बिजनेस स्टैंडर्ड - भीषण बाढ़ से टायर और कॉफी उद्योग भी होंगे प्रभावित
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भीषण बाढ़ से टायर और कॉफी उद्योग भी होंगे प्रभावित

बाजार संकेतक
देवांग्शु दत्ता /  August 22, 2018

शेयर बाजार ने तुर्की से आ रही बुरी खबरों को नजरअंदाज कर दिया। भारतीय शेयर बाजार के निवेशकों ने वित्त वर्ष की पहली तिमाही के अच्छे नतीजों, सशक्त औद्योगिक गतिविधियों और प्रमुख मुद्रास्फीति में आई कमी का स्वागत किया। चीन और अमेरिका के बीच व्यापार वार्ता की बहाली को भी उम्मीद से देखा गया। हरेक वैश्विक निवेशक यह उम्मीद कर रहा है कि अमेरिका आयात शुल्कों में बढ़ोतरी की धमकियों से पीछे हटेगा और चीन भी उसकी राह पर चलेगा।  हालांकि रुपये में भारी गिरावट की उम्मीद नहीं की गई थी। तुर्की की मुद्रा लीरा ने इस गिरावट को तेजी दी। भारत का व्यापार घाटा बढ़ रहा है और चालू खाता घाटा भी 2018-19 में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 2.5 फीसदी तक पहुंच सकता है। आरबीआई की वास्तविक प्रभावी विनिमय दर के मुताबिक अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये के 70.23 तक लुढ़क जाने के बाद भी रुपया अधिमूल्यित हो सकता है।

 
विदेशी मुद्रा भंडार में अप्रैल से अब तक 21 अरब डॉलर (करीब 5 फीसदी) की कमी आ जाने से लगता है कि रिजर्व बैंक ने रुपये को संभालने के लिए विदेशी मुद्रा की बिक्री की है। अगस्त में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई) ने रुपये में कर्ज और इक्विटी की खरीद की है। यह एफपीआई प्रतिदान के चलते होने वाले विदेशी मुद्रा प्रवाह पर रोक लगाता है, लिहाजा राहत की खबर है। केरल और कोडगू में आई भीषण बाढ़ का भी बाजार पर असर पड़ेगा। केरल में रबर की बड़ी फसल के खराब होने से टायर उद्योग पर काफी खराब असर पड़ेगा। देश के कुल रबर उत्पादन में केरल का योगदान करीब 90 फीसदी है। इसी तरह केरल के प्रमुख कॉफी उत्पादक राज्य होने से कॉफी उद्योग पर भी बाढ़ की विभीषिका देखने को मिल सकती है। मुख्यत: दक्षिण भारत में सक्रिय साउथ इंडियन बैंक एवं फेडरल बैंक और मुथूट एवं मणप्पुरम भी बुरी तरह प्रभावित होंगे। मसाला बाजार में भी आपूर्ति व्यवधान हो सकते हैं। हालांकि अभी बाजार पर बाढ़ का कम असर ही है। 
 
बाजार ने औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) में मजबूती पर सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है। आईआईपी जून में सात फीसदी तक पहुंच गया। अप्रैल-जून तिमाही में आईआईपी की समेकित वृद्धि दर एक साल पहले के मुकाबले 5.2 फीसदी रही। मुद्रास्फीति में भी गिरावट आई है। जुलाई में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक जुलाई 2017 की तुलना में 4.17 फीसदी अधिक रहा। जून के 4.84 फीसदी वृद्धि के मुकाबले यह बेहतर ही है। मौद्रिक नीति समिति का मुद्रास्फीति को 4 फीसदी के दायरे में रखने का लक्ष्य अधिक दूर नहीं है। महंगाई दर में गिरावट की बड़ी वजह खाद्य मुद्रास्फीति में हुई 1.7 फीसदी की कमी रही। खाद्य मुद्रास्फीति अस्थिर है। अगर खाद्य और तेल जैसे अस्थिर अवयवों को हटाकर देखें तो हमारी प्रमुख मुद्रास्फीति काफी हद तक स्थिर है। 
 
