बिजनेस स्टैंडर्ड - सैन्य शक्ति का बदलता प्रभाव
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सैन्य शक्ति का बदलता प्रभाव

प्रेमवीर दास /  August 24, 2018

हमें एक अलग तरह की सैन्य शक्ति की आवश्यकता है, जहां समुद्री शक्ति अगर प्राथमिक न हो तो भी वह एक बड़ी ताकत अवश्य हो। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं प्रेमवीर दास

 
देश की स्वतंत्रता की 72वीं वर्षगांठ के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले के प्राचीर से अत्यंत उदारतापूर्वक देश के सैन्य बलों की सराहना की। उन्होंने कहा कि देश के सैन्य बल न केवल हमारी सीमाओं की संप्रभुता की रक्षा कर रहे हैं बल्कि वे हमारी असैन्य आबादी की सहायता के लिए भी हमेशा तत्पर रहते हैं। सच तो यह है कि ऐसी बातें इस मंच से हर वर्ष कही जाती हैं।  उनके पहले भी तमाम प्रधानमंत्रियों ने लालकिले से यह बात कही है। उनमें से दो तो श्रोताओं के बीच ही बैठे हुए थे। बहरहाल यहां बात हमारी सेनाओं की देशभक्ति या उनके शौर्य से कहीं आगे की है। यहां सवाल यह है कि सन 1947 में जब हमें आजादी मिली तब देश के लिए सैन्य शक्ति का अर्थ क्या था और आज यानी सात दशक बाद हमारे लिए इसका क्या अर्थ है। 
 
देश के सशस्त्र बलों की तीनों शाखाओं ने ब्रिटिश झंडे के तले दो विश्वयुद्घ देखे। स्वतंत्र राष्ट्र बनने के कुछ ही महीनों के भीतर भारत को कश्मीर घाटी में रजाकारों (आम नागरिकों के वेश में पाकिस्तानी सैनिक) की घुसपैठ से निपटना पड़ा था। सेना के जवानों को विमान से श्रीनगर पहुंचाया गया और पलक झपकते ही हमारे जवानों ने हालात को काबू में कर लिया। यह बात अलग है कि दोनों देशों की सेनाओं ने सीधे तौर पर एक दूसरे का सामना नहीं किया।  अगली लड़ाई सन 1962 में देश की उत्तरी सीमा पर चीन से हुई। इन लड़ाइयों में नौसेना या वायु सेना की सीधी भूमिका नहीं थी। इस दौरान वायुसेना ने केवल परिवहन का काम किया। इसके बाद कैबिनेट ने सैन्य जवानों की संख्या बढ़ाकर 825,000 करने का निर्णय लिया ताकि दोनों मोर्चों पर जंग की स्थिति में भी कोई संकट उत्पन्न न हो। कैबिनेट ने वायु सेना और नौसेना की क्षमता बढ़ाने की बात भी कही।
 
यह प्रक्रिया शुरू ही हुई थी कि सन 1965 में पाकिस्तान के साथ एक और जंग की शुरुआत हो गई। यह पहला मौका था जब थल सेना और वायु सेना दोनों लड़ाई में शामिल हुए। नौसेना की भूमिका इस युद्घ में भी नहीं थी। सन 1971 में वह मौका भी आया जब देश के सशस्त्र बल की तीनों सेनाओं का सामना प्रतिद्वंद्वी सेनाओं के तीनों बलों से हुआ। इस युद्घ का नतीजा सभी जानते हैं। उसे दोहराने की आवश्यकता नहीं है। सन 1999 में करगिल की लड़ाई हुई जिसमें पाकिस्तानी सेना भी शामिल थी। परंतु इस दौरान दोनों देशों के बीच नियंत्रण रेखा कभी पार नहीं की गई। हालांकि वायु सेना के सहयोग से हमारी सेना घुसपैठियों को अपनी जमीन पर से खदेडऩे में कामयाब रही।
 
