बिजनेस स्टैंडर्ड - नए केवाईसी नियमों से एफपीआई खफा क्यों
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नए केवाईसी नियमों से एफपीआई खफा क्यों

ऐश्ली कुटिन्हो /  August 26, 2018

भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) की तरफ से 10 अप्रैल को विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) के लिए जारी अपने ग्राहक को जानो (केवाईसी) परिपत्र में दिए गए निर्देशों से प्रवासी भारतीय (एनआरआई) एवं उनके कस्टोडियन और वैश्विक निवेशक बेचैन हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अन्य देशों में ऐसे प्रतिबंधों के बहुत कम उदाहरण हैं। हालांकि बाहरी तौर पर इसका मकसद काले धन को सफेद बनाने और पैसे की राउंड ट्रिपिंग पर रोक लगाना है। लेकिन ऐसी सुगबुगाहट भी चल रही है कि इसका असल मकसद अगले साल आम चुनावों से पहले राजनीतिक पार्टियों की विदेशी, विशेष रूप से मॉरीशस जैसे देशों से फंडिंग बंद करना है। 

 
रेगस्ट्रीट लॉ एडवाइजर्स के संस्थापक और सेबी में अधिकारी रह चुके सुमित अग्रवाल ने कहा, 'दुनियाभर में प्रतिभूति नियामक वास्तविक लाभार्थी मालिक की पहचान करने और बीच की कडिय़ों का पता लगाने पर ध्यान देने लगे हैं। सेबी का परिपत्र लाभ प्राप्त करने वाले स्वामी के मानदंड या सीमा को स्पष्ट करता है ताकि वर्तमान व्यवस्था बेहतर बनाई जा सके और विदेशी निवेश बढ़ाया जा सके। इस परिपत्र की अहम बात वह आदेश है कि पीआईओ (भारतीय मूल के व्यक्ति) या ओसीआई (भारत के विदेशी नागरिकों) समेत प्रïवासी भारतीय (एनआरआई) एफपीआई के लाभार्थी स्वामी नहीं हो सकते। कंपनियों में एफपीआई के लाभार्थी स्वामित्व की पहचान करने की सीमा 25 फीसदी नियंत्रक हिस्सेदारी है। यह सीमा साझेदार कंपनियों के लिए 15 फीसदी है। ज्यादा जोखिम वाले क्षेत्रों के लिए यह सीमा 10 फीसदी रखी गई है। आईसी यूनिवर्सल लीगल में वरिष्ठ साझेदार तेजस चिटलंगी ने कहा, 'बहुत से एफपीआई प्रबंधक भारतीय प्रवासी स्वामित्व एवं नियंत्रण को समाप्त करने के लिए अपने विदेशी परिचालनों को पुनर्गठित कर रहे है। लेकिन इसकी कोई जरूरत नहीं थी क्योंकि यह व्यवस्था भारतीय नियामकों की मंजूरी से स्थापित की गई थी।'
 
ज्यादा जोखिम वाले देशों में वे शामिल हैं, जिन्हें आतंकवाद एवं धोखाधड़ी के लिए जाना जाता है और जहां काले धन को सफेद करने के नियंत्रण संदेहास्पद हैं और बैंकिग गोपनीयता एवं भ्रष्टाचार अधिक है। अब सेबी ने कस्टोडियन से ज्यादा जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान करने और समय-समय पर इसकी समीक्षा करने की अपनी प्रक्रियाओं का अनुसरण करने को कहा है। लाभार्थी स्वामित्व की परिभाषा की व्याख्या धन शोधन निरोधक अधिनियम (पीएमएलए) के नियम 9 में दिए गए मानदंड के साथ होगी। इस नियम में लाभार्थी स्वामी वह व्यक्ति या व्यक्ति होंगे, जो अकेले या एक साथ मिलकर काम कर रहे हैं और उनकी एफपीआई में नियंत्रण योग्य हिस्सेदारी होगी या एफपीआई पर पूरा नियंत्रण होगा। अगर लाभार्थी मालिक की इस तरीके से पहचान नहीं हो सकती तो एफपीआई के वरिष्ठ प्रबंध अधिकारी (एसएमओ) को उसका लाभार्थी स्वामी माना जाएगा।
 
