बिजनेस स्टैंडर्ड - अवैध निर्माण के लिए बिल्डर पर लगा भारी जुर्माना
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अवैध निर्माण के लिए बिल्डर पर लगा भारी जुर्माना

अदालत से
एम जे एंटनी /  August 26, 2018

किसी शहर में गैरकानूनी तरीके से बनाई गई बहुमंजिली इमारत को गिरा देना ही समस्या का एकमात्र समाधान नहीं है क्योंकि सैकड़ों मध्यवर्गीय परिवार भी इससे बुरी तरह प्रभावित होंगे। ऐसी स्थिति में उच्चतम न्यायालय ने वह अवैध इमारत बनाने वाले डेवलपर पर भारी जुर्माना लगाने को भी एक रास्ता बताया है। उसने गोयल गंगा डेवलपर्स इंडिया लिमिटेड बनाम भारत संघ मामले में बिल्डर पर परियोजना लागत का 10 फीसदी यानी 100 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया है। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा है कि 'अमूमन यह अदालत गैरकानूनी निर्माण को वैधता देना पसंद नहीं करती है लेकिन इस मामले में हमारे पास इसके सिवाय कोई चारा नहीं है।' न्यायालय ने डेवलपर के 'दुराग्रही एवं अडिय़ल बरताव' पर नाखुशी जताते हुए इमारत में आगे कोई और निर्माण किए जाने पर रोक लगा दी है। उसने कहा है कि इन फ्लैटों की बुकिंग करा चुके लोगों को 9 फीसदी ब्याज के साथ रकम लौटानी होगी। हालांकि पहले से तैयार हो चुके फ्लैटों के आवंटन की इजाजत दे दी गई है। उच्चतम न्यायालय ने कार्बन फुटप्रिंट के आधार पर नुकसान की गणना किए जाने की अर्जी ठुकराते हुए कहा कि जरूरी वैज्ञानिक विशेषज्ञता नहीं होने से वह क्षतिपूर्ति आकलन के लिए नया सिद्धांत नहीं अपनाना चाहती। इसके अलावा शीर्ष अदालत ने अवैध निर्माण रोक पाने में नाकाम रहे पुणे नगर निगम और उसके अधिकारियों पर जुर्माना लगाने के आदेश को भी बरकरार रखा है। उसने बिल्डर के साथ मिलीभगत करने वाले अधिकारियों की भूमिका की जांच रिपोर्ट भी पेश करने को कहा है।
 
बीमा कंपनी नहीं लगा सकती लापरवाही का आरोप
 
उच्चतम न्यायालय ने साफ किया है कि मोटर वाहन अधिनियम की धारा 163ए के तहत बीमा कंपनी सड़क दुर्घटना के शिकार पर लापरवाही बरतने का आरोप नहीं लगा सकती है। इस धारा में वाहन चालकों की गलती पर गौर किए बगैर दुर्घटना के शिकार और उसके आश्रितों को त्वरित राहत मुहैया कराने का प्रावधान है। हर्जाने का निर्धारण मोटर अधिनियम में निर्दिष्ट एक तय फॉर्मूले के आधार पर होता है। शिवाजी बनाम यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस वाद में यह फैसला सुनाया गया है। सड़क हादसे में चालक की मौत हो गई थी जिसके बाद उसके आश्रितों ने हर्जाने के लिए दुर्घटना दावा अधिकरण में अपील की। अधिकरण ने बीमा कंपनी को हर्जाना देने का निर्देश दिया लेकिन कंपनी ने हादसे के लिए चालक को ही जिम्मेदार बताते हुए इस फैसले को कर्नाटक उच्च न्यायालय में चुनौती दे दी। उसने कहा कि हादसे के लिए चालक ही जिम्मेदार था, लिहाजा उसके माता-पिता हर्जाना पाने के हकदार नहीं हैं। लेकिन उच्चतम न्यायालय ने पुराने उदाहरणों के आधार पर इस फैसले को पलट दिया। उसने कहा है कि चालक के लापरवाही बरतने की दलील को अगर मान लिया जाए तो यह आश्रितों को जल्द राहत पहुंचाने के विधायी उद्देश्य के विपरीत होगा। मोटर वाहन अधिनियम की धारा 166 लापरवाही जैसे तमाम पहलुओं को ध्यान में रखते हुए हर्जाने की रकम का आकलन करती है।
 
