषित कर दिया जाएगा। यह पूरी दुनिया के लिए एक अच्छी खबर है क्योंकि खुले में शौच करने वाले 10 में से छह लोग भारत के ही होते थे। इस लिहाज से यह खबर निश्चित तौर पर अच्छी है।
 
लेकिन क्या इतना ही काफी होगा? मुझे इस बात पर शक है कि 2019 के बाद भारत में स्वच्छता से जुड़े मसले अलग होंगे। चुनौती फिर भी मौजूद रहेगी। इसे किस तरह सुनिश्चित किया जाएगा कि शौचालयों का वजूद बना रहे और लोग उनका इस्तेमाल करते रहें। इसके अलावा इंसानी मल के सुरक्षित निपटान की व्यवस्था भी करनी होगी। अगर ऐसा नहीं होता है तो शौचालयों के निर्माण में किया गया भारी-भरकम खर्च व्यर्थ हो जाएगा। सरकार को भी लगेगा कि उसने अपनी जिम्मेदारी पूरी कर दी है और फिर उसकी प्राथमिकताएं बदल जाएंगी। लेकिन स्वास्थ्य के मोर्चे पर अपेक्षित नतीजे नहीं हासिल किए जा सकेंगे। इसके लिए तो शौचालय बनाने और लोगों को उनका इस्तेमाल करने के लिए समझाने के साथ ही पानी को प्रदूषित होने से भी बचाना होगा। किसी भी कीमत पर इससे बचना होगा। लेकिन भारतीय शौचालयों की सफलता को लंबे समय तक बरकरार रखने के लिए निगरानी और सार्वजनिक समीक्षा जारी रखनी होगी। ऐसा नहीं होने तक भारत सरकार को स्वच्छता अभियान की सफलता का दावा नहीं करना चाहिए।
 
फिर अफ्रीका के लिए स्वच्छता के क्या विकल्प रह जाते हैं? अफ्रीकी देशों में शहरीकरण की रफ्तार तेज है। वहां के लोग शहरी बस्तियों और कस्बों में तेजी से बस रहे हैं। खास बात यह है कि इन बस्तियों में गरीबों की भरमार है और काफी हद तक गैरकानूनी हैं। हमारी तरह इन अफ्रीकी देशों में भी जलापूर्ति और मल निकासी प्रणाली की स्थिति बेहद खराब है। शहरों में काफी दूर से पानी लाया जाता है लेकिन इस दौरान बहुत पानी व्यर्थ हो जाता है और पानी सभी लोगों तक नहीं पहुंच पाता है। इसका मतलब है कि शौचालयों से निकलने वाले दूषित जल के शोधन के बेहद किफायती तरीके तलाशने होंगे। शौचालय संबंधी तकनीक या तो आरंभिक दिनों की है या फिर इतनी महंगी है कि अधिकतर लोग इसका खर्च ही नहीं उठा सकते हैं।
 
लेकिन शौचालय क्रांति का अगला दौर इसी से जुड़ा होना चाहिए। यह शौचालयों के निर्माण में नहीं होकर शौचालयों से निकलने वाले अवशिष्टों के सुरक्षित निपटान से संबंधित होना चाहिए। इस में काफी अवसर भी हैं। इंसानी मल एक ऐसा संसाधन है जो मिट्टïी को संवद्र्धित कर सकता है जो उत्पादकता बढ़ाने में मददगार होगा। समस्या यह है कि इंसानी मल से बीमारियां भी पैदा होती हैं। ऐसे में क्या इसे जमीन में दबाकर इसका दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है? क्या पानी एवं मलनिकासी प्रणाली को स्थानीय स्तर पर पुनर्चक्रण से जोड़ा जा सकता है? ऐसा इंतजाम होना चाहिए।
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