बिजनेस स्टैंडर्ड - समस्याओं को बढ़ा देने वाला 'कोबरा इफेक्ट'
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समस्याओं को बढ़ा देने वाला 'कोबरा इफेक्ट'

अजय छिब्बर /  August 27, 2018

कई बार समस्या को दूर करने के लिए अपनाया गया रास्ता समस्या को और बढ़ा देता है। इस कोबरा इफेक्ट को कम करने पर आजाद देश को खास ध्यान देने की जरूरत है। बता रहे हैं अजय छिब्बर

 
हम ब्रिटिश दासता से आजादी के 72वें साल में प्रवेश कर चुके हैं। ऐसे मौके पर हमें समाधान के समस्या से भी बदतर हो जाने वाले 'कोबरा इफेक्ट' को ध्यान में रखना चाहिए। यह नामकरण भारत के औपनिवेशक काल की देन है जब अंग्रेजों ने लुटियंस दिल्ली में जहरीले कोबरा सांपों की समस्या दूर करने के लिए एक नकद प्रोत्साहन योजना चलाई थी। इस योजना के तहत मृत कोबरा सांपों की कई खालें लाने के बावजूद उनका प्रकोप कम नहीं हो रहा था। दरअसल हुआ यह था कि नकद प्रोत्साहन के लालच में दिल्ली के आसपास कई लोग कोबरा पालने लगे थे। लोग वहीं से मरे हुए सांपों की खाल लाकर दिखा देते थे। जब अंग्रेज हुक्मरानों को असलियत पता चली तो फौरन वह प्रोत्साहन योजना रोक दी गई। लेकिन इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि पैसे मिलने का लालच नहीं रहने पर कोबरा पालने वाले तमाम लोगों ने उन्हें खुला छोड़ दिया जिससे दिल्ली में कोबरा सांपों की संख्या और बढ़ गई। इस तरह कोबरा से निजात दिलाने के लिए शुरू की गई योजना के ही चलते समस्या बिगड़ गई। 
 
ऐसा अहसास बाद में भी होता रहा है। बेहद खराब प्रदर्शन करने वाले सार्वजनिक बैंक आईडीबीआई को उबारने के लिए बीमा उपक्रम एलआईसी का इस्तेमाल करने का फैसला करोड़ों पॉलिसी धारकों के जीवन बीमा को ही खतरे में डालने वाला है। इस फैसले में भी कोबरा इफेक्ट को महसूस किया जा सकता है। आखिर हम बैंकिंग अनुभव नहीं रखने वाली एक जीवन बीमा कंपनी से उस बैंक के संचालन की उम्मीद कैसे कर सकते हैं जो अपनी अक्षमता के लिए चर्चित है और उसका एक-तिहाई कर्ज एनपीए हो चुका है? 
 
एक निजी कंपनी आईएलऐंडएफएस को संकट से निकालने के लिए इस बीमा कंपनी का उपयोग करना इससे भी खराब कोबरा इफेक्ट है। इस निजी कंपनी में जापानी कंपनी ओरिक्स कॉर्पोरेशन (23.5 फीसदी) और अबुधाबी इन्वेंस्टमेंट फंड (12.6 फीसदी) के अलावा एचडीएफसी, एसबीआई और सेंट्रल बैंक की भी हिस्सेदारियां हैं। इससे पहले शायद ही कभी सुना गया हो कि एक निजी कंपनी को उबारने के लिए एक सार्वजनिक कंपनी ने 650 अरब रुपये के कर्ज की देनदारी का भी बोझ उठाया हो। विदेशी निवेशकों के निकलने के बाद एलआईसी के पास बहुलांश शेयर हो गए। यह स्पष्टï नहीं है कि नुकसान स्वीकार करने के बजाय सार्वजनिक कंपनी के अच्छे धन को भी फंसे कर्ज की वापसी के लिए लगा देना किसके हित में है? यह एलआईसी के अभागे पॉलिसीधारकों के हित में तो कतई नहीं है।
 
कोबरा इफेक्ट को हमारी व्यापार नीति में भी देखा जा सकता है। आयात में बढ़ोतरी और निर्यात में आई सुस्ती ने व्यापार घाटे की खाई को चौड़ा करने का काम किया है। अंतर्निहित कारणों पर ध्यान देने और निर्यात प्रोत्साहन के तरीके निकालने के बजाय भारत पुराने खराब निरंकुश दौर की ही तरफ लौटता नजर आ रहा है। भारत को इन निरंकुश नीतियों की भारी कीमत चुकानी पड़ी है और करीब चार दशकों तक भारत की आर्थिक प्रगति के 3-4 फीसदी के 'हिंदू वृद्धि दर' तक ही सीमित रहने में इसकी प्रमुख भूमिका रही है। विदेशी मुद्रा विनिमय को लेकर बड़ा संकट पैदा होने के बाद भारत अपनी अर्थव्यवस्था को उदार बनाने के लिए मजबूर हुआ था जिसके बाद निजी कंपनियों को भी रफ्तार मिली और देश 7-8 फीसदी की वृद्धि दर हासिल करने में सफल रहा। लेकिन 'मेक इन इंडिया' अब 'मेक इन इंडिया फॉर इंडिया' के रूप में तब्दील हो चुका है। जिस अर्थव्यवस्था को अधिक खुलापन और वैश्विक बाजारों में बड़ी हिस्सेदारी के लिए प्रयास करने चाहिए, वह खुद के भीतर ही सिमटने लगी है। यह रास्ता तो निश्चित रूप से हिंदू विकास दर की तरफ ही जाता है। 
 
