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नियमों से खेल रहा है आपका फंड तो झेलना पड़ेगा आपको दंड

संजय कुमार सिंह और तिनेश भसीन /  August 22, 2018

भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने 9 जुलाई को एसोसिएशन ऑफ म्युचुअल फंड्स इन इंडिया (एम्फी) को एक पत्र लिखा था। इसमें संगठन के सदस्यों को उन 25 उल्लंघनों पर चेतावनी दी गई, जो उसे अप्रैल, 2014 से मार्च, 2016 के बीच फंड हाउसों के निरीक्षण में मिले थे। सेबी ने 25 जुलाई को म्युचुअल फंडों के स्वतंत्र न्यासियों के साथ बैठक में भी इन उल्लंघनों का मुद्दा फिर से उठाया और न्यासियों को कंपनी चलाने के उच्च मानदंड सुनिश्चित करने को कहा। साफ है कि 23.57 लाख करोड़ रुपये के उद्योग में सब कुछ ठीक नहीं है।  

 
उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि निवेशकों को ज्यादा चिंतित नहीं होना चाहिए। एम्फी के चेयरमैन और बिड़ला सन लाइफ एसेट मैनेजमेंट के मुख्य कार्याधिकारी ए बालासुब्रमण्यन ने कहा, 'एम्फी ने सेबी की शिकायतें सभी सदस्यों तक पहुंचा दी हैं ताकि फंड हाउसों को इनके बारे में पता हो और वे इन्हें दूर कर सकें।' क्वांटम म्युचुअल फंड के सीईओ जिमी पटेल ने कहा, 'ये उल्लंघन गंभीर होते तो सेबी फंड हाउसों के खिलाफ कार्रवाई करता। लेकिन यह दिशानिर्देश की तरह है ताकि ऐसे मसले भविष्य में न आएं।' मगर कुछ अहम उल्लंघन ऐसे हैं, जिनका आपके निवेश पर असर पड़ सकता है।
 
कार्यक्षेत्र से भटकना 
 
सेबी के पत्र में योजना सूचना दस्तावेज में उल्लिखत मकसद से भटकने वाली योजनाओं के जोखिमों की तरफ इशारा किया गया है। निवेशक फंड को इसलिए चुनते हैं क्योंकि इसका कार्यक्षेत्र उनके वित्तीय लक्ष्यों और जोखिम क्षमता से मेल खाता है। फंड्सइंडिया डॉट कॉम की अनुसंधान प्रमुख विद्या बाला ने कहा, 'फंड कार्यक्षेत्र से भटकता है तो  निवेशकों का वित्तीय लक्ष्य जोखिम में पड़ता है।' फंडों को ऐसे भटकाव से बचना चाहिए। मसलन लघु अवधि के फंडों के लिए बॉन्डों को रखने की अवधि के नियम हैं। लेकिन उनकी ऋण जोखिम सीमा के बारे में नियम नहीं हैं। अगर ऐसे फंड ज्यादा कर्ज जोखिम लेते हैं और डिफॉल्ट होता है तो निवेशक अवांछित जोखिम में पड़ जाएंगे। 
 
एक जगह ज्यादा निवेश 
 
सेबी के पत्र में उन मामलों को लेकर भी चेतावनी दी गई है, जिनमें निर्गमकर्ता की डेट योजना में निवेश बढ़ाने के लिए एएमसी और न्यासी बोर्ड की मंजूरी ली जा रही है। एमटेक ऑटो के बॉन्डों के डिफॉल्ट के बाद सेबी ने निवेश सीमा के नियम तय किए थे। एमटेक ऑटो मामले में जेपी मॉर्गन के फंडों पर तगड़ी चोट पड़ी थी। कोई फंड एक निर्गमकर्ता के बॉन्डों में अधिकतम 10 फीसदी निवेश कर सकता है। न्यासियों की मंजूरी से इसे बढ़ाकर 12 फीसदी किया जा सकता है। कंपनी समूह में निवेश की सीमा 20 फीसदी (25 फीसदी तक बढ़ाया जा सकता है) और एक क्षेत्र में निवेश की सीमा 25 फीसदी है। फंड इनका उल्लंघन करता है और डिफॉल्ट होता है तो निवेशकों पर ज्यादा भारी चोट पड़ेगी। 
 