प्रमुख मुद्रास्फीति छह फीसदी से ऊपर चल रही है। आवास, परिवहन, स्वास्थ्य देखभाल, शिक्षा और परिधान जैसे प्रमुख अवयव 12 महीनों के उच्च स्तर पर हैं। ऐसे में प्रबल संभावना है कि आरबीआई दरों में कटौती पर विचार कर सकता है।   पहली तिमाही में आय के आंकड़े अच्छे रहे हैं। वित्त वर्ष की पहली तिमाही के नतीजे जारी करने वाली 2271 कंपनियों का समेकित शुद्ध लाभ 7.9 फीसदी अधिक रहा है। राजस्व में तो 18.7 फीसदी की उच्च वृद्धि दर्ज की गई है जो तीन वर्षों का सर्वोच्च स्तर है। इस तिमाही में कंपनियों का समेकित शुद्ध लाभ 1.08 लाख करोड़ रुपये रहा जो चार वर्षों में सर्वाधिक है। नोटबंदी और जीएसटी के मिले-जुले असर ने पिछले दो वर्षों में बिक्री और लाभ को कम किया है। 
 
ऊर्जा और धातु एवं खनन कंपनियों का प्रदर्शन सबसे अच्छा रहा है। इन क्षेत्रों का शुद्ध बिक्री वृद्धि में 59 फीसदी और लाभ वृद्धि में लगभग पूरा हिस्सा है। जिंसों के भाव बढऩे से ऑटोमोबाइल जैसे उद्योगों में लाभ के मार्जिन पर असर देखने को मिल सकता है। खासकर इस्पात उद्योग की स्थिति में आया सुधार बैंकों के लिए भी अच्छी खबर लेकर आया। अप्रैल-जून तिमाही में घरेलू बैंकों की सकल गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (जीएनपीए) में जनवरी-मार्च 2018 तिमाही की तुलना में 220 अरब रुपये की कमी आई है। 40 बैंकों के आंकड़े बताते हैं कि जून तिमाही में जीएनपीए 10.03 लाख करोड़ रुपये था जबकि मार्च तिमाही में यह 10.25 लाख करोड़ रुपये रहा था। भूषण स्टील और इलेक्ट्रोस्टील स्टील्स के दिवालिया समाधान से जीएनपीए में यह कमी आई। शुद्ध एनपीए भी 325 अरब रुपये की गिरावट के साथ 4.85 लाख करोड़ रुपये रहा जबकि मार्च तिमाही में यह 5.18 लाख करोड़ रुपये था।
 
क्रेडिट रेटिंग एजेंसी केयर रेटिंग्स का कहना है कि अगर अगली तिमाही में भी बैंकों के फंसे कर्जों में गिरावट की प्रवृत्ति बनी रहती है तो माना जा सकता है कि बुरा दौर खत्म होने वाला है। इस मामले में स्टील उद्योग सबसे अहम होगा। उभरते देशों की मुद्राओं में भारी गिरावट आने से रूस से इस्पात का आयात काफी सस्ता हो जाएगा। ऐसा होने पर घरेलू स्टील उद्योग संरक्षणवादी शुल्कों के बावजूद फिर से दुविधा में फंसा पाएगा। दूसरी तरफ धातुओं की कीमतें गिरने पर ऑटो उद्योग का मार्जिन बढ़ेगा। 
 
शेयर बाजार में पिछले हफ्ते लगातार नई ऊंचाइयां छूने का सिलसिला जारी रहा। एफपीआई के प्रबल विक्रेता के बजाय मध्यम खरीदार होने से ऐसा हुआ। हालांकि आने वाले दिनों में तेजी का यह रुझान सीमित ही रहेगा। खुदरा निवेशकों के सक्रिय होने के संकेतों के बावजूद स्मॉलकैप और मिडकैप का प्रदर्शन अपेक्षा के अनुरूप नहीं रहा है। एकदम नए दायरे में कारोबार कर रहे बाजार के बारे में तकनीकी तौर पर कुछ कह पाना मुश्किल है। लेकिन इतिहास बताता है कि बाजार सीमित दायरे में अधिक देर तक नहीं बना रहता है।
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