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नई राष्ट्रीय खनिज नीति जल्दी की जाए तैयार

एस के रूंगटा /  08 22, 2018

राष्ट्रीय खनिज नीति के निर्माण में इस क्षेत्र के लिए जरूरी खाका पेश किया जाना चाहिए और यह संकेत दिया जाना चाहिए कि खनिज क्षेत्र जीडीपी में किस हद तक योगदान कर सकता है। बता रहे हैं एस के रूंगटा

 
सर्वोच्च न्यायालय ने 2 अगस्त, 2017 को कॉमन काज और यूनियन ऑफ इंडिया के मामले में निर्णय देते हुए केंद्र सरकार को निर्देश दिया था कि वह एक नई, प्रभावी, सार्थक और क्रियान्वयन योग्य राष्ट्रीय खनिज नीति पेश करे। मसौदा राष्ट्रीय खनिज नीति को विधायी रूप प्रदान करने के पहले मशविरे का चरण भी पूरा हो चुका है। यह मसौदा नीति कई सकारात्मक पहलुओं को समेटे है। उदाहरण के लिए खनिज संसाधन के आवंटन में पारदर्शिता, तय अवधि तक पूरी सुरक्षा, प्रौद्योगिकी आधारित संचालन तंत्र, समयबद्घ मंजूरी प्रक्रिया और ब्लॉक की नीलामी के दौरान पहले खारिज करने के अधिकार के साथ खनन को प्रोत्साहन। 
 
बहरहाल, अभी भी कई अहम पहलू हैं जिनके साथ विवेकपूर्ण ढंग से निपटना होगा। मसौदा नीति देश के आर्थिक विकास के साथ खनिज खनन और प्रबंधन के एकीकरण की बात करती है। कहा गया है कि यह काम पारदर्शी और पर्यावरण के अनुकूल ढंग से किया जाएगा। परंतु इसमें कोई विशिष्टï लक्ष्य तय नहीं किए गए हैं और यह नहीं बताया गया कि निकट भविष्य में यह देश के खनन क्षेत्र को कहां पहुंचाना चाहती है।  अगर हम राष्ट्रीय खनिज नीति के मसौदे की तुलना वर्ष 2017 में आई राष्ट्रीय इस्पात नीति से करें तो इस्पात नीति अपने लक्ष्यों को लेकर एकदम स्पष्ट है। मसलन उसमें कहा गया है कि वर्ष 2030-31 तक प्रति व्यक्ति इस्पात खपत में 160 किलोग्राम तक की बढ़ोतरी करनी है। फिलहाल यह 61 किलोग्राम है। यह भी कहा गया है कि उस समय तक इस्पात क्षेत्र की संपूर्ण मांग से घरेलू उत्पादन से ही निपटने का प्रयास किया जाएगा। इसके लिए उस वक्त तक 300 टन प्रति वर्ष इस्पात उत्पादन की क्षमता विकसित करनी पड़ सकती है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए एक खाका भी सामने रखा गया है। इसमें 2030-31 तक विस्तृत अनुमान और क्षेत्रवार इस्पात खपत और कच्चे माल की जरूरत का जिक्र है। देश की विकास संबंधी जरूरतों के बढऩे के साथ खनन मंत्रालय को अहम खनिजों की तलाश और खनन को लेकर नीतिगत दृष्टिï विकसित करनी चाहिए। ऐसा करके ही हम आयात पर निर्भरता समाप्त कर सकेंगे। 
 
फिलहाल भारत विभिन्न प्रकार के खनिजों का आयात करता है। खनिजों और मूल्यवान धातुओं के सालाना आयात की राशि 94 अरब डॉलर है। यह वर्ष 2017-18 में देश के 466 अरब डॉलर के कुल आयात बिल का 20 फीसदी है। अगर हम कोयला, तेल और प्राकृतिक गैस को भी शामिल कर दें तो यह 226 अरब डॉलर का आंकड़ा पार कर जाएगा। यानी देश के कुल आयात के आधे से अधिक। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि देश की जीडीपी वृद्घि के साथ मांग बढऩे पर किस हद तक आयात की आवश्यकता होगी। खनिज नीति में यह संकेत होना चाहिए कि यह देश के जीडीपी में किस हद तक योगदान करेगी। फिलहाल खनिज क्षेत्र का योगदान मात्र 2.2 प्रतिशत है। दक्षिण अफ्रीका में यह 8.1 फीसदी, रूस में 7.7 फीसदी और ऑस्ट्रेलिया में 6.9 फीसदी है। देश के भौगोलिक संसाधन कहीं बड़े स्तर का खनिज विकास सहन कर सकते हैं। 
 
