बिजनेस स्टैंडर्ड - पोंजी योजना से निपटना होगा आसान!
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पोंजी योजना से निपटना होगा आसान!

संजय कुमार सिंह /  August 22, 2018

सारदा, रोज वैली, पैन कार्ड जैसे नाम सुनकर आपके दिमाग की घंटी बजती है? अगर आप खबरों से जुड़े रहते हैं तो जरूर बजती होगी क्योंकि ये उन फर्जी योजनाओं के नाम हैं, जिनमें फंसकर देसी निवेशकों ने करोड़ों रुपये गंवाए हैं। इस तरह की धोखाधड़ी पर लगाम कसने के लिए सरकार ने हाल ही में संसद में 'अनियमित जमा योजना प्रतिबंध विधेयक, 2018' पेश किया। इस विधेयक के सख्त प्रावधान तो कारगर साबित होंगे ही, लेकिन जरूरी है कि निवेशक खुद भी ऐसी योजनाओं को पहचानने और इनसे दूर रहने में सक्षम बन जाएं।

 
पोंजी को पहचानें और दूर रहें
 
फर्जी योजनाओं में ऐसी कुछ खासियतें होती हैं, जिनकी वजह से समझदार निवेशक उन्हें आसानी से पहचान सकते हैं। सबसे पहली बात है बहुत अधिक प्रतिफल का वायदा। सेबी के साथ पंजीकृत निवेश सलाहकार अरविंद ए राव कहते हैं, 'अगर आज बैंक आपको केवल 7 फीसदी प्रतिफल दे रहा है और कोई ऐसी योजना आ जाए, जो आपको 18 फीसदी प्रतिफल देने का वायदा करने लगे तो आपके कान खड़े हो जाने चाहिए क्योंकि मामला गड़बड़ हो सकता है।' फर्जी योजना की दूसरी पहचान 'गारंटीशुदा' रिटर्न का वायदा है। आजकल बहुत कम योजनाएं गारंटीशुदा प्रतिफल देती हैं। यह भी याद रखें कि ऊंचा प्रतिफल और गारंटीशुदा प्रतिफल कभी एक साथ नहीं मिलते। तीसरा इशारा आपको तब मिलता है, जब योजना बेचने वाला निवेश के तरीके को बेहद पेचीदा बना देता है। ऐसा हो तो भी सावधान हो जाएं। याद रखने वाली चौथी बात यह है कि अगर एजेंट आपको निवेश से जुड़े जोखिम नहीं बताता है तो योजना से दूर रहें।
 
योजना बेचने आए एजेंट से सबसे पहले पूछें कि निवेश कराने वाली कंपनी किस नियामक के पास पंजीकृत है। राव कहते हैं, 'अगर कंपनी असली है तो एजेंट आपको पंजीकरण और लाइसेंस का क्रमांक बताएगा।' ऐसी कंपनियों में निवेश करें, जिन्हें इस कारोबार में ठीकठाक समय हो चुका है। मुंबई में रहने वाले वित्तीय योजनाकार अर्णव पंड्या कहते हैं, 'यदि कोई कंपनी 20-30 साल से कारोबार कर रही है तो इस बात की आशंका बहुत कम होगी कि वह घोटाला कर रही है। मगर महज 2-3 साल पुरानी कंपनी किसी भी वक्त आपको झांसा देकर भाग सकती है।'
 
पंड्या की सलाह है कि बैंक सावधि जमा, लघु बचत योजना, भारत सरकार के बॉन्ड, म्युचुअल फंड जैसी योजनाओं में निवेश करना अधिक समझदारी की बात है। उनकी राय है कि नामी-गिरामी कंपनियों की योजनाओं में ही निवेश करना चाहिए और छोटी या स्थानीय स्तर पर कारोबार कर रही कंपनियों से दूरी बरतने में ही समझदारी है।
 
नियामक और कानून के झोल
 
जब ऐसे घोटाले होते हैं तो उनसे निपटने वाले प्रमुख कानूनी प्रावधान भारतीय दंड संहिता में हैं, जो फर्जीवाड़े और धोखाधड़ी से संबंधित हैं। इनके अलावा सेबी के कुछ कानून भी इनमें काम करते हैं। लेकिन मुश्किल यह है कि धोखाधड़ी साबित करने में बहुत अधिक समय लग सकता है और ऐसे मामलों में जुर्माना भी बहुत अधिक नहीं होता। जाहिर है कि धोखाधड़ी रोकने का तंत्र मजबूत नहीं है। नियामकीय संस्थाओं की वजह से भी अपराधियों को बच निकलने का मौका मिल जाता है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) सिर्फ बैंकों और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) पर ही लगाम रखता है। सेबी के पास सामूहिक निवेश योजनाओं की मुश्कें कसने के नियम तो हैं, लेकिन सहकारी समितियों को इनमें शामिल नहीं किया जाता। कई विषय केंद्र के कानूनों के अधीन होते हैं, लेकिन कई मुद्दे ऐसे भी हैं, जो राज्यों के अधीन हैं। गड़बड़ करने वालों को इस तरह की नियामकीय खामियों के कारण बच निकलने का मौका मिल जाता है।
 