डेलॉयट के मुताबिक 'नियंत्रण' शब्द की धन शोधन निरोधक अधिनियम (पीएमएलए) में विस्तृत व्याख्या की गई है। इसमें ज्यादातर निदेशकों की नियुक्ति का अधिकार या अपने शेयरधारक या प्रबंधन अधिकारों या शेयरधारक समझौतों या वोटिंग समझौतों की वजह से प्रबंधन या नीतिगत फैसलों का नियंत्रण शामिल है। इस विषय पर डेलॉयट की रिपोर्ट में सवाल उठाया गया है, 'इस विस्तृत परिभाषा को मद्देनजर रखते हुए क्या उन व्यक्तियों को एफपीआई का लाभार्थी स्वामी माना जाएगा, जिनका उन प्रायोजक या निवेश प्रबंधक पर बहुलांश स्वामित्व या नियंत्रण है, जो प्रबंधन शेयरों या अन्य तरीकों से एफपीआई को नियंत्रित करते हैं।'
 
बाजार के जानकार यह उम्मीद कर रहे हैं कि सेबी एनआरआई और पीआईओ/ओसीआई में अंतर के लिए नियमों में फेरबदल करेगा और पीआईओ या ओसीआई को अप्रैल के परिपत्र के प्रतिबंधों से बाहर करेगा। हालांकि ऐसा करना आसान नहीं होगा क्योंकि ये सभी एनआरआई की परिभाषा में आते हैं। पीआईओ वे विदेशी नागरिक हैं, जिनके पास एक समय भारतीय पासपोर्ट था या उनके माता-पिता, दादा-दादी या परदादा-दादी भारत में जन्मे थे और वे भारत के स्थायी निवासी थे या जो व्यक्ति भारत के नागरिक या पीआईओ का पति या पत्नी है। ओसीआई एक विदेशी नागरिक है, जो 26 जनवरी, 1950 को या उसके बाद भारत का नागरिक था। एनआरआई भारतीय नागरिक हैं, जो विदेश में रोजगार या कारोबार या अन्य किसी मकसद से रहते हैं। यह विदेश में अनिश्चित समय तक रहने का संकेतक है। 
 
चिटलांगी ने कहा, 'सेबी व्यावहारिक नजरिये से कुछ प्रतिबंधों पर फिर से विचार कर सकता है। यह सही है कि एनआरआई म्युचुअल फंडों या वैकल्पिक निवेश फंडों (एआईएफ) के जरिये भारत में सीधे निवेश कर सकते हैं, लेकिन अगर केवाईसी की अनुपालना हो रही है तो एफपीआई के जरिये निवेश पर प्रतिबंध लगाना ठीक नहीं होगा।' एक अन्य चिंता यह है कि लाभार्थी स्वामी की पहचान के आधार पर एफपीआई के लिए निवेश की सीमा तय करने से ऑफशोर फंडों से भारत में आने वाला अरबों डॉलर का निवेश रुक जाएगा। फिडेलिटी, ब्लैकरॉक और फ्रैंकलिन टेंपलटन जैसी वैश्विक संपत्ति प्रबंधन कंपनियां विभिन्न ऑफशोर फंड चलाती हैं। ये फंड अपना पैसा भारतीय शेयरों में निवेश करते हैं। इन सभी फंडों को अपने सभी फंडों के लाभार्थी स्वामियों की पहचान करनी पड़ सकती है। 
 
उदाहरण के लिए अगर फिडेलिटी का एक फंड टीसीएस में 4 फीसदी हिस्सेदारी खरीदता है और दूसरा 7 फीसदी हिस्सेदारी खरीदता है तो ये फंड अलग-अलग अपनी सीमा में हैं। लेकिन इन निवेशों को यदि एक साथ जोड़ा जाता है तो सेबी की 10 फीसदी की सीमा पार हो जाएगी। यह मामला इसलिए और जटिल हो जाता है कि इन फंडों में से ज्यादातर स्वतंत्र रूप से चलते हैं और शेयरों में निवेेश के प्रतिशत या राशि की सूचनाएं साझा नहीं करते हैं। साझा न्यासियों के जरिये चलाए जाने वाले फंडों के निवेश को न्यासियों के रूप में साझा लाभार्थी स्वामी होने के कारण एकजुट किया जा सकता है। एफपीआई के कस्टोडियन और उद्योग के लॉबी समूहों ने नियामक को पत्र लिखा है। इसमें कहा गया है कि नियामक के परिपत्र से निजता को लेकर चिंताएं पैदा हुई हैं। एफपीआई को लाभार्थी मालिक के ब्योरे जैसे पता, जन्म तिथि, टैक्स रेजिडेंसी नंबर, सामाजिक सुरक्षा संख्या और पासपोर्ट संख्या का खुलासा करना होगा। दुनियाभर की निवेश कंपनियां अपने कर्मचारियों की व्यक्तिगत सूचनाएं साझा करने को लेकर सहज नहीं हैं और कोई भी इस बात को लेकर पूरी तरह विश्वस्त नहीं है कि भारत में पर्याप्त सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उचित बुनियादी ढांचा है। 
Keyword: sebi, KYC, FPI, NRI, SMO, PMLA, भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी),
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