बिजनेस स्टैंडर्ड - अर्थव्यवस्था की हालत और विवेक का प्रयोग
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अर्थव्यवस्था की हालत और विवेक का प्रयोग

नितिन देसाई /  August 21, 2018

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने राजकोषीय और वित्तीय समझदारी की बात कही है। बहरहाल भारत में वृद्धि को गति प्रदान करने के लिए इस समझदारी को लेकर विवेक इस्तेमाल करना होगा। बता रहे हैं नितिन देसाई 

 
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने हाल ही में भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर जो रिपोर्ट जारी की है वह चरणबद्ध ढंग से वृद्धि का अनुमान जताती है लेकिन उसमें कुछ जोखिम का जिक्र भी है। रिपोर्ट में सतर्कतापूर्वक नोटबंदी और वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के हड़बड़ी भरे क्रियान्वयन की बात कही गई है। परंतु वृद्धि दर पर प्रभाव को लेकर यह काफी स्पष्ट है। चिकित्सा की भाषा में भारतीय अर्थव्यवस्था कुछ हालिया झटकों से उबर रही है लेकिन अभी भी बीमारी की वापसी की आशंका है। जीएसटी को अधिक बेहतर ढंग से लागू किया जा सकता था और कर ढांचा अधिक सहज बनाया जा सकता था। फिर भी देश के लिए एकल कर ढांचा और जीएसटी के प्रबंधन के लिए सहकारी संघीय ढांचा भी कम बड़ी उपलब्धि नहीं है। अगर आगे इन्हें सामान्य और तार्किक बनाया जाता है तो इसके दूरगामी लाभ होंगे। भलीभांति क्रियान्वयन होता तो इसकी कम कीमत चुकानी पड़ती। परंतु इसका दूरगामी लाभ होना तय है। नोटबंदी के मामले में यह नहीं कहा जा सकता कि भुगतान का डिजिटलीकरण और कर अनुपालन इसके वांछित लाभ हैं। नोटबंदी की अवधारणा और क्रियान्