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नरसिंह राव का परित्याग कहीं कांग्रेस की गलती तो नहीं!

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  August 21, 2018

नरेंद्र मोदी सरकार और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने अटल बिहारी वाजपेयी के अंतिम संस्कार का जिस व्यापक एवं वृहद स्तर पर आयोजन किया उसने दूसरे पूर्व प्रधानमंत्रियों के निधन पर किए गए इंतजामों की तरफ ध्यान आकृष्ट किया है। गत 16 अगस्त को निधन के बाद वाजपेयी का पूर्ण राजकीय सम्मान के साथ नर्ई दिल्ली में अंतिम संस्कार किया गया। इससे पहले दिवंगत हुए तमाम पूर्व प्रधानमंत्रियों को इस तरह का सम्मान नहीं मिला था। केवल तीन प्रधानमंत्री ही ऐसे रहे हैं जिनका पद पर रहते हुए निधन हुआ। वर्ष 1964 में जवाहरलाल नेहरू, 1966 में लाल बहादुर शास्त्री और 1984 में इंदिरा गांधी का निधन प्रधानमंत्री रहते समय ही हुआ था। उन सभी का अंतिम संस्कार पूरे राजकीय सम्मान के साथ हुआ था और उनकी याद में नई दिल्ली में स्मारक भी बने हैं।

 
वहीं स्वतंत्र भारत में शासन के शीर्ष पद पर रह चुके नौ लोगों का निधन प्रधानमंत्री पद से हटने के बाद हुआ है। वर्ष 1987 में चरण सिंह, 1991 में राजीव गांधी, 1995 में मोरारजी देसाई, 1998 में गुलजारीलाल नंदा, 2004 में पी वी नरसिंह राव, 2007 में चंद्रशेखर, 2008 में विश्वनाथ प्रताप सिंह, 2012 में इंद्र कुमार गुजराल और अब 2018 में अटल बिहारी वाजपेयी का निधन हुआ है। इनमें से तीन लोगों को छोड़कर बाकी सभी पूर्व प्रधानमंत्रियों का कार्यकाल अपेक्षाकृत सीमित रहा। देसाई दो वर्ष से थोड़ा अधिक समय तक प्रधानमंत्री रहे जबकि चरण सिंह, वी पी सिंह, चंद्रशेखर और गुजराल एक साल से भी कम समय तक इस पद पर रहे थे। वहीं दो बार कार्यवाहक प्रधानमंत्री रहे नंदा दोनों बार दो हफ्ते के लिए ही इस पद पर रहे।
 
राजीव, राव और वाजपेयी ही ऐसे पूर्व प्रधानमंत्री थे जिन्होंने पांच साल का कार्यकाल पूरा किया था। वाजपेयी के अंतिम संस्कार के इंतजामों को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में राजीव और राव के निधन के समय सत्ता में रही सरकार द्वारा किए गए इंतजामों से तुलना किए जाने की जरूरत है। राजीव की आतंकवादियों ने आम चुनाव के बीच में हत्या कर दी थी और उस समय देश राजनीतिक अनिश्चितता और अभूतपूर्व आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहा था। उनकी अंत्येष्टि का इंतजाम चंद्रशेखर की अगुआई वाली तत्कालीन कार्यवाहक सरकार ने किया था। लेकिन राजीव के अंतिम संस्कार से संबंधित इंतजाम किसी भी मायने में पदस्थ प्रधानमंत्री के निधन पर होने वाले इंतजाम से कम नहीं थे। नरसिंह राव का निधन दिसंबर 2004 में हुआ था। उस समय केंद्र में कांग्रेस की ही अगुआई वाली सरकार थी। राव पूरे पांच वर्षों तक उस समय प्रधानमंत्री रहे थे जब भारत की अर्थव्यवस्था अपने सबसे बुरे संकट से गुजर रही थी। अपने वित्त मंत्री मनमोहन सिंह की मदद से राव ने भारतीय अर्थव्यवस्था को संकट से उबारने के लिए साहसिक सुधार किए। हालांकि विवादित बाबरी मस्जिद के विध्वंस के दौरान निर्णायक कदम नहीं उठाने को लेकर राव विवादों के घेरे में आ गए लेकिन उनकी आर्थिक नीतियों और अमेरिका के करीब आने के रणनीतिक कदम ने भारत की अर्थव्यवस्था और भू-राजनीति को नई दिशा देने का काम किया। 
 
