बिजनेस स्टैंडर्ड - उथल-पुथल के बीच भारत में अवसर
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उथल-पुथल के बीच भारत में अवसर

आकाश प्रकाश /  August 23, 2018

इस समय जबकि अधिकांश उभरते बाजारों में उथलपुथल मची हुई है, भारत को एक सुरक्षित ठिकाना माना जा रहा है। इस संंबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं आकाश प्रकाश 

 
वैश्विक स्तर पर उभरते बाजार अब आधिकारिक तौर पर मंदी वाले बाजार में तब्दील हो चुके हैं। एमएससीआई सूचकांक 25 जनवरी के अपने उच्चतम स्तर से 10 फीसदी नीचे आ चुका है। उभरते बाजारों की मुद्रा का सूचकांक फरवरी के मध्य से अमेरिकी डॉलर की तुलना में अपने स्तर से 16 फीसदी गिर चुका है और उभरते बाजार बॉन्ड सूचकांक (ईएमबीआई) का दायरा फरवरी के आरंभ से अब तक 101 आधार अंक तक विस्तृत हो चुका है। उभरते बाजारों की स्थिति कठिनाई भरी है। मजबूत डॉलर, कमजोर और कम सुसंगत वैश्विक बाजार और वृद्घि तथा बढ़ता प्रतिफल, ये सभी दिक्कत पैदा कर रहे हैं। चीन के आंकड़ों में भी लगातार नरमी आ रही है और उसकी मुद्रा रेनमिनबी संवेदनशील बनी हुई है। हालांकि चीन में हमें सहजता आती दिख रही है लेकिन अभी भी इस बात की संभावना कम ही है कि हमें वर्ष 2008 की तरह कोई प्रोत्साहन कार्यक्रम देखने को मिले। ऐसा कोई भी पैकेज जिंस बाजारों और उभरते बाजारों को उबारने में सक्षम है। 
 
उभरते बाजारों में मूल्यांकन में कमी आई है। इन बाजारों के शेयरों की कीमत अब विकसित देशों की तुलना में तकरीबन 10 फीसदी तक कम है। इतना ही नहीं विकसित देशों के बाजार लाभांश प्रतिफल के मामले में भी करीब 25 आधार अंक तक बेहतर हैं। परिसंपत्ति वर्ग में कमजोरी के बावजूद अब तक हमें आत्मसमर्पण देखने को नहीं मिला है। उभरते बाजारों में मुद्रा की आवक अब तक स्थिर बनी रही है। ईएमईए को छोड़कर अधिकांश क्षेत्रों में वर्ष की शुरुआत से अब तक आवक सकारात्मक बनी रही है। एशिया के उभरते बाजारों में सीमित बिकवाली नजर आई है। एक वर्ष के आधार पर भी देखें तो उभरते बाजार सकारात्मक हैं। इन बाजारों पर पिछले दबाव और इस अवधि में पूंजी के बहिर्गमन को देखें कीमतों में 20 फीसदी गिरावट के बावजूद हालात बुरे नहीं हैं।
 
उभरते बाजारों की बात करें तो भारत सबसे बढिय़ा प्रदर्शन करने वालों में से है। डॉलर के संदर्भ में भी यह एकमात्र बाजार है जो सकारात्मक है। यह निष्कर्ष इसलिए भी दिलचस्प है क्योंकि किसी ने यह अनुमान नहीं जताया था कि भारत 2018 के सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाले उभरते बाजारों में से एक होगा। यह सच है कि भारत में सूचकांक चंद शेयरों की बदौलत तेजी पर हैं और सतह के नीचे अगर मिड कैप सूचकांकों पर नजर डालें तो डॉलर के संदर्भ में वे 20 फीसदी तक नीचे हैं। बेहतर प्रदर्शन करने वाले शेयरों में कई ऐसे हैं जिनका स्वामित्व विदेशी है। ऐसे में वैश्विक निवेशकों के दृष्टिकोण से देखें तो लाभ वास्तविक नजर आते हैं।
 
प्रश्न यह है कि भारत ने दुनिया भर के पूंजी आवंटकों को चकित कैसे किया और वह अन्य बड़े उभरते बाजारों से बेहतर प्रदर्शन कैसे कर रहा है? एक स्वाभाविक वजह तो यह है कि भारत वैश्विक वृद्धि और व्यापार से प्रत्यक्ष तौर पर उतना संबंधित नहीं है जितने कि अन्य देश। व्यापार युद्ध, शुल्क और पिछले कुछ दशक के वैश्विक माहौल ने भारत को काफी कम प्रभावित किया है। भारत वैश्वीकरण से उस कदर लाभान्वित भी नहीं हुआ जितना कि एशिया के उत्तरी भाग के देश। यही वजह है कि वैश्वीकरण के धीमेपन से भी वह अप्रभावित है।
 
