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'आधार' बिन हो जाएंगे निराधार!

वीनू संधू /  August 22, 2018

दिल्ली के एक प्रतिष्ठित निजी स्कूल में दो बच्चों के माता-पिता अपने आधार कार्ड लाने के लिए भागदौड़ कर रहे थे। स्कूल प्रशासन ने उनसे कहा था कि आधार कार्ड के बगैर उनके बच्चे महीने भर में ही होने वाली सालाना बोर्ड परीक्षा में नहीं बैठ पाएंगे। उधर बेंगलूरु में एक इंजीनियर को आधार क्रमांक नहीं होने से भविष्य निधि से पैसे निकालने में परेशानी का सामना करना पड़ा। वहीं मुंबई के एक पिता ने अपने बेटे को आधार कार्ड की अनुपलब्धता के चलते प्रवेश देने से इनकार करने के बाद अदालत का दरवाजा खटखटाया है।

 
पहले से ही कई तरह की विविधताओं से भरे इस देश में 12 अंकों वाली विशिष्ट पहचान संख्या यानी आधार क्रमांक ने लोगों को एक तरह से बंधक बनाकर रख छोड़ा है। इसकी कानूनी वैधता पर फैसला होना अभी बाकी है। यह मामला उच्चतम न्यायालय के समक्ष लंबित है। इस मामले में दो तरह के अतिवादी विचार हैं लेकिन कुछ थोड़े लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने अभी तक अपनी पहचान संख्या ली ही नहीं है। दरअसल इस संख्या को हासिल करने के लिए व्यक्ति को अपना बायोमेट्रिक एवं जनसांख्यिकी आंकड़ा देना जरूरी होता है। इसी वजह से कुछ लोगों ने उच्चतम न्यायालय का अंतिम फैसला नहीं आने तक अपना आधार क्रमांक नहीं बनवाने का फैसला किया है। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अगुआई वाला संविधान पीठ आधार की वैधता पर कई महीनों से सुनवाई कर रहा है और आने वाले समय में इस पर फैसला आने की उम्मीद है।
 
इस बीच विशिष्ट पहचान संख्या (आधार) ने एक ऐसा स्वरूप धारण कर लिया है जिसके बारे में कुछ लोग ही आश्वस्त हैं। सबसे पहले वर्ष 2009 में इस पहचान संख्या की अवधारणा पेश की गई थी। लेकिन उस समय इसकी संकल्पना समाज के गरीब एवं जरूरतमंद शख्स तक सरकारी सुविधाओं का लाभ पहुंचाने वाले एक साधन के तौर पर की गई थी। आधार की वैधता को लेकर वर्ष 2013 में सुनाए गए अपने अंतरिम आदेश में उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि 'किसी भी शख्स को आधार नहीं होने की वजह से परेशान नहीं किया जाना चाहिए'। शीर्ष अदालत के इस आदेश के बावजूद सरकारी विभागों और एजेंसियों की तरफ से आधार क्रमांक को अनिवार्य किया जाता रहा है। बैंकों, बीमा, क्रेडिट कार्ड कंपनियां, स्कूली शिक्षा बोर्ड, विश्वविद्यालयों, मोबाइल सेवा प्रदाताओं और अस्पतालों तक में आधार क्रमांक मुहैया कराना जरूरी किया जा चुका है। भले ही शीर्ष प्रबंधन की तरफ से निर्देश न हो लेकिन निचले स्तर पर काम करने वाले कर्मचारी ग्राहकों और आवेदकों से आधार क्रमांक मांगते हैं।
 
