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खाद्य फसलों में घट-बढ़ मगर दूध उत्पादन लबालब

संजीव मुखर्जी / नई दिल्ली August 22, 2018

दूध, चीनी, दाल या सब्जियां। आज आप देश में किसी भी कृषि जिंस का नाम लीजिए तो आपके दिमाग में आंदोलन कर रहे किसानों की तस्वीर उभरती है जो गिरती कीमतों और कम रिटर्न के कारण इन उत्पादों को सड़कों पर फेंक रहे हैं। कीमतों में गिरावट और कृषि संकट का मुख्य कारण मांग की तुलना में अधिक आपूर्ति है। यह कृषि जिंसों में अधिशेष की स्थिति है। अचानक आई इस स्थिति से उत्तर प्रदेश से लेकर महाराष्ट्र तक में किसानों में हाहाकार मच गया था। हम लंबे समय से कृषि जिंसों की कमी के आदी रहे हैं और अब आपूर्ति में मांग के मुकाबले बढ़ोतरी की समस्या सुर्खियां बन रही हैं। गिरती आय के कारण किसान सड़कों पर आ गए थे। वर्ष 2016 की नोटबंदी और पिछले साल आनन फानन में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू किए जाने से स्थिति और बदतर हुई है। 
 
सच्चाई यह है कि इस स्थिति का कोई एक कारण नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में कृषि उत्पादन में बारंबार बढ़ोतरी हुई है। अलबत्ता इस नई स्थिति ने कृषि के भविष्य को लेकर एक अहम सवाल खड़ा कर दिया है: क्या भारत कृषि उत्पादन में अधिशेष की ओर बढ़ रहा है? क्या हम उस स्थिति की ओर बढ़ रहे हैं जहां देश में अन्न के भंडार भरे होंगे और दूध की नदियां बह रही होंगी, जो स्थिति यूरोप ने उदार कृषि सब्सिडी के दम पर 1980 के दशक में हासिल की थी? विश्लेषकों का कहना है कि यह अनुमान लगाना जल्दबाजी होगी कि भारत कृषि जिंसों में अधिशेष के लंबे दौर में प्रवेश कर चुका है। उनके मुताबिक जब तक बाजार, भंडारण, वितरण, बारिश और कीमत जैसी बुनियादी समस्याओं का समाधान नहीं जो जाता है तब तक अधिशेष की  स्थिति बहुत कम समय में कमी में बदल सकती है। 
 
कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) के पूर्व अध्यक्ष और इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट रिसर्च (आईजीआईडीआर) के निदेशक महेंद्र देव ने कहा, 'मुझे नहीं लगता है कि मांग से ज्यादा आपूर्ति की स्थिति अधिक समय तक रहेगी। हो सकता है कि अगले एक-दो साल तक कुछ फसलों की आपूर्ति मांग से ज्यादा हो। लेकिन आर्थिक विकास की स्थिति में सुधार आने और कीमतों में बढ़ोतरी के बाद यह देखना होगा कि आपूर्ति की स्थिति कैसी रहती है।' आधिकारिक स्रोतों से मिले पिछले 10 वर्षों के आंकड़ों को देखें तो पता चलता है कि दूध को छोड़कर बाकी अधिकांश खाद्य फसलों के उत्पादन में तेज उतार-चढ़ाव आया है। यह उस साल हुई बारिश, कीमत और कारोबारी बंदिशों पर निर्भर करता है। 
 
अब दालों को ही लीजिए। मौजूदा उछाल से पहले देश में साल 2013-14 में दालों का रिकॉर्ड उत्पादन हुआ था। तब देश में 192.5 लाख टन दाल पैदा हुई थी। लेकिन इसके बाद लगातार दो साल तक सूखे के कारण इसमें गिरावट आई। 2014-15 में दलहन उत्पादन 171.5 लाख टन और 2015-16 में यह 163.5 लाख टन रहा। इसके कारण कुछ दालों की कीमत बढ़ गई। खासकर अरहर की कीमत करीब 200 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई थी। सरकार को इसमें हस्तक्षेप करना पड़ा और आयात तेज गति से बढ़ाना पड़ा। साथ ही कुछ अफ्रीकी देशों में भी भारतीय उपभोक्ताओं के लिए दाल उगाने की संभावनाओं को तलाशा गया। 
 
