बिजनेस स?टैंडर?ड - आम आदमी के इर्द-गिर्द बुनी जा रही विज्ञापनों की कहानी
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आम आदमी के इर्द-गिर्द बुनी जा रही विज्ञापनों की कहानी

अमृता पिल्लई /  August 22, 2018

दर्शक चैनल बदले या वेबसाइट पर टैब बंद करे, इससे पहले अपनी बात कहने के लिए विज्ञापन के पास चंद सेकंड ही होते हैं। ऐसे में उनके सामने अपनी बात इस तरह कहने की चुनौती होती है, जिससे दर्शकों की नजर स्क्रीन पर ही चिपक जाए। कई ब्रांडों ने इसके लिए एक तरीका तलाशा है। वे आम आदमी को हीरो की तरह पेश कर रहे हैं। यह आम आदमी उनका ग्राहक हो सकता है, कर्मचारी हो सकता है या खरीदार को वही ब्रांड खरीदने के लिए प्रेरित करने वाला मामूली बिचौलिया हो सकता है। ऐसे विज्ञापनों की तादाद बढ़ती जा रही है, जिनमें उत्पाद केंद्र में नहीं रह गए हैं।

 
मिसाल के तौर पर वाहन बनाने वाली नामी कंपनी हुंडई अपने ताजा विज्ञापन में अपनी कार, उसके ताकतवर इंजन, दूसरी खूबियों या चलाने में आसानी की बात ही नहीं करती। उसके बजाय उस विज्ञापन में सेना के एक मेजर की उस अजनबी से मुलाकात की बात बताई गई है, जो मुसीबत के वक्त उनकी मदद करने की पुरजोर कोशिश करता है। इसमें उस अजनबी को हीरो की तरह दिखाया गया है और हुंडई की कार कुछ पलों के लिए ही दिखती है। आजकल के माहौल में जवानों और सेना की कहानियां चलन में हैं, लेकिन इस विज्ञापन का हीरो सेना का मेजर या कार नहीं बल्कि हुंडई के दो दशक पुराने सैंट्रो मॉडल को चला रहा आदमी है।  
 
हाइपरकलेक्टिव डॉट कॉम के संस्थापक के वी श्रीधर ने कहा, 'आज प्रचार का तरीका इतना बदल गया है कि 'मुझे खरीदो, मुझे खरीदो' का संदेश कारगर साबित नहीं होता। ब्रांडों को ऐसी वजह और ऐसे संदेशों की जरूरत होती है, जिनसे सही भावनाएं उभरकर बाहर आएं। आदमी या तो अपनी पीठ थपथपाए या उपभोक्ता की पीठ ठोके। असल में उपभोक्ता की पीठ थपथपाना ही बेहतर होता है। पूरा जोर उपभोक्ता से जुडऩे पर ही है।' हुंडई के मामले में साफ तौर पर यह ग्राहक ही है, जिसकी सही पसंद के लिए प्रशंसा की जा रही है। हुंडई अपने उत्पादों के बारे में बताने के लिए उपभोक्ताओं को जरिया बना रही है, लेकिन स्वास्थ्य जांच की सेवा प्रदान करने वाली कंपनी मेट्रोपोलिस हेल्थकेयर के विज्ञापनों में उसके तकनीशियन और ऑनलाइन फूड डिलिवरी कंपनी स्विगी के विज्ञापनों में डिलिवरी बॉय नायक बने दिखते हैं। ब्रांड इनके जरिये अपने मूल्यों का बखान करते हैं, लेकिन अहम बात यह है कि विज्ञापन दर्शकों से भावनात्मक प्रतिक्रिया हासिल करने की कोशिश भी करते हैं।
 
नील्सन जर्नल ऑफ मेजरमेंट में उपभोक्ता मनोविज्ञान पर किए गए एक अध्ययन (फ्रॉम थ्योरी टू कॉमन प्रैक्ट्सि : कंज्यूमर न्यूरोसाइंस गोज मेनस्ट्रीम, 2016) में कहा गया है, 'पहले यह माना जाता था कि विज्ञापन वह होता है, जिसमें बताया जाता है कि किसी उत्पाद या सेवा से किस तरह का फायदा होता है। उपभोक्ता यह देखता था कि ये फायदे उसकी जरूरतों और इच्छाओं पर कितने खरे उतरते हैं। लेकिन अब साफ तौर पर ऐसा नहीं है। हाल के अनुसंधान से यह साफ हो गया है कि प्रभावी विज्ञापन ग्राहकों से भावुक प्रतिक्रिया हासिल करने में कामयाब रहते हैं।' 
 