अनुबंध में मध्यस्थता प्रावधान होने पर विवाद
 
दो पक्षों के बीच हुए करार में मध्यस्थता प्रावधान होने का मसला एक बार फिर उच्चतम न्यायालय के समक्ष पहुंचा है। इस मामले में सर्वोच्च अदालत ने मद्रास उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी की अपील स्वीकार कर ली है। हुंडई इंजीनियरिंग ऐंड कंस्ट्रक्शन लिमिटेड के साथ यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस का विवाद हो गया था। चंबल नदी पर एक पुल के निर्माण के दौरान हुए गंभीर हादसे के बाद दोनों पक्षों के बीच विवाद खड़ा हुआ। बीमा कंपनी ने क्षतिपूर्ति के दावे को जांच रिपोर्टों के आधार पर नकार दिया था। निर्माण फर्म ने इस मामले में मध्यस्थता प्रावधान लागू करने के लिए उच्च न्यायालय से गुहार लगाई जिसने सभी जोखिम बीमा नीति शर्तों के आधार पर मामला मध्यस्थता के लिए भेज दिया था। हालांकि उच्चतम न्यायालय ने इसके खिलाफ दायर अपील पर कहा है कि दोनों कंपनियों के बीच हुए करार में मध्यस्थता का प्रावधान ही नहीं रखा गया था। इस करार के मुताबिक अगर बीमा कंपनी दावे को नकार देती है तो मामला मध्यस्थता के लिए नहीं ले जाया सकता। लिहाजा न्यायालय ने हुंडई को दीवानी अदालत में राहत की अर्जी लगाने को कहा है।
 
चेक मामलों में ऋण की अवधारणा
 
नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट ऐक्ट के मुताबिक एक बार किसी चेक पर दस्तखत हो गए और इसे धारक के पक्ष में जारी कर दिया गया, तो यह मान लिया जाता है कि इसे ऋण या देनदारी के भुगतान के लिए जारी किया गया है। लेकिन खाते में पर्याप्त पैसा नहीं होने की स्थिति में अगर यह बाउंस हो जाता है तो इस पर हस्ताक्षर करने वाला व्यक्ति एक ही स्थिति में सजा से बच सकता है। उसे यह साबित करना होगा कि इस चेक को ऋण या देनदारी के भुगतान के लिए जारी नहीं किया गया है बल्कि इसे ऋण के लिए सिक्योरिटी जैसे दूसरे उद्देश्यों के लिए जारी किया गया है। अलबत्ता इस मुद्दे पर मद्रास उच्च न्यायालय और निचली अदालतों की राय अलग-अलग थी। उच्च न्यायालय का कहना था कि बाउंस चेक को जारी करने वाला व्यक्ति अगर लेनदेन की प्रकृति के बारे में न्यायाधीशों के मन में केवल संदेह भी पैदा करे तो वह सजा से बच सकता है। टीपी मुरुगन बनाम बोजन वाद में निचली अदालतों ने चेक जारी करने वाले को दोषी करार दिया लेकिन उच्च न्यायालय ने उसे बरी कर दिया क्योंकि वह उन परिस्थितियों के बारे में संदेह पैदा करने में सफल रहा जिनमें चेक जारी किए गए थे। अपील पर उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालय के फैसले को खारिज कर दिया। जब कुछ लोगों को चाय की एक कंपनी में निदेशक के तौर पर शामिल किया गया तब कंपनी में पूंजी डालने के लिए चेक जारी किए गए थे। बाद में उन्होंने इस्तीफा दे दिया लेकिन कंपनी के शेयर नहीं लौटाए। उच्चतम न्यायालय ने तथ्यों की जांच की और फैसला दिया कि कानूनी रूप से बाध्यकारी ऋण को चुकाने के लिए चेक जारी किए गए थे। चेक जारी करने वाला यह साबित नहीं कर पाया कि इन्हें सिक्योरिटी जैसे दूसरे उद्देश्यों के लिए जारी किया गया था। 
 
34 साल से लटके मामले के शीघ्र निपटान का आदेश
 
मध्यस्थता को कारोबारी विवादों के त्वरित एवं किफायती समाधान विकल्प के तौर पर बढ़ावा दिया जाता है। लेकिन कोहिनूर ट्रांसपोर्टर्स बनाम उत्तर प्रदेश राज्य वाद इस संकल्पना पर गहरा संदेह पैदा करता है। वर्ष 1980 में दायर इस मामले में चार साल बाद ही कंपनी के पक्ष में फैसला आ गया था। लेकिन उस फैसले के क्रियान्वयन में कानूनी अड़चनें खड़ी होती गईं। आखिर में, उत्तरांचल उच्च न्यायालय ने बकाया के आकलन के लिए एक चार्टर्ड अकाउंटेंट नियुक्त करने की कोशिश की लेकिन कंपनी ने इसे चुनौती दे दी। उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि चार्टर्ड अकाउंटेंट की सेवाएं लेने का निर्देश देकर उच्च न्यायालय अपने अधिकार-क्षेत्र से बाहर चला गया था। हालांकि यह मामला अभी खत्म नहीं हुआ है। मूल फैसले के क्रियान्वयन की प्रक्रिया अब भी देहरादून की अदालत में लंबित है। उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि किसी जोड़-घटाव या बदलाव के बगैर एक अदालती आदेश जारी किया जाना चाहिए। तीन महीने के भीतर विवाद के शीघ्र निपटान के लिए मामला उच्च न्यायालय को वापस भेजा गया है।
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