सभी सैन्य शक्तियां पारंपरिक रूप से इस बात पर निर्भर करती हैं कि वे जंग के लिए किस कदर तैयार हैं। क्लॉजवित्ज को उद्घृत करें तो, 'युद्घ कुछ और नहीं बस अन्य माध्यमों से नीतियों को जारी रखना है।' अगर हम अपनी अब तक की पांच लड़ाइयों को इस संदर्भ में देखें तो सन 1948, 1965 और 1999 में पाकिस्तान ने तीनों अवसरों पर यह सोचकर पहल की होगी कि भारत शायद सैन्य प्रतिक्रिया नहीं देगा। सन 1971 की जंग का संदर्भ अलग था क्योंकि उस लड़ाई में पहल पाकिस्तान ने नहीं बल्कि भारत ने नीतिगत और सैन्य शक्ति का बेहतरीन मिश्रण करके वांछित नतीजे हासिल किए। जहां तक सन 1962 में चीनी घुसपैठ का सवाल है तो उसने जानबूझकर तनाव उत्पन्न करने के पूरे तीन साल बाद सैन्य कार्रवाई की थी। उसने उस इलाके पर कब्जा भी कर लिया जिसे वह अपना बता रहा था। इस पूरी घटना ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की साख को कमजोर किया। 
 
अब हालात काफी हद तक बदल चुके हैं। ये तीनों देश अब परमाणु हथियार क्षमता संपन्न देश बन चुके हैं। इनमें से प्रत्येक की क्षमताएं अलग-अलग हो सकती हैं लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं है कि ये तीनों एक दूसरे को काफी नुकसान पहुंचाने की स्थिति में हैं। इसके अलावा लक्ष्य भी बदल चुके हैं। चीन का प्राथमिक लक्ष्य अब अमेरिका की बराबरी करना और वैश्विक महाशक्ति बनना है। इसमें दो राय नहीं कि इस महत्त्वाकांक्षा के बीच दशकों पहले हमारे साथ हुए सैन्य संघर्ष में भी छिपे दिखते हैं। भारत खुद भी दुनिया की तीन या चार बड़ी शक्तियों में से एक बनने की इच्छा रखता है। 
 
इस लक्ष्य को नुकसान केवल तभी पहुंच सकता है जबकि वह पाकिस्तान के साथ सैन्य मुकाबले में उलझे। इतना ही नहीं दोनों देशों के लिए निरंतर आर्थिक प्रगति भी अत्यंत अहम है। उसकी मदद से ही वे अपने मूल सामरिक लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि नीतिगत निरंतरता के लिए सैन्य शक्ति का इस्तेमाल करने की अवधारणा अब पुरानी पड़ चुकी है। परंतु हां, इसके अर्थ में अवश्य बदलाव आ चुका है। बदले हुए माहौल में सैन्य शक्ति को अगर कूटनीति से मिलाकर देखा जाए तो यह सामने वाले को दंडित करने के बजाय दबाव बनाने के अधिक काम में आती है। हालांकि अफगानिस्तान और इराक जैसी परिस्थितियां भी बन सकती हैं जिन्हें फिलहाल अपवाद मानना ही बेहतर होगा। इसके अलावा समुद्री सैन्य शक्ति किसी देश की सैन्य शक्ति के लिए कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण होती नजर आ रही है क्योंकि यह लक्ष्य प्राप्ति की संभावनाओं में इजाफा करती है। 
 
यह पहुंच को उस सीमा तक ले जाती है जहां थल सेना और वायु सेना अन्यथा नहीं पहुंच पाएंगे। चीन ने इस दिशा में एकदम शुरुआती पहल की और उसने बीते दो दशक में नौसेना के क्षेत्र में तेजी से तरक्की की है। भारत इस दिशा में शुरुआत कर रहा है लेकिन अभी उसे काफी चीजें ठीक करनी हैं। सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि एशिया प्रशांत क्षेत्र में हमारी विश्वसनीय पहलकदमी हमारे हित में महत्त्वपूर्ण है। इसके लिए एक अलग तरह की सैन्य शक्ति की आवश्यकता होगी। इस दौरान नौसेना की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण होगी, इससे कोई इनकार नहीं कर सकता। 
 
(लेखक राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड के सदस्य रहे हैं। लेख में प्रस्तुत विचार निजी हैं।)
Keyword: defense, military, navy, narendra modi,,
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