आधार को लेकर बढ़ रहे इस संशय के बीच वे लोग फंस गए हैं जिन्होंने अंतिम फैसले के इंतजार में अभी तक अपना आधार क्रमांक नहीं बनवाया है या फिर यह संख्या होने पर भी वे किसी सेवा के बदले अपने और अपने बच्चों के बारे में संवेदनशील जानकारियां साझा करने को तैयार नहीं हैं। हालांकि कुछ ही लोग आधार को लेकर मचे हंगामे के शिकार होने से बच पाए हैं, अधिकतर लोग तो ऐसी स्थिति में धकेले जा चुके हैं जहां उनके पास कोई चारा ही नहीं रह गया है। दिल्ली में करीब दो दशकों से काम कर रहे सिबल श्रीधर ने जब नई कंपनी में नौकरी शुरू की तो आधार क्रमांक नहीं होने से तीन महीने तक उन्हें बिना वेतन के ही रहना पड़ा। असल में आधार नहीं होने से उनके भविष्य निधि (पीएफ) खाते से रकम हस्तांतरित नहीं हो पा रही थी। मार्च 2018 में ईपीएफओ की तरफ से जारी किए गए स्पष्टीकरण के बावजूद श्रीधर के साथ ऐसा हुआ। ईपीएफओ ने कहा था कि ऐसे कर्मचारियों को केवल एक लिखित वचन देना होता है कि उनके पास आधार क्रमांक नहीं है। कंपनी इस वक्तव्य को क्षेत्रीय भविष्य निधि आयुक्त के कार्यालय में आगे की कार्रवाई के लिए भेज देगी। श्रीधर के मामले में उनके नियोक्ता ने कहा कि आधाक क्रमांक के लिए अर्जी कर देना ही सबसे सही समाधान है। तीन महीने तक वेतन नहीं मिलने से परेशान हो चुके श्रीधर ने भी अब थक-हारकर आधार के लिए आवेदन कर दिया है।
 
इसी वजह से गुरुग्राम के अभिनीत मोहन को नौकरी बदलने के अपने फैसले को लेकर अब अफसोस होने लगा है। उन्हें पहले ही आधार क्रमांक नहीं होने के चलते कड़वे अनुभव का सामना करना पड़ चुका है। अभिनीत कहते हैं, 'मेरी पत्नी और मेरी दोनों की इच्छा थी कि पुरानी कार को बेचकर नई कार ली जाए। कार ऋण के लिए जब मैंने एक बैंक से संपर्क साधा तो उसने बाकी दस्तावेजों के साथ आधार कार्ड की प्रतिलिपि भी मांगी। जब मैंने यह बताया कि मेरे पास आधार क्रमांक नहीं है तो बैंक ने कार ऋण देने से ही मना कर दिया।' उसके बाद अभिनीत ने कुछ और बैंकों से भी संपर्क किया लेकिन हरेक जगह उन्हें निराश होना पड़ा। इससे परेशान होकर उन्होंने कार डीलर से अपनी बुकिंग रद्द करने को कहा तो डीलर ने बैंक से संपर्क साधते हुए कार ऋण जारी करने के लिए मनाया। इस पूरे प्रकरण से दुखी अभिनीत कहते हैं, 'मेरा क्रेडिट रेटिंग स्कोर 750 से अधिक है। मेरी पूरी आय और बचत बैंक में ही जमा होती है। मैं अपने बिलों का भुगतान समय पर और ऑनलाइन कर देता हूं। इसके बावजूद आधार के बगैर कार ऋण देने के लिए बैंक कार डीलर के कहने पर तैयार हुआ।'
 
आधार क्रमांक से वंचित नागरिकों की तरह अभिनीत की मुश्किलों का यहीं पर अंत नहीं हुआ। जब उनकी नई कार एक हादसे का शिकार हो गई तो बीमा कंपनी ने उनका क्लेम यह कहते हुए नकार दिया कि आधार के बगैर वह इसे पूरा नहीं कर सकती है। अभिनीत के मुताबिक बीमा कंपनी के कर्मचारी ने मुझसे कार की मरम्मत में करीब 60,000 रुपये लगने का अनुमान जताते हुए कहा कि आधार क्रमांक ले लेना ही समझदारी होगी। इस पर अभिनीत ने भी अपना रुख कड़ा करते हुए कहा कि बीमा कंपनी को दावा नकारने की वजह लिखित में देनी होगी अन्यथा वह अदालत की शरण लेंगे। खुद पर दबाव बढ़ता देख बीमा कंपनी भी झुक गई और उनके दावे का निपटान कर दिया। वह कहते हैं, 'मौजूदा हालात में इकलौता तरीका यही है कि आधार को थोपने की हरकतों का मुकाबला किया जाए।'
 
अपना नाम सामने न आने की शर्त पर एक बीमा कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं कि 1 लाख रुपये से अधिक राशि वाले बीमा प्रीमियम या दावे के लिए दावाकर्ता को धनशोधन-रोधी दस्तावेज देने पड़ते हैं जिनमें निवास प्रमाणपत्र भी शामिल है। आधार कार्ड निवास प्रमाण के तौर पर दिए जा सकने वाले कई दस्तावेजों में से एक है। वह कहते हैं, 'सवाल है कि आप अपना आधार क्रमांक क्यों नहीं ले लेते हैं? मेरे हिसाब से आधार कार्ड बनवाने से हिचकने वाले लोग अंडमान एवं निकोबार में छिपकर रहने वाले आदिवासी समूहों की तरह हैं। वे आगे आकर आधुनिक दुनिया को गले लगाना नहीं चाहते हैं।'
 
