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सोनिया कांग्रेस और राहुल कांग्रेस के बीच की कड़ी हैं अहमद पटेल

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  August 24, 2018

अहमद पटेल को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का कोषाध्यक्ष नियुक्त किया गया है। पार्टी ने उन्हें दूसरी बार यह जिम्मेदारी दी है। इससे पहले वह 1996 से 2000 तक इस पद पर रहे थे। पटेल 1977 में महज 30 साल की उम्र में पहली बार सांसद बने थे। उन चुनावों में कांग्रेस का लगभग सफाया हो गया था लेकिन गुजरात ने कुछ हद तक पार्टी की इज्जत बचा ली थी। वहां से लोकसभा में पहुंचने वाले सांसदों में भी पटेल शामिल थे। वह अपने गृह जिले भरूच से जीतकर आए थे। इस इलाके में आज भी उनका रुतबा है लेकिन अब वह वहां से शायद ही जीत पाएं। इसकी वजह यह है कि पिछले दो दशक से इस संसदीय क्षेत्र की पांच में से चार विधानसभा सीटों पर भाजपा का कब्जा है।

 
वर्ष 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए आम चुनावों में राजीव गांधी 400 से अधिक सीटों के साथ सत्ता में आए। तब तक पटेल ने राजीव से करीबी बना ली थी और वह तेजी से पार्टी में ऊपर चढ़ते गए। वर्ष 1986 में राजीव ने पुराने नेताओं की छुट्टïी करके उनकी जगह अपने करीबी युवा नेताओं को लाने की योजना पर अमल शुरू किया। पटेल को राज्य इकाई का अध्यक्ष बनाकर वापस गुजरात भेजा गया। जब राजीव की हत्या हुई तो उनके अधिकांश समर्थक पीवी नरसिंह राव के पाले में चले गए। पटेल लोकसभा चुनाव हार गए थे और साथ ही गुजरात कांग्रेस का अध्यक्ष पद भी उनके हाथ से चला गया था। उनका दिल्ली में न कोई मकान था और न ही कोई राजनीतिक संरक्षक। उनकी मित्र नजमा हेपतुल्ला ने मीना बाग में आगंतुक आवास में उनके रहने की व्यवस्था की। लेकिन तीन दिन बाद ही उन्हें मकान खाली करने का नोटिस मिल गया। यह वह समय था जब उनका बेटा और बेटी बोर्ड परीक्षा दे रहे थे। उन्हें यह सब उस सरकार में झेलना पड़ा जिसका प्रधानमंत्री कांग्रेस का था। उस दिन से पटेल ने संकल्प लिया कि वह राव सरकार से कोई मदद नहीं मांगेंगे और न ही कोई मदद स्वीकार करेंगे।
 
अलबत्ता उन्होंने जवाहर भवन ट्रस्ट का सचिव बनना स्वीकार किया। इसकी शुरुआत राजीव ने कांग्रेस के थिंक टैंक के रूप में की थी लेकिन उनकी हत्या के कुछ साल बाद सोनिया गांधी ने ईमानदारी से इसे आगे बढ़ाया। जवाहर भवन परिसर में स्थित राजीव गांधी फाउंडेशन को तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने अपने पहले ही बजट में 20 करोड़ रुपये आवंटित किए लेकिन सोनिया ने इसे लेने से इनकार कर दिया। पटेल ने दिनरात एक करके इसके लिए पैसे जुटाए और इस परियोजना को पूरा कराया। इस नियुक्ति ने पटेल को एक ऐसा अनोखा मौका दिया जिससे कांग्रेस के दूसरे नेता वंचित थे। इसके जरिये उनकी सोनिया तक सीधी पहुंच थी। 
 
सोनिया से करीबी के बावजूद पटेल कई वर्षों तक अलग-थलग रहे। अलबत्ता पार्टी में विभिन्न पदों पर रहते हुए उन्होंने अपना बड़ा नेटवर्क बना लिया था। तिरुपति में 1993 में हुए पार्टी के सम्मेलन में इसकी झलक साफतौर पर देखने को मिली जहां कांग्रेस कार्य समिति के चुनाव हुए। इस चुनाव में अहमद सबसे ज्यादा वोट पाने वाले नेताओं में तीसरे स्थान पर थे। 1996 से 2000 तक का समय कांग्रेस में अस्थिरता का दौर था। कुछ समय के लिए नरसिंह राव के राजनीतिक सलाहकार रहे जितेंद्र प्रसाद ने 1999 में पार्टी अध्यक्ष पद के लिए सोनिया को चुनौती दी। सोनिया ने अध्यक्ष बनने के बाद पटेल को अपना राजनीतिक सलाहकार नियुक्त किया। गांधी परिवार से पटेल की करीबी से कोई इनकार नहीं कर सकता लेकिन उन्होंने कभी व्यक्तिगत फायदे के लिए इस स्थिति का इस्तेमाल नहीं किया। उन्हें करीब से जानने वालों का कहना है कि वह केवल कुछ फोन कॉल करके 30 मिनट के भीतर 30 करोड़ रुपये जुटा सकते हैं। पत्रकारों ने चुनावों के दौरान उनके कार्यालय से बोरियों में भरकर नोट जाते हुए देखे हैं। 
 
उनके अब तक के राजनीतिक जीवन में केवल दो मौके आए हैं जब उन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे। हालांकि उन्होंने इन आरोपों का खंडन करते हुए दावा किया कि अगर ये आरोप सही साबित हुए तो वह राजनीति छोड़ देंगे। इनमें से एक आरोप मिजोरम के पूर्व राज्यपाल स्वराज कौशल ने कुछ दशक पहले लगाया था और दूसरा आरोप हाल फिलहाल का है। उन पर आरोप था कि वामपंथी दलों के संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार से समर्थन वापस लेने के बाद उन्होंने भाजपा के कुछ सांसदों को पार्टी छोड़कर संप्रग सरकार के पक्ष में वोट करने के लिए चलाए गए अभियान के लिए पैसों की व्यवस्था की थी। एक संसदीय समिति ने इस मामले की जांच की थी और पटेल को निर्दोष करार दिया। पटेल व्यक्तिगत रूप से सादगीपसंद व्यक्ति हैं और दोस्त बनाने तथा लोगों को प्रभावित करने के लिए तड़क-भड़क वाली पार्टियों का आयोजन करने में विश्वास नहीं करते हैं। ऐसा नहीं है कि पटेल बहुत समृद्घ आदमी हैं। उनके पास जो पैसा है वह उनकी पत्नी का है जो भरूच के जमींदार परिवार से ताल्लुक रखती हैं। उन्होंने अंकलेश्वर में रसायन उद्योग के विकास को बढ़ावा दिया था। खासकर जामनगर में तेल शोधक कारखाना स्थापित करने में उनकी विशेष भूमिका थी। इसी वजह से वह अंबानी परिवार के करीब आ गए। 
 
जब राहुल पार्टी के अध्यक्ष बने तो यह माना गया कि संगठन में आमूलचूल बदलाव होंगे। राहुल धीरे-धीरे पार्टी का पुनर्गठन कर रहे हैं। शायद वह पार्टी को अचानक कोई झटका नहीं देना चाहते हैं। इसलिए जनार्दन द्विवेदी जैसे वरिष्ठï नेताओं की छुट्टïी हो गई है लेकिन पटेल को बरकरार रखा गया है। वह सोनिया कांग्रेस और राहुल कांग्रेस के बीच की कड़ी हैं।
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