बिजनेस स्टैंडर्ड - जीडीपी शृंखला में मामूली अंतर
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जीडीपी शृंखला में मामूली अंतर

अभिषेक वाघमारे /  August 22, 2018

जीडीपी आंकड़ों की नई शृंखला ने राजनीतिक हलकों और विशेषज्ञों के बीच एक जोरदार बहस छेड़ दी है। राष्ट्रीय लोक वित्त और नीति संस्थान में प्रोफेसर और राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग को सौंपी गई रिपोर्ट में शामिल इस शृंखला के लेखक एनआर भानुमूर्ति ने अभिषेक वाघमारे ने विभिन्न मसलों पर बात की। मुख्य अंश:  

 
आपने जीडीपी आंकड़ों की शृंखला तैयार करने के लिए जो प्रक्रिया अपनाई है उसको लेकर एक जोरदार राजनीतिक बहस छिड़ गई है। क्या यह एक उचित प्रक्रिया है?      
 
जैसा की समिति की रिपोर्ट में चर्चा की गई है, यह सुझाए गए तीन तरीकों में से एक है। आदर्श तौर पर नई शृंखला को तैयार करने के लिए मूल आंकड़ों को टटोलना चाहिए था, जिसके लिए केंद्रीय सांख्यिकी संगठन पहले से प्रयास कर रहा है। इस बीच हमने दूसरे सबसे संभावित तरीके को अपनाया है। यह उत्पादन में आए बदलाव पर केंद्रित है। जैसे ही आधार वर्ष बदलता है, अर्थव्यवस्था में कुछ मदें अप्रासंगिक हो जाती हैं, जबकि कुछ पहले से ज्यादा महत्त्वपूर्ण हो जाती हैं। इसलिए दोनों शृंखला (2004-05 और 2011-12) में बदलाव या अंतर नए मदों के जुडऩे और पुराने तथा अप्रासंगिक हो चुके मदों के हटाने की वजह से बदल गया है। हमने जिस मूल्य को संदर्भ के तौर पर लिया है और माना है कि यह मूल्य 1993-94 से लेकर 2011-12 तक धीरे-धीरे बढ़ा है और एक साधारण समीकरण का इस्तेमाल कर इस मूल्य को प्रतिवर्ष में फिर से बांट दिया है।
 
समग्र और क्षेत्रवार स्तर पर ये संख्या कितनी ठोस हैं? 
 
2011-12 में मूल्यवर्धन के लिए नई और पुरानी शृंखला के बीच का अंतर 2011-12 में उच्चतम रहा। जैसे-जैसे हम साल दर साल पीछे जाते  हैं पुनर्वितरण चरणबद्घ तरीके से कम होता जाता है। दूसरे शब्दों में, अवधि के आरंभ (1993-94) में नए मदों का योगदान शून्य माना जाता है और यह समय के साथ बढ़ता चला जाता है।  जीडीपी की नई शृंखला में एक क्षेत्र से दूसरे में, सेवा से उत्पादन क्षेत्र में कुछ मदों को फिर से आवंटित किया गया है। इसलिए उप क्षेत्र के स्तर पर वृद्घि में अस्थिरता में बढ़ोतरी हो सकती है लेकिन समग्र स्तर पर ऐसा कोई उतार चढ़ाव दिखाई नहीं पड़ेगा।
 
यह सीएसओ के तरीके से किस प्रकार से अलग है? 
 
जहां तक मैं समझता हूं पहले केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ) दोनों तरीके अपनाता था।  एक निश्चित सीमा के बाद, वह उसी वृद्घि दर को बरकरार रखते हुए स्पलाइसिंग नाम के एक साधारण तरीके को इस्तेमाल करता है। यहां समस्या यह है कि जैसे ही वृद्घि दर को बरकरार रखा जाता है, अवधि की शुरुआत में (मौजूदा मामले में 1993-94) नए मदों का योगदान बड़ा हो जाता है, जो कि हो सकता है कि तर्कसम्मत नहीं हो। मेरा अनुमान है कि वे साधारण स्पलाइसिंग तरीके का इस्तेमाल करेंगे, जो कि समस्या खड़ी कर सकता है। वैसे मामले में हमें यह देखने के लिए इंतजार करना होगा कि वह शृंखला कैसी होगी।     
 
2011-12 के लिए जीडीपी आधारित यह पहली शृंखला है, जिसे सार्वजनिक किया गया है। इसके फायदे क्या हैं?
 
भारत के वृहद अर्थशास्त्र पर शोध करने वाले शोधार्थी तीन साल से अधिक की पिछली शृंखला के आंकड़ों की तलाश करते रहे हैं। मुझे बताया गया कि इसे जारी करने को लेकर इतनी देर पहले नहीं हुई है। अपने समग्र अंकों के आधार पर, कोई व्यक्ति बहुत ही आसानी से कह सकता है कि दोनों शृंखला के बीच का अंतर मामूली है और 5 प्रतिशत कम या ज्यादा मानक विचलन के दायरे में है, जो हम किसी भी अनुमान के मामले में मानते हैं। यह निश्चित तौर पर 2012-13 और 2013-14 के लिए एमओएसपीआई द्वारा सुझाए गए संशोधनों की सीमा से कम है।  
 
प्रोडक्शन शिफ्ट अप्रोच की सीमाएं क्या हैं, जो आपने अनपाया?     
 
हम अंतर को पिछले आंकड़े के करीब तक समायोजित कर लेते हैं और इसमें कुछ व्यवस्थित अस्थिरता आती रहती है। यह पुरानी शृंखला में अंतनिर्हित अस्थिरता तक बढ़ता है। यह आर्थिक गतिविधियों के पुन: आवंटन की वजह से भी होता है। 
Keyword: GDP, fiscal deficit, राजकोषीय घाटा जीडीपी,
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