ऐसी ही सोच के चलते आधार को बढ़ावा मिल रहा है। एक वरिष्ठ बैंक अधिकारी इससे सहमति जताते हुए कहते हैं, 'जूनियर स्तर पर काम करने वाले कर्मचारियों की नासमझी भी समस्या पैदा कर रही है।' इस बैंक अधिकारी को खुद भी आधार को लेकर मची हायतौबा का शिकार होना पड़ा है। सालाना स्वास्थ्य परीक्षण के दौरान डायग्नोस्टिक सेंटर के कैश काउंटर पर बैठी महिला कर्मचारी ने उनसे आधार क्रमांक मांगा था। वह बताते हैं, 'उस महिला ने मुझे बताया कि उसके वरिष्ठों ने आधार क्रमांक मांगने के लिए कहा है।'
 
अपने करीबी लोगों को स्वास्थ्य सेवा मुहैया कराना या बच्चों की शिक्षा ऐसे भावनात्मक मसले हैं जिनमें आधार को अनिवार्य किया जा रहा है। केंद्र एवं राज्यों के तमाम शिक्षा बोर्ड संबद्ध स्कूलों को लगातार यह निर्देश दे रहे हैं कि सभी बच्चों के आधार क्रमांक इक_ïा किए जाएं। नोएडा में रहने वाली एक महिला को स्कूल की तरफ से नोटिस मिला था कि तीसरी कक्षा में पढऩे वाली उनकी बेटी का आधार क्रमांक मुहैया कराया जाए। फिर उन्होंने इस सिलसिले में क्लास टीचर से बात कर यह जानने की कोशिश की कि आधार क्रमांक नहीं दे पाने की सूरत में उनकी बेटी को चौथी क्लास में प्रवेश मिलने में दिक्कत होने की बात किसने बताई है? एक अन्य महिला बताती हैं कि चौथी और सातवीं क्लास में पढऩे वाली उनकी दो बेटियों को आधार नहीं बनवाने के चलते भरी क्लास में अपमानित किया जा चुका है। परेशान होकर उन्होंने अपनी बेटियों के लिए आधार कार्ड बनवाने की अर्जी लगा दी है।
 
स्कूली शिक्षा बोर्ड आईसीएसई परिषद के मुख्य कार्यकारी एवं सचिव गेरी अराथून की तरफ से संबद्ध स्कूलों के प्रधानाचार्यों को भेजे गए एक परिपत्र में कहा गया है कि 9वीं और 11वीं कक्षा के छात्रों को 31 जुलाई 2018 तक आधार कार्ड की जानकारी देनी होगी। अगर वे ऐसा करने में नाकाम रहते हैं तो उनके नाम खुद-ब-खुद कट जाएंगे और स्कूल 2019 में होने वाली परीक्षा के लिए उनकी उम्मीदवारी सुनिश्चित नहीं कर पाएंगे और उनके प्रवेश पत्र भी जारी नहीं किए जाएंगे। अराथून इस तरह का परिपत्र भेजे जाने की पुष्टि करते हुए कहते हैं, 'अब आधार हरेक के लिए अनिवार्य हो चुका है।'
 
इसी तरह केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) ने भी संबद्ध स्कूलों में पढऩे वाले छात्रों को आधार क्रमांक देने पर ही 10वीं और 12वीं कक्षा की सालाना परीक्षाओं में बैठने की इजाजत दी जाएगी। स्कूल में प्रवेश, पेंशन लेने, आयकर रिटर्न जमा करने और सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के तहत लाभ लेने के लिए भी आधार क्रमांक को अनिवार्य किए जाने का मामला अदालत पर छोड़ा जा रहा है। सरकारी एवं निजी एजेंसियों की समझ और संवेदनशीलता भी ऐसे मामलों में दिशा निर्देश कर रही है। 
 