लाभांश वितरण की मंजूरी
 
सेबी के निरीक्षण में ऐसे मामले दिखे हैं, जहां लाभांश वितरण के लिए न्यासियों की मंजूरी नहीं ली गई या लाभांश घोषित करने, मात्रा का फैसला करने या रिकॉर्ड डेट तय करने की न्यासियों की शक्तियां एएमसी के अधिकारियों को दे दी गईं। नियमित लाभांश के वादे पर बैलेंस्ड फंडों की अनुचित बिक्री भी हो रही है। मॉर्निंगस्टार इन्वेस्टमेंट एडवाइजर इंडिया के निदेशक (प्रबंधक शोध) कौस्तुभ  बेलापुरकर ने कहा, 'हो सकता है कि फंड हाउसों ने निवेशकों को वादे के मुताबिक भुगतान के लिए न्यासियों की मंजूूरी बिना विशेष लाभांश घोषित किया हो। लेकिन यदि बोर्ड और न्यासी संपत्ति प्रबंधक के कार्यों के लिए जिम्मेदार हैं तो उनकी मंजूरी ली जानी चाहिए।
 
'क्लोज एंड फंड में जोखिम 
 
एक अन्य मसला यह उठाया गया है कि क्लोज्ड-एंड फंड ऐसी योजनाओं में निवेश कर रहे हैं, जिनकी परिपक्वता अवधि फंड की परिपक्वता से अधिक है। जब फिक्स्ड मैच्योरिटी प्लान (एफएमपी) जैसा क्लोज्ड एंड फंड उन बॉन्डों में निवेश करता है, जिनकी अवधि फंड से मेल नहीं खाती है तो फंड बाजार जोखिमों के अधीन आ जाता है। कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार में बहुत अधिक लेनदेन नहीं होता है। इसलिए मांग-आपूर्ति का मुद्दा होता है, जिसकी वजह से एक ही परिपक्वता अवधि वाले बॉन्ड नहीं मिलते। बेलापुरकर का कहना है कि 15 से 30 दिन का अंतर होता है तो चिंता नहीं होनी चाहिए। अगर फंड के परिपक्व होने के समय योजना के परिपक्व होने में कुछ दिन बचे हैं तो इसे उसी फंड हाउस के दूसरे फंड में शामिल किया जा सकता है। बेलापुरकर ने कहा, 'ऐसे फेरबदल में बॉन्ड की कीमत पारदर्शी होनी चाहिए।' उन्होंने कहा कि फंड और बॉन्ड के परिपक्व होने की तारीख में 30 दिन से अधिक अंतर है तो चिंता का विषय है। 
 
निवेशक रहें सजग 
 
सेबी का पत्र चेताता है कि निवेशक फंडों का चयन उनके प्रदर्शन के आधार पर ही नहीं बल्कि कंपनी चलाने के उच्च मानक अपनाने की उनकी साख के आधार पर भी करें। निवेशक सेबी द्वारा जारी निर्देशों पर भी नजर रखें। अगर फंड हाउस की बार-बार खिंचाई हो रही है तो कंपनी परिचालन की समस्या हो सकती है। पटेल का सुझाव है कि निवेशक फंड हाउसों की मासिक और सालाना रिपोर्ट की घोषणाओं की जानकारी रखें। यदि आपका फंड हाउस अन्य की तुलना में ज्यादा प्रतिफल देता है तो खबरदार रहें। ऐसा फंड प्रबंधक के निवेश कौशल की बदौलत हो सकता है। लेकिन यह भी हो सकता है कि फंड किसी एक प्रतिभूति या क्षेत्र में ही मोटे निवेश का जोखिम उठा रहा हो। आपको फंड से बाहर निकलना चाहिए या नहीं, इसके बारे में अपने सलाहकार से विचार-विमर्श कीजिए। 
Keyword: sebi, भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी),
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