बेहद व्यापक विधेयक
 
प्रस्तावित विधेयक की सबसे बड़ी ताकत उसका व्यापक स्वरूप है। वीरा लॉ में पार्टनर अजय जोसेफ का कहना है, 'जमा उगाहने वाली हर तरह की योजना इसके दायरे में आती है, चाहे वह नियमित हो या अनियमित। जो योजनाओं की लगाम पहले से ही किसी नियामक के हाथ में है, वे भी इसके ही अंतर्गत होंगी। इस विधेयक में अनियमित संस्थाओं द्वारा जमा इक_ïी किए जाने पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने का प्रावधान है।' यदि कोई कंपनी रकम जुटाती है, लेकिन धोखाधड़ी की वजह से निवेशकों मूल रकम लौटाने और ब्याज देने में नाकाम रहती है तो उस कंपनी को दोषी माना जाएगा।
 
पहले संबद्घ अधिकारियों को तफ्तीश शुरू करनी पड़ती थी, जांच होती थी और लंबी-चौड़ी कवायद से गुजरना पड़ता था। भारत में न्यायिक प्रक्रिया धीमी है। जिन लोागों के खिलाफ मामले चलाए जाते हैं, वे कार्यवाही को और भी धीमा करने के तरीके ढूंढ निकालते हैं, जिसके कारण दोषियों को सजा दिलाने में बहुत वक्त लग जाता है। राज्यों में जो सक्षम प्राधिकरण बनाए जा रहे हैं, इस विधेयक से उन्हें अनियमित जमाओं के द्वारा हासिल की गई संपत्तियां कुर्क करने की इजाजत मिल जाएगी। जोसफ कहते हैं, 'अधिकारियों को धोखाधड़ी का पता चलने या रकम डूबने का इंतजार नहीं करना पड़ेगा क्योंकि उसके बाद रकम वसूल कर पाना बहुत मुश्किल होता है। सक्षम प्राधिकरण को जैसे ही जानकारी मिलेगी, वैसे ही वह हरकत में आ जाएगा। उसे कारण पूछने का, खाते का ब्योरा मांगने का और उसके बाद कुर्की का आदेश देने का अधिकार होगा ताकि और रकम इक_ïी नहीं की जा सके।'
 
अगर रकम चुपचाप किसी संबंधित पक्ष के पास भेजी जा रही है तो इस कानून के तहत विशेष अदालत सीधे उस संस्था तक पहुंच सकती है, जिसे रकम भेजी गई है। वह संबंधित पक्ष से पूछ सकती है कि रकम हासिल करने वाली संस्था की संपत्तियों में से उस रकम के बराबर कीमत वाली संपत्तियां कुर्क क्यों नहीं की जानी चाहिए। रकम हासिल करने वालों को भी दिखाना पड़ेगा कि उन्होंने संबंधित पक्ष से हुए इस लेनदेन में मिली संपत्तियों की वाजिब कीमत चुकाई है। कुल मिलाकर इस विधेयक में वित्तीय और कैद-संबंधित डर बहुत अधिक हैं।
 
सख्ती पर जोर
 
बहरहाल जिन लोगों का वास्ता इस तरह की बातों से पड़ता है, वे इस विधेयक से पूरी तरह खुश नहीं हैं। उनका कहना है कि सरकार को पर्याप्त संसाधन आवंटित कर, बुनियादी ढांचे में सुधार कर और पर्याप्त संख्या में न्यायाधीशों की नियुक्ति कर (ताकि मुकदमे की सुनवाई जल्द शुरू हो) न्यायिक व्यवस्था की खामियों को दूर करना चाहिए। लेकिन उसकी जगह सरकार केवल सख्त कानून बनाने पर जोर दे रही है। जोसफ कहते हैं, 'मेरे खयाल से उचित और निष्पक्ष सुनवाई किए बगैर संपत्तियां कुर्क करना या जुर्माना लगाना ज्यादा ही कठोर कदम है। कई बार ऐसे कानूनों का इस्तेमाल मकसद तक पहुंचने के बजाय लोगों को डराने के लिए भी किया जा सकता है।' दूसरी चिंता यह है कि इन विशेष अदालतों के पीठासीन न्यायाधीशों के पास पेचीदा वित्तीय मसले समझने लायक जानकारी है भी या नहीं।
 
कई पश्चिमी देशों में व्हिसलब्लोअर यानी गड़बड़ी के प्रति आगाह करने वाले को प्रोत्साहित करने और उनकी हिफाजत करने की प्रभावी नीतियां हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इस कानून में भी इसी तरह की नीति शामिल की जानी चाहिए। साथ ही यह अपेक्षा करना भी ठीक नहीं है कि सक्षम प्राधिकरण देश के किसी भी कोने में चलने वाली ऐसी फर्जी योजनाओं के बारे में पता लगा लेंगे। हकीकत तो यही है कि एकदम नए और अधिक कठोर कानून से भी यह समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हो सकती।
 
इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस में सहायक प्रोफेसर (वित्त) रामभद्रन तिरुमलाई कहते हैं, 'चूंकि गलत काम करने से रोकने वाले प्रावधान मजबूत हैं, इसलिए लोग ऐसी योजनाएं शुरू करने से पहले कई बार सोचेंगे। लेकिन इस बात की भी पूरी संभावना है कि गुपचुप तरीके से ऐसी गतिविधियां चालू रखी जाएं। हो सकता है कि बिना किसी लिखित दस्तावेज के इन्हें चलाया जाए या जबानी वायदों पर ही ऐसी योजना चलती रहे। ऐसा हुआ तो इनका पता लगाना और भी मुश्किल हो जाएगा।' उनका कहना है कि ये अदालतें तभी प्रभावी होंगी, जब वे तेजी से न्याय करेंगी। उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी कानूनी उपाय के साथ वित्तीय साक्षरता के कार्यक्रम भी चलाए जाने चाहिए।
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