भारत अधिकांशत: घरेलू मांग से संचालित होने वाला देश है। वर्ष 2017 में उत्तरी एशिया और अन्य वैश्वीकृत अर्थव्यवस्थाओं ने वैश्विक वृद्धि का पूरा लाभ लेते हुए जबरदस्त प्रदर्शन किया। भारत को मजबूत वैश्विक अर्थव्यवस्था का कोई फायदा नहीं मिला। वैश्विक अर्थव्यवस्था के समक्ष सीमित खुलेपन की वही कमी आज हमारे लिए ताकत बन गई है क्योंकि वैश्विक अर्थव्यवस्था में धीमापन आ रहा है और व्यापारिक युद्ध केंद्र में हैं। वर्ष 2018 में भारत इकलौती ऐसी अर्थव्यवस्था वाला देश था जहां वृद्धि हो रही थी। उभरते बाजारों में कमजोरी आने के साथ-साथ जिंस बाजार में भी कमजोरी आई है। उदाहरण के लिए तांबे की कीमत 20 फीसदी गिरी है। जिंस कीमतों में गिरावट के बाद आशा है तेल कीमतों में भी कमी आएगी। यह भी भारत के लिए सकारात्मक संकेत होगा। भारत में आय में सुधार देखने को मिल रहा है। वर्ष 2019 की पहली तिमाही में आय अनुमान से थोड़ी बेहतर रही है। बैंकों और तेल कंपनियों को छोड़ दिया जाए तो ईपीएस में 15 फीसदी और बिक्री में 20 फीसदी की बढ़ोतरी की गई।
 
इसमें दो राय नहीं कि अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही है। ग्रामीण क्षेत्रों की मांग में सुधार हो रहा है, सरकारी व्यय पटरी पर है और निजी क्षेत्र के पूंजीगत व्यय में सुधार के संकेत मिल रहे हैं। देश के वृहद संकेतक भी मजबूत नजर आ रहे हैं। समायोजन की प्रक्रिया लगभग पूरी हो चुकी है। दरें पहले ही ऊंची हैं और मुद्रास्फीति स्थिर बनी हुई है। अन्य उभरते बाजारों की अस्थिरता देखते हुए भारत की वृहद स्थिति काफी बेहतर मानी जा सकती है। उभरते बाजारों की मौजूदा उथलपुथल को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि भारत सुरक्षित स्थिति में है। कई वैश्विक निवेशकों के मन में देश को लेकर आशंका कम हुई है। भारत को लेकर जो भी चिंताएं बची हुई हैं वे मोटे तौर पर मूल्यांकन से संबंधित हैं। बाजार कतई सस्ते नहीं हैं। खासतौर पर कंपनियों की गुणवत्ता की बात करें तो ऐसा नहीं है। लगभग हर क्षेत्र में हमारी कंपनियां ऐसे मूल्यांकन पर काम कर रही हैं जो दुनिया में सबसे अधिक है। दूसरी चिंता राजनीति से जुड़ी हुई है। जैसे-जैसे हम वर्ष के अंत की ओर बढ़ रहे हैं वैसे वैसे राजनीतिक अनिश्चितता का बढऩा लाजिमी है। 
 
राजनीति को लेकर विदेशी निवेशक कम चिंतित हैं और घरेलू निवेशक ज्यादा। घरेलू निवेशकों को मौजूदा शासन का कोई विकल्प भी नजर नहीं आ रहा है। उन्हें इस बात की समझ है कि राजनीतिक जोखिम कम नहीं हैं। घरेलू क्षेत्र में वित्तीय प्रवाह को लेकर भी चिंताएं हैं। इनमें कमी आई है लेकिन फिर भी इनकी मौजूदगी की अनदेखी नहीं की जा सकती है। अगर हालात में किसी तरह का पलटाव आता है तो बाजार पर दबाव बन सकता है। निवेशकों ने भी अब तक बहुत परिपक्वता दिखाई है लेकिन बढ़ती अस्थिरता से हालात बदल सकते हैं। इन मासिक आवक ने बाजार को गिरावट से बचाया है। 
 
भारत को अन्य उभरते बाजारों की तुलना में बढिय़ा प्रदर्शन जारी रखना होगा। कम से कम तब तक जब तक उभरते बाजार बिकवाली की मुद्रा में हैं। बहरहाल, मजबूत प्रदर्शन की बात करें तो वह अभी मुश्किल नजर आ रहा है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि इस वर्ष प्रतिफल कमजोर रहेगा। भारत 2018 में कारोबारी दृष्टिï से खराब नहीं है, बस ज्यादा लालच से बचना होगा।
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