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व्यापक हो दायरा

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  August 24, 2018

सरकार द्वारा नियुक्त एक समिति की ओर से प्रस्तुत सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्घि के नए आंकड़ों को लेकर देश के दो प्रमुख राजनीतिक दल जिस तरह उलझे हुए हैं, वह अपने आप में काफी जानकारीपरक है। आंकड़ों के सामने आने के बाद कांग्रेस की खुशी का ठिकाना नहीं रहा क्योंकि उनके मुताबिक उसके कार्यकाल के दौरान जीडीपी वृद्घि दर पहले घोषित दर से 0.5 फीसदी अधिक थी। सरकार ने जवाबी हमला करते हुए उस वृद्घि के लिए चुकाई गई कीमत का उल्लेख शुरू कर दिया। ऐसा प्रतीत होता है कि आर्थिक वृद्घि की दर हर सरकार के लिए एक प्रतीक की तरह हो गई है। भले ही जीडीपी के तमाम आकलन तथ्यों पर आधारित आकलन होते हैं। इनका आकलन करना जटिल होता है। अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले अनुमान लगाया जाता है और उसके आधार पर गणना होती है। खासतौर पर भारत जैसी अर्थव्यवस्था के लिए जहां असंगठित क्षेत्र अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, जीडीपी वृद्घि का आंकड़ा चाहे जो भी हो वह बस एक मोटा-मोटा अनुमान ही होता है। यानी 7.5 फीसदी आसानी से 7 फीसदी भी हो सकती है या फिर इसका उलट भी सही हो सकता है। ऐसे मामूली अंतर को लेकर राजनीतिक बयानबाजी करना मूर्खतापूर्ण है। खासतौर पर तब जबकि मूलभूत बात लगभग वही हो जो पहले थी: कांग्रेसनीत संप्रग गठबंधन सरकार अपने पिछले कार्यकाल की वृद्घि दर को बरकरार नहीं रख सकी थी और भाजपानीत गठबंधन की दूसरी सरकार इसे गति प्रदान करने में नाकाम रही।

 
बीते दशकों में जब देश की वृद्घि दर कमजोर थी तब इस बात की पर्याप्त वजह मौजूद थी कि हम दर में इजाफा करें और अन्य अर्थव्यवस्थाओं की बराबरी करने का प्रयास करें। वृद्घि गरीबी से लडऩे का सबसे मजबूत हथियार है। तेज वृद्घि के वर्षों में गरीबी के स्तर में तेजी से कमी आती दर्ज की गई है। परंतु स्थायित्व के साथ तेज वृद्घि दर्ज करने के बावजूद अब वक्त आ गया है जब हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि जीडीपी (मोटे तौर पर राष्ट्रीय आय), प्रदर्शन का केवल एक मानक है। इसके इतर भी कई कारक हैं। मसलन राष्ट्रीय परिसंपत्तियां। जिस तरह कंपनी के आय-व्यय के दस्तावेज को उसकी परिसंपत्तियों और देनदारियों की बैलेंस शीट के साथ पढ़ा जाता है वही बात अर्थव्यवस्था पर भी लागू होती है। केरल में बाढ़ आए एक सप्ताह बीत चुका है। 
 
हमें यह समझना होगा कि देश में पानी, वन आदि प्राकृतिक संसाधनों का जमकर कुप्रबंधन किया गया है। अपनी परिसंपत्तियों को नष्टï करके एक तयशुदा अवधि तक ही वृद्घि हासिल की जा सकती है। यह सिलसिला हमेशा नहीं चलता रह सकता। भारत जल संकट से जूझ रहा है। वन जैसे अन्य प्राकृतिक संसाधन भी खत्म हो रहे हैं। सरकार के सांख्यिकीविद हमें राष्ट्रीय आय के साथ-साथ अर्थव्यवस्था की बैलेंस शीट में आए बदलाव के बारे में क्यों नहीं बताते? इसके अलावा भी मानव संसाधन और संस्थागत पूंजी जैसी परिसंपत्तियां हैं। स्वास्थ्य और शिक्षा के मोर्चे पर हमारा प्रदर्शन कैसा है? आम जानकारी के मुताबिक हमारा प्रदर्शन जीडीपी जैसा नहीं है। संस्थागत पूंजी की बात करें तो वह कई मायनों में सबसे अधिक मायने रखती है। अधिकांश लोग इस बात से सहमत होंगे कि कुछ प्रमुख संस्थान सामाजिक पूंजी के मामले में पिछड़ रहे हैं। अदालतों में भ्रष्टाचार, आपराधिक जांच एजेंसियों द्वारा झूठी शपथ, विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता का मसला और वहां नियुक्ति की गुणवत्ता का मामला, प्रेस की स्वतंत्रता वगैरह इसके उदाहरण हैं। इसके बाद समानता या उसकी कमी का मुद्दा आता है।
 
अमीरों और गरीबों के बीच की खाई बढऩे से सामाजिक तनाव बढ़ता है। भौगोलिक असमानताएं तो एकदम स्पष्टï हैं। बिहार की प्रति व्यक्ति आय दक्षिण भारत के राज्यों की प्रति व्यक्ति आय की चौथाई है। उत्तर प्रदेश की प्रति व्यक्ति आय उनकी एक तिहाई है। क्या इसे स्थायित्व भरा कहा जा सकता है? क्या आय और अवसरों का यह अंतर बताता है कि आखिर क्यों 'बीमारू' राज्यों में कानून व्यवस्था की हालत ज्यादा खराब है? क्या सामाजिक सद्भाव का यह ह्रïास किसी न किसी तरह आर्थिक विसंगति को जन्म नहीं देगा?
 
व्यापक तौर पर देखें तो देश की स्थिति उतनी बेहतर नहीं है जितनी जीडीपी के आंकड़ों में दिखती है। परंतु ऐसा कोई नहीं है जो अर्थव्यवस्था की हालत की व्यापक तस्वीर पेश कर सके। अगर हमें बहस को आय में वृद्घि से परे ले जाना है तो यह जरूरी है कि हमारे सांख्यिकीविद देश की गणनायोग्य परिसंपत्तियों की बैलेंस शीट पर वैसे ही ध्यान केंद्रित करें जैसे वे आय में बदलाव पर करते हैं। 
Keyword: GDP, economy, fiscal deficit, राजकोषीय घाटा जीडीपी,
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