राष्ट्रीय खनिज नीति में खनन में निवेश बढ़ाने और इसे प्रोत्साहन देने की बात कही गई है। परंतु यह खनन के लिए लक्षित की जाने वाली भौगोलिक संभावनाओं को लेकर मूक है। यह भी नहीं बताया गया है कि संभावित लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए भारत को कितना निवेश करना चाहिए या कितना बजट आवंटित करना चाहिए? बिना लक्ष्य तय किए नीति में उल्लिखित बातों को हासिल कर पाना बेहद मुश्किल है।  वर्ष 2008 की खनिज नीति की बात करें तो यह मसौदा भी उसी के समान यह सुझाव देता है कि छोटी खनन लीज के लिए क्लस्टर रुख अपनाना चाहिए। इसके लिए जमा एक लीज के रूप में होना चाहिए। मौजूदा खनिज संसाधनों की बात करें तो उनके उत्खनन में लीज पर दिया गया हिस्सा कई अंशधारकों में बंटा हुआ है। नई नीति में समेतिक खनन को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। यानी एक क्षेत्र में लीजधारक मिलकर खनन करें। ऐसे में जो खननकर्ता एक खास भूभाग मे होने वाले खनन में स्वैच्छिक रूप से सहभागिता कर रहे हों उनको खनिज रियायत नियमों में जरूरी शिथिलता प्रदान की जा सकती है। 
 
मसौदा नीति में खनिज विकास से जुड़ी एक अत्यंत अहम बात की अनदेखी की गई है। वह है मूल्य निर्धारण व्यवस्था। मसौदे में केवल इतना कहा गया है कि मूल्य निर्धारण का तरीका ऐसा होना चाहिए कि खनिज आधारित उत्पाद घरेलू उपभोक्ताओं को उचित मूल्य पर उपलब्ध हो सकें। यह कीमत बाजार की ताकतों द्वारा निर्धारित की जानी चाहिए। यहां पर उचित मूल्य शब्द अपने आप में अस्पष्टï है और इसकी अलग-अलग व्याख्या की जा सकती है। नई नीति में खनन मूल्य निर्धारण व्यवस्था ऐसी हो जो पूरी तरह बाजार ताकतों द्वारा निर्धारित हो। ये ताकतें ऐसी हों जो वैश्विक सूचकांकों का भी प्रतिनिधित्व करती हों। 
 
नई खनिज नीति का सबसे अहम पहलू खनिज उत्खनन की मात्रा तय करने संबंधी सरकार के संस्थागत नजरिये से संबंधित है। इसे लेकर सरकार को एकदम साफ दृष्टिïकोण अपनाना होगा। मसौदा नीति में केवल यह कहा गया है कि अंतरमंत्रालयीन संस्था का गठन किया जाएगा जिसमें खनन, भूविज्ञान और पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के अलावा राज्यों के मंत्रियों और सचिव स्तर के अधिकारी शामिल होंगे। यह संस्थान विभिन्न मानकों के अध्ययन के बाद यह तय करेगी कि कितना खनन होना चाहिए। इसमें खनिज संसाधन की उपलब्धता, क्षेत्र की वहन क्षमता और पर्यावरण आदि पर उसका प्रभाव जैसे मानक शामिल हैं। 
 
प्रस्तावित संस्थागत व्यवस्था में खनन निगरानी के लिए अद्यतन तकनीक का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। इससे नियामकीय मशीनरी और खनन उद्योग दोनों को पारदर्शिता और किफायत लागू करने में सहायता मिलेगी।  नई राष्ट्रीय खनन नीति को एक प्रगतिशील नीति होना चाहिए जो देश के खनन क्षेत्र का संतुलित विकास करे और केंद्र सरकार को भी जरूरी नीतिगत बदलाव लाने के लिए लचीला रुख अपनाना चाहिए। इस नीति को जल्द से जल्द लागू किया जाना चाहिए ताकि खनन उद्योग निवेश और उत्पादन बढ़ा सके। 
 
(लेखक भारतीय इस्पात प्राधिकरण के पूर्व चेयरमैन हैं)
Keyword: mining, policy, india, court, राष्ट्रीय खनिज नीति,
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