हमारी कृषि नीति भी ऐसे ही कोबरा इफेक्ट की शिकार है। फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को लागत से 50 फीसदी अधिक कर हम किसानों को अधिक लुभावनी फसलें उगाने के लिए आजाद नहीं कर रहे हैं। असल में, हम उन्हें अधिक लागत वाली समाजवादी मूल्य-निर्धारण योजना में कैद कर रहे हैं। इसके अलावा किसान ऐसी फसलें उगाने के लिए भी प्रेरित होंगे जिनकी हमें जरूरत ही नहीं है। उन उपजों को भारतीय खाद्य निगम के गोदामों में ऊंची लागत पर रखा जाएगा। इस समस्या का सटीक समाधान शांता कुमार समिति ने सुझाया था लेकिन उसे लगातार नजरअंदाज किया गया। इसमें एफसीआई की भूमिका कम करने, कृषि मंडियों को अधिक आजादी देने और छोटे किसानों को प्रत्यक्ष लाभ समर्थन देना जैसे उपाय शामिल हैं। लेकिन इन उपायों के बजाय हमने वह उपाय लागू किया है जो किसानों को बाजार में मांग नहीं रहने वाली फसलों के लिए महंगे मूल्य समर्थन पर अधिक आश्रित बना देगा।
 
मुद्रास्फीति-नियंत्रण ढांचे में भी कोबरा इफेक्ट को महसूस किया जा सकता है। भारत की मुद्रास्फीति बड़े स्तर पर जिंसों के अंतरराष्ट्रीय मूल्यों और आपूर्ति कारकों से प्रभावित रहती है जबकि मौद्रिक नीति का प्रभाव सीमित रहता है। इसके बावजूद हमने मुद्रास्फीति पर काबू पाने के लिए एमपीसी के तौर पर व्यापक मौद्रिक ढांचा तैयार किया है। लेकिन एमपीसी अक्सर ब्याज दरों को काफी ऊंचा रखने की गलती करती है जिससे आर्थिक वृद्धि कम होती है और रुपये का अधिमूल्यन एवं प्रतिस्पद्र्धात्मक क्षमता कम होती है। एमपीसी को आर्थिक वृद्धि और महंगाई नियंत्रण दोनों को समान तवज्जो देनी चाहिए। कोबरा इफेक्ट का सबसे सटीक उदाहरण तो नोटबंदी के समय देखने को मिला था। काला धन खत्म करने के नाम पर नोटबंदी को बिना सही सलाह और तैयारी के ही लागू कर दिया गया लेकिन इसका काले धन पर कोई भी असर नजर नहीं आया है। इसके बदले खेती एवं असंगठित क्षेत्र अब भी नोटबंदी के गहरे प्रभावों से उबरने की कोशिश कर रहे हैं। 
 
निस्संदेह जीएसटी और दिवालिया कानून जैसे दीर्घावधि सुधार किए गए हैं जिनके अच्छे नतीजे देखने को मिलेंगे। प्रत्यक्ष लाभ अंतरण योजना (आधार के साथ या बगैर) का विस्तार सही दिशा में उठा कदम है। ये सभी योजनाएं संप्रग या राजग की पुरानी सरकारों के समय की हैं और उन्हें तमाम दलों का समर्थन हासिल था। राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना की ही संकल्पना पर आधारित आयुष्मान भारत योजना को अगर बढिय़ा से डिजाइन और क्रियान्वित किया जाए तो करोड़ों लोगों को बीमारी के चलते गरीबी के दुष्चक्र में फंसने से बचाया जा सकता है। हमें ऐसे ही कुछ और कदमों की जरूरत है, उन कदमों की नहीं जो आगे चलकर बड़ी समस्या पैदा कर देते हैं।
 
स्वतंत्र भारत अपनी बेशुमार समस्याओं का समाधान तलाशने में लगा हुआ है, ऐसे समय में उसे कोबरा इफेक्ट से बचना होगा। कहीं ऐसा न हो कि लुटियंस दिल्ली में जहरीले सांपों के भय से आजादी के लिए शुरू की गई योजना की ही तरह स्वतंत्र भारत की समस्याएं कम होने के बजाय बढ़ जाएं। 
 
(लेखक वाणिज्य एवं उद्योग संगठन फिक्की के मुख्य आर्थिक सलाहकार हैं) 
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