मोगी मीडिया के संस्थापक संदीप गोयल का कहना है कि हाल के विज्ञापन अपने उद्देश्य में सफल हैं। इसकी वजह केवल यह नहीं है कि वे सही भावनाओं को जगाते हैं, बल्कि वे इन पात्रों के जरिये उत्पाद या सेवा का महत्त्व बताते हैं। उन्होंने कहा, 'यूजर को हीरो बनाना मार्केटिंग की व्यावहारिक रणनीति है। इससे ग्राहक में वह भरोसा पैदा होता है, जिसे परंपरागत मार्केटिंग में 'मैं अपनी सोच से भी ज्यादा सही निकला' कहा जाता है। इसका मतलब है कि मैंने इस उत्पाद के उपयोग का अच्छा फैसला लिया।' यह कुछ हद तक इन संगठनों के कर्मचारियों को जुड़ाव और बेहतरी का अहसास दिलाता है। ग्राहकों के साथ ब्रांड के संवाद में डिलिवरी बॉयज या मैकेनिक (जैसा कि लूब्रिकेंट विनिर्माता कैस्ट्रोल ने किया है) को सम्मान देकर ब्रांड अपने खुद के कर्मचारियों से भी संवाद करते हैं। 
 
इसके अलावा लूब्रिकेंट कारोबार में भरोसेमंद मैकेनिक की बात उपभोक्ता की रुचि को खरीद में बदलने में मददगार साबित होती है। कैस्ट्रोल सुपर मैकेनिक कंटेस्ट में मैकेनिकों से उनके कौशल के बारे में पहले फोन पर बातचीत के चरण और फिर सैद्धांतिक एवं प्रायोगिक चरण के जरिये सवाल पूछे जाते हैं। इस कंटेस्ट का यह दूसरा साल है। इसके बाद विजेताओं को स्थानीय समाचार-पत्रों में विज्ञापनों और बाहरी होर्डिंगों के जरिये दिखाया जाता है। कैस्ट्रोल के एक प्रवक्ता ने एक ई-मेल के जवाब में कहा, 'यह उन्हें अपने समुदाय का हीरो बनाता है, जिससे और मैकेनिकों को इस पेशे से जुडऩे के लिए प्रोत्साहन मिलता है। एक बाजार अगुआ के रूप में हम मैकेनिकों का कौशल संवर्धन कर रहे हैं। हमने कई पहल शुरू की हैं, जिसमें हम मैकेनिकों से बदलते इंजनों, लूब्रिकेंट की भूमिका और ग्राहक सेवा के बारे में पूछते हैं।'
 
मेट्रोपोलिस हेल्थकेयर अपने फीवरफाइटर कैंपेन में घर पर जांच और समय पर स्वास्थ्य रिपोर्ट देने वाले कर्मचारियों को हीरो के रूप में पेश करती है। मेट्रोपोलिस हेल्थकेयर में मुख्य विपणन अधिकारी पीयूष कुमार ने कहा, 'हमारा वादा नमूना लेने के छह घंटों के भीतर सही रिपोर्ट देना है। इसके अलावा हमने अपने मरीजों के फायदे के लिए चौबीस घंटे नमूने लेने की सुविधा शुरू की है। यह हमारे फीवर फाइटर्स, पैथोलॉजिस्ट, तकनीशियन, फ्लेबॉटोमिस्ट और ग्राहक सेवा टीम का समर्पण, समवेदना और कुशलता ही है, जिसकी बदौलत हम अपना वादा पूरा कर पाते हैं।'
 
गोयल का कहना है कि आम लोगों के इर्द-गिर्द प्रचार अभियान चलाने से ब्रांड की कहानियां ज्यादा विश्वनीय और लुभावनी लगती हैं। उन्होंने कहा, 'उनसे उपभोक्ताओं की सहानुभूति हासिल करने में मदद मिलती है। इसी वजह से ज्यादा एफएमसीजी ब्रांड सेलिब्रिटीज से विज्ञापन के बजाय हकीकत से संबंध रखने वाले विज्ञापनों पर ज्यादा भरोसा कर रहे हैं।' इससे परंपरागत एकतरफा संवाद प्रक्रिया से आगे बढऩे में मदद मिलती है, जिसे बीते वर्षों में ब्रांड इस्तेमाल करते आए हैं।  समानुभूति लायक कहानियां बनाकर ब्रांड भावनाओं, मूल्यों और अन्य बातों के ऑनलाइन संवाद के दरवाजे खोल रहे हैं। मिसाल के तौर पर स्विगी का विज्ञापन ही देख लीजिए। उसमें फूड डिलिवरी बॉय उस व्यक्ति को अजीब भावों के साथ देख रहा है, जो उसके हाथ से डिब्बा लेकर अपनी पत्नी की नजर बचाते हुए गुलाब जामुन गटक लेता है। इस विज्ञापन पर बहुत से ऑनलाइन ब्लॉग और लेख लिखे गए हैं। श्रीधर बताते हैं कि कैसे ब्रांडों को सभी दौर में विज्ञापन की कारोबारी जैसी भाषा से बाहर आने के लिए जूझना पड़ा है। इसका जवाब ब्रांडों की जगह आम आदमी को सामने लाना हो सकता है। 
Keyword: Advertising, Hyundai, Castrol, Metropolis Healthcare,
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