पांच वर्षों तक प्रधानमंत्री रहे नरसिंह राव का योगदान कई मायनों में वाजपेयी से कमतर नहीं था। इसके बाद भी राव के परिजनों की इच्छा होने पर भी उनका अंतिम संस्कार दिल्ली में नहीं कराया गया। उनके पार्थिव शरीर को हैदराबाद ले जाया गया और हुसैन सागर झील के किनारे उनका अंतिम संस्कार किया गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने राव के परिजनों से यह वादा किया था कि उनकी याद में एक स्मारक नई दिल्ली में बनवाया जाएगा लेकिन वह वादा अभी तक पूरा नहीं किया गया है। 
 
राव के पार्थिव शरीर को लेकर जाने वाले वाहन को दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय के भीतर घुसने तक नहीं दिया गया था। उसके बाद शव को हैदराबाद ले जाया गया था। ऐसा तब हुआ जब राव पूर्व प्रधानमंत्री होने के साथ कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष भी थे। लेकिन कांग्रेस की तत्कालीन अध्यक्ष सोनिया गांधी ने राव को नजरअंदाज किया और एक प्रधानमंत्री के तौर पर किए गए नीतिगत बदलावों के लिए उन्हें श्रेय देने से भी मना कर दिया। यहां तक कि कांग्रेस राव सरकार के समय किए गए आर्थिक सुधारों की कामयाबी का श्रेय लेने में भी नाकाम साबित हुई। राव के साथ अपने मतभेद नहीं भुला पाने की वजह से कांग्रेस देश को आर्थिक संकट के भंवर से निकाल पाने में अपनी कामयाबी का श्रेय लेने से भी हिचकती रही।
 
इसके ठीक उलट प्रधानमंत्री मोदी ने वाजपेयी के निधन के बाद उनको यथोचित सम्मान देकर उनकी पूरी विरासत को अपना लिया है। अतीत में वाजपेयी के साथ रहे गहरे मतभेदों के बावजूद मोदी ने ऐसा किया है। सर्वविदित है कि 2002 में गुजरात दंगों से निपटने के मोदी के तौर-तरीकों को लेकर वाजपेयी का गहरा मतभेद था। यहां तक कहा जाता है कि वाजपेयी मोदी को गुजरात के मुख्यमंत्री पद से हटाना भी चाहते थे। मोदी की नेतृत्व शैली भी वाजपेयी की शैली से जुदा है। फिर भी वाजपेयी के अंतिम संस्कार कार्यक्रम का विधिवत आयोजन कर और उसका सार्वजनिक रूप से दावा कर मोदी ने न केवल प्रधानमंत्री के तौर पर वाजपेयी की महती भूमिका को मान्यता दी है बल्कि उन्होंने वाजपेयी की विरासत पर भी अपना दावा कर दिया है। वाजपेयी के साथ उनके मतभेद भी उनकी राह में नहीं आए क्योंकि उन्हें शायद पता है कि वाजपेयी की विरासत को अपनाना उनके और उनके दल के लिए एक राजनीतिक पूंजी होगी।
 
सवाल उठता है कि क्या कांग्रेस नेतृत्व को भी 2004 में कुछ इसी तरह सोचना चाहिए था और नरसिंह राव के साथ मतभेदों को तिलांजलि देकर नई दिल्ली में उनका राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार कराया होता और आर्थिक सुधारों पर राव की विरासत को अपना बनाने का दावा कर दिया होता?
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