यह सब कुछ साल पहले ही हुआ था। दूसरे शब्दों में कहें तो अगर भारत में ज्यादा उपज देने वाली अरहर की नई किस्म पूसा-16 शुरू करने जैसी क्रांतिकारी छलांग नहीं लगाई तो यह स्थिति फिर पैदा हो सकती है। गन्ने के उत्पादन में तेजी में इस तरह की किस्मों के विकास की अहम भूमिका रही है। इसमें खासतौर पर गन्ना प्रजनन केंद्र के करनाल केंद्र द्वारा विकसित नई सी0-0238 किस्म अहम है। सी0-0238 और ज्यादा उपज देने वाली गन्ने की अन्य किस्मों के आने से यह सुनिश्चित होगा कि गन्ने की खेती वाले क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन की स्थिति में या भुगतान की समस्या के कारण किसान गन्ने के अलावा किसी अन्य फसल को अपनाते हैं, तो भी उत्पादन सतत गति से बढ़ता रहेगा। 
 
मौजूदा अधिशेष कम मांग का संकेत भी हो सकता है। मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट स्टडीज (एमआईडीएस) के निदेशक शशांक भिड़े ने कहा, 'कई फसलो में जो अधिशेष की स्थिति दिख रही है, उसका कारण यह भी हो सकता है कि पिछले कुछ वर्षों में आबादी के बड़े हिस्से की आय ज्यादा नहीं बढ़ी है। जब आय बढ़ेगी तो मांग में भी तेजी आएगी।' उन्होंने कहा कि अल्पावधि में कुछ जिंसों के अधिशेष में अचानक तेजी आ सकती है लेकिन दीर्घावधि में कृषि में अधिशेष की किसी भी स्थिति को निचले स्तर पर आय में बढ़ोतरी के संदर्भ में देखा जाना चाहिए जो संभावित मांग का प्रतिनिधित्व करती है। यह ऐसी मांग है जिसे अब तक भुनाया नहीं गया है। भिड़े ने कहा, 'जब तक कीमतों में और गिरावट नहीं आती है या फिर छिपी मांग पूरी तरह भुनाई नहीं जाती है, तब तक हम यह नहीं कह सकते हैं कि भारत कृषि जिंसों में सतत अधिशेष की स्थिति में पहुंच गया है।'
 
भारतीय अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संबंध अनुसंधान परिषद (इक्रियर) में इन्फोसिस चेयर प्रोफेसर फॉर एग्रीकल्चर अशोक गुलाटी ने कहा, 'अभी कोई भी यह अनुमान नहीं लगा सकता है कि यह सतत अधिशेष की स्थिति है। अलबत्ता अगले दो या तीन साल में भारत अधिकांश कृषि जिंसों के मामले में बहुत अच्छी स्थिति में पहुंच जाएगा। अगर देश में 2014-15 और 2015-16 की तरह लगातार दो बार सूखा पड़ा तो यह अधिशेष बहुत तुरंत गायब हो सकता है।' सवाल है कि सरकार को क्या करना चाहिए। गुलाटी कहते हैं कि अधिशेष हो या फिर कमी की स्थिति, सरकार को उपभोक्ता के बजाय किसानों की चिंता करनी चाहिए या फिर कम से कम किसानों को एक तटस्थ मंच मुहैया कराना चाहिए। उन्होंने कहा, 'हमें आवश्यक वस्तु अधिनियम (ईसीए) को खत्म करने की जरूरत है। निजी क्षेत्र को स्टॉक रखने और संगठित खुदरा की अनुमति दी जानी चाहिए। ठेके पर खेती की अनुमति देने की भी जरूरत है, खासकर जल्दी खराब होने वाली उपज में यह जरूरी है। कृषि मूल्य विपणन समितियों में सुधार की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही है। इन उपायों के बाद ही कोई कृषि में ढांचागत बदलाव की उम्मीद कर सकता है। निर्यात सब्सिडी देने या सरकारी भंडारण की व्यवस्था जैसे अल्पावधि उपायों से ज्यादा मदद नहीं मिलेगी।'
Keyword: jins, veg, दूध, चीनी, दाल, सब्जियां,
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