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आसां नहीं भारत के प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारियां निभाना

जिंदगीनामा
कनिका दत्ता /  August 26, 2018

वर्ष 2019 के आम चुनाव करीब हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की शवयात्रा के साथ पांच किलोमीटर का सफर पैदल तय किया तो उन्होंने शायद यही उम्मीद की होगी कि अपने पूर्ववर्ती नेता के करिश्मे का कुछ लाभ उनको भी मिलेगा। यह विडंबना ही कही जाएगी क्योंकि जिन दिनों अटल बिहारी वाजपेयी सक्रिय थे, मोदी और उनके बीच रिश्तों में कोई सहजता नहीं थी। दोनों नेताओं के बीच केवल धार्मिक कट्टïरता का ही अंतर नहीं है। इनमें से एक जहां तमाम विचारधाराओं के बीच स्वीकार्यता रखते थे, वहीं दूसरे को देश का सबसे अधिक ध्रुवीकृत करने वाला प्रधानमंत्री माना जाता है। एक को जहां अर्थव्यवस्था के कुशल प्रबंधक के तौर पर जाना जाता है, वहीं दूसरे ने देश की अर्थव्यवस्था का गंभीर कुप्रबंधन किया है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) या संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) की दोनों सरकारों के दौर में जीडीपी वृद्घि के ब्योरे में गए बिना (बैक  सीरीज के आंकड़े सामने आने के बाद से यह विषय सोशल मीडिया पर छाया हुआ है) भी मोदी इस बात को जानते हैं कि वह उन क्षेत्रों में नाकाम रहे हैं जिनमें उनके सफल रहने की उम्मीद की जा रही थी। दिल्ली की आद्र्रता भरी गरमी में तिरंगे में लिपटे वाजपेयी की शवयात्रा के पीछे चलते हुए वह थके हुए दिख रहे थे। आर्थिक नीति निर्माण की प्रक्रिया में अगर उन्होंने अपने पूर्ववर्ती की नीतियों का अनुसरण भी किया होता तो वह खुद को तमाम दिक्कतों से बचा सकते थे। 

 
भारतीय प्रधानमंत्री का काम किसी भी दृष्टिï से एक अत्यंत कठिन काम है। इस पद पर आसीन किसी भी व्यक्ति को हर क्षण लाखों बलवों और बहस करने को आतुर करोड़ों भारतीयों के प्रश्नों के लिए हर पल तैयार रहना होता है। वाजपेयी से बेहतर इस बात को भला कौन जानता होगा। वह जवाहरलाल नेहरू के समय से ही देश के राजनीतिक परिदृश्य को लगातार देखते आ रहे थे।  अपने अच्छे मित्र पी वी नरसिंह राव की तरह उन्हें भी इस बात की समझ थी कि अपना फोकस कहां और कैसे रखना है। उन्होंने अपनी लड़ाइयां भी इसी के मुताबिक चुनीं। नरसिंह राव को भुगतान संतुलन के संकट के चलते लाइसेंस-परमिट राज को समाप्त करना और देश को विदेशी निवेश के लिए खोलना पड़ा था। वाजपेयी को यह आर्थिकी विरासत मे मिली थी। उन्होंने अपनी नीतियों की मदद से इसे बढ़ावा दिया। 
 
उनके निधन के बाद उनके जिन कामों के बारे में टीकाकारों ने खूब लिखा उनमें से एक था स्वर्णिम चतुर्भुज। वह अपने दौर में आजादी के बाद की सबसे बड़ी बुनियादी परियोजना थी। योजना दिल्ली-मुंबई-कोलकाता और चेन्नई को जोडऩे की थी। इसके लिए धन जुटाने के क्रम में तत्कालीन रोड फंड का इस्तेमाल किया गया जिनको उपकर के माध्यम से जुटाया गया। तत्कालीन भूतल परिवहन मंत्री भुवनचंद्र खंडूड़ी को अधिकार प्रदान किए गए कि सारे काम सुचारु रूप से हों। यहां अधिकार प्रदान करने का मतलब था पीएमओ से बात करने के लिए डाइरेक्ट लाइन का होना। हालांकि यह परियोजना संप्रग के कार्यकाल में पूरी हो सकी लेकिन देश की लगभग हर परियोजना का यही हाल है। परंतु इसने देश में एक व्यापक बदलाव की तस्वीर पेश की। 
 
दूसरी बड़ी योजना विनिवेश की थी। तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण शौरी के नेतृत्व में सरकार ने तमाम जटिलताओं को दूर करके खुलकर सरकारी उपक्रमों का निजीकरण करने के प्रयास किए। इस दौरान तमाम होटल और प्राकृतिक संसाधन कंपनियां निजी हाथों में सौंपी गईं। उनकी सरकार ने पूर्व प्रधानमंत्रियों एच डी देवेगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल के कार्यकाल से सुजूकी के साथ चला आ रहा विवाद खत्म किया। यह विवाद देश की सबसे बड़ी कार निर्माता कंपनी पर मालिकाने से संबंधित था। एक ही वर्ष में विनिवेश की प्रक्रिया ने तय लक्ष्य पार कर लिया। यह प्रक्रिया भी कमियों से रहित नहीं थी। कई निजी प्रवर्तकों ने तंत्र का फायदा उठाने का प्रयास किया। कई वर्ष बाद सीबीआई को जांच करनी पड़ी। परंतु यह कहना होगा कि उसके बाद किसी सरकार ने आज तक विनिवेश लक्ष्य इस प्रकार हासिल नहीं किए। वाजपेयी के तीसरे कार्यकाल के अंत तक भले ही देश उतनी अच्छी स्थिति में नहीं दिख रहा था लेकिन वह उतनी बुरी हालत में भी नहीं था जैसी उन्हें विरासत में मिली थी। संप्रग ने बेहतर साझेदार चयन के माध्यम से प्रदर्शन के मामले में राजग गठबंधन को पीछे छोड़ दिया। उसे वैश्विक तेजी का भी साथ मिला और उसने पहले कार्यकाल में शानदार प्रदर्शन किया। संप्रग का दूसरा कार्यकाल भ्रष्टïाचार के मामलों और खराब आर्थिक प्रबंधन की भेंट चढ़ गया। 
 
उस वक्त नीतिगत पंगुता का आरोप लगा और मोदी विकास और रोजगार के वादे के साथ सत्ता में आए। उन्होंने खुद को तत्कालीन भ्रष्टï सत्ता के विपरीत पेश किया। उन्होंने भी आते ही योजनाओं की झड़ी लगा दी। कुछ मामलों में तो पुरानी योजनाओं का बस नाम बदला गया था। रोजगार और विकास के मोर्चे पर कोई प्रगति देखने को नहीं मिली। स्वच्छ भारत, डिजिटल इंडिया, स्टार्ट अप इंडिया, मेक इन इंडिया, मुद्रा, जन धन योजना, दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना, प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना, उज्ज्वल डिस्कॉम एश्योरेंस योजना, उड़ान (उड़े देश का आम नागरिक), प्रधानमंत्री आवास योजना आदि कुछ उदाहरण हैं। 
 
दिवालिया संहिता और प्राकृतिक संसाधनों की नीलामी के ढांचे के रूप में कुछ अच्छी पहल भी हुईं लेकिन वे नोटबंदी और जीएसटी के हड़बड़ी भरे क्रियान्वयन ने उनकी चर्चा तक का समय लील लिया। वर्ष 2019 के पहले इन झटकों से उबरने के लिए अभी लंबी दूरी तय करनी होगी। 
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