नेताओं, पत्रकारों और आम नागरिकों के साझा मंच नेक्स्टइलेक्शन के सह-संस्थापक अमित बंसल अपना आयकर रिटर्न जमा करने के लिए सीबीडीटी के अगले कदम का इंतजार कर रहे हैं। दिल्ली उच्च न्यायालय ने सीबीडीटी को निर्देश दिया है कि आधार क्रमांक नहीं रखने वाले लोगों को भी ऑनलाइन रिटर्न जमा करने की सुविधा दी जाए। आधार मामले की वकील तृप्ति पोद्दार के मुताबिक अदालत ने कहा है कि ऑनलाइन रिटर्न जमा करने वाले लोगों को बाहर निकलने का विकल्प दिया जाना चाहिए। लेकिन अभी तक यह सुविधा सीबीडीटी की वेबसाइट पर नहीं मुहैया कराई गई है। बंसल को उम्मीद है कि रिटर्न जमा करने की आखिरी तारीख 31 अगस्त के पहले ऐसा हो जाएगा। तृप्ति कहती हैं कि अगर ऐसा नहीं होता है तो दोबारा अदालत की शरण में जाएंगे। 
 
श्रीधर की ही तरह बंसल को भी पीएफ को लेकर समस्या का सामना करना पड़ा। भारतीय प्रबंध संस्थान (आईआईएम) बेंगलूरु के पुराने छात्र बंसल अपनी कंपनी शुरू करते समय अपने पीएफ खाते से कुछ रकम निकालना चाहते थे लेकिन आधार क्रमांक के बगैर वह ऐसा कर पाने में नाकाम रहे। बंसल अपनी कंपनी का पंजीयन कराने के साथ ही निदेशक पहचान क्रमांक (डीआईएन) के लिए भी आवेदन करना चाहते हैं।  डीआईएन किसी भी पंजीकृत कंपनी के मौजूदा या संभावित निदेशक को दी जाने वाली विशिष्ट संख्या होती है। डीआईएन के लिए ग्राहक की पहचान की पुष्टि करनी जरूरी होती है। बंसल को 31 अगस्त तक आवेदन करना होगा। हालांकि इसके फॉर्म में आधार क्रमांक को वैकल्पिक दस्तावेज के तौर पर दिखाया गया है लेकिन अनुभव बताता है कि आधार क्रमांक जोड़े बगैर फॉर्म अपलोड ही नहीं होगा।
 
दिल्ली स्थित सिद्धांतराव हेमंत के पास 17 वर्षों तक डीआईएन रहा है और इस दौरान वह कई कंपनियों के निदेशक भी रहे हैं। सिद्धांतराव अभी तक आधार क्रमांक लेने से परहेज करते रहे हैं लेकिन अब ऐसा कर पाना संभव नहीं रह गया है। वह कहते हैं, 'पूरा सिस्टम ही फंदे की शक्ल ले चुका है। अब अगर मेरा डीआईएन डिफॉल्ट होता है तो जिन कंपनियों का मैं निदेशक हूं वे सभी मुश्किलों में घिर जाएंगी। ऐसे में मेरे जैसे व्यक्ति के लिए सही नहीं होगा कि मैं आधार के प्रति अपनी हिचक बनाए रखूं।' इसी के साथ थोड़ी दबी आवाज में वह यह भी बताते हैं कि अब आधार क्रमांक लेने के सिवाय उनके पास कोई चारा नहीं रह गया है। वह कहते हैं, 'मुझे काफी बुरा लग रहा है क्योंकि इसकी भारी भावनात्मक कीमत चुकानी पड़ी है।'
 
इस तरह की आप-बीती कहानियों की फेहरिस्त काफी लंबी है। लंदन की यात्रा पर गए एक शख्स ने जब वहां पर अपना फॉरेक्स कार्ड का इस्तेमाल करना चाहा तो वह काम ही नहीं कर रहा था। अपने बैंक से संपर्क करने पर उन्हें पता चला कि आधार क्रमांक जमा नहीं होने से ऐसा हो रहा है। इसी तरह एक व्यक्ति आधार नहीं होने से अपने प्री-पेड कनेक्शन को पोस्ट-पेड में तब्दील नहीं करा पाया।  आधार क्रमांक को हरेक तरह के कार्यों के लिए अनिवार्य किए जाने की बढ़ती प्रवृत्ति के बारे में जब भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) से बिज़नेस स्टैंडर्ड ने संपर्क साधा तो उसकी तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। 
Keyword: aadhar. data, virtual ID, आधार क्रमांक,
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