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सही निर्णय

संपादकीय /  August 23, 2018

बाढ़ से जूझ रहे केरल में बारिश अवश्य धीमी हो गई है लेकिन वहां राहत कार्य के लिए धन को लेकर उपजा विवाद धीमा पडऩे का नाम नहीं ले रहा।  केंद्र सरकार ने अब तक राज्य में राहत कार्य के लिए 600 करोड़ रुपये की राशि दी है जबकि राज्य के मुख्यमंत्री पी विजयन ने 2,000 करोड़ रुपये की राशि तत्काल सहायता के रूप में मांगी है। केरल के वित्त मंत्री टी एम थॉमस आइजक ने कहा है कि राज्य को पुनर्निर्माण के लिए 20,000-30,000 करोड़ रुपये की आवश्यकता होगी। केंद्र और राज्य सरकार अभी भी यह अनुमान लगाने में जुटी हैं कि वास्तव में कितनी राशि की आवश्यकता है। इस बीच संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने स्वेच्छा से केरल में राहत कार्य में 700 करोड़ रुपये की मदद देने की पेशकश की। केंद्र सरकार ने इस पेशकश को विनम्रतापूर्वक ठुकरा दिया लेकिन विजयन ने अपने राज्य के साथ अमीरात के विशेष रिश्तों का हवाला देते हुए कहा कि यूएई के साथ 'किसी अन्य देश' जैसा व्यवहार नहीं किया जा सकता है।

 
इसमें दो राय नहीं है कि केरल ने बाढ़ में ऐसी तबाही मचाई है जो एक सदी में एक या दो बार ही देखने को मिलती है। उसे हरसंभव मदद की आवश्यकता है। राज्य का बहुत बड़ा हिस्सा पानी में डूबा हुआ है और वहां के कई निवासी बेघर हो गए हैं। परंतु इन बातों के बीच केंद्र द्वारा यूएई की प्रत्यक्ष मदद को ठुकराए जाने में कोई गलती नहीं नजर आती।  विदेशी मुल्कों द्वारा देश के राज्यों को सीधी मदद की पेशकश के साथ ऐसा किया जाना उचित है। हर तरह की मदद को केंद्र सरकार के माध्यम से ही भेजा जाना चाहिए और यह बात समय की कसौटी पर खरी उतरी है। 
 
चीन के उदाहरण पर गौर कीजिए। वह अपने आसपास जिन मुल्कों में विकास संबंधी सहायता करता है उनकी स्थानीय राजनीति को प्रभावित भी करता है। क्या चीन को भारत के पूर्वोत्तर राज्यों की यूं मदद करने की इजाजत दी जा सकती है? या फिर क्या पाकिस्तान को बिना केंद्र सरकार को शामिल किए जम्मू कश्मीर की सरकार की मदद करने दी जा सकती है? यह सुरक्षा के लिए खतरा होगा। अगर एक बार ऐसा हो गया तो भविष्य में केंद्र सरकार को ऐसी पेशकश ठुकराने में मुश्किल आएगी। संविधान के मुताबिक विदेश नीति केंद्र का मसला है। राज्य सरकारों को द्विपक्षीय सहायता और सहयोग समझौते करने देना उनको स्वतंत्र विदेश नीति संचालित करने देने जैसा है। यह किसी भी परिस्थिति में उचित नहीं। 
 
भारत ने थाईलैंड, मालदीव और कतर जैसे कई अन्य देशों की सहायता पेशकश भी ठुकराई है। वर्ष 2004 से ही एक नीति के तहत भारत प्राकृतिक आपदाओं के लिए विदेशी सहायता नहीं लेता। ऐसा बिल्कुल नहीं है कि केरल के साथ किसी तरह भेदभाव किया जा रहा है। मामला केवल केंद्र और राज्य के बीच राहत राशि की मात्रा का है। इसे शीघ्र हल करना होगा। जिस राशि की जरूरत है वह इतनी भी नहीं है कि केंद्र और राज्य के तालमेल से हासिल न हो सके। यह केंद्र की जिम्मेदारी है कि वह राष्ट्रीय बजट में से राज्य सरकार की मांग के मुताबिक सहायता पैकेज तैयार करे। अगर वह ऐसा करने में नाकाम रहे तो उसे जवाबदेह भी ठहराया जाए। 
 
देश का आर्थिक आकार अब ऐसा हो चुका है वह सहायता राशि पर कतई निर्भर न हो। अगर केरल को धन की तंगी हो रही है तो यह हमारी घरेलू व्यवस्था की कमी दर्शाता है। इसका विदेशी राशि के स्वीकार या अस्वीकार करने से कोई लेनादेना नहीं है। यह घरेलू राजनीति और घरेलू जवाबदेही का मामला है।
Keyword: kerala, flood, fund, मुख्यमंत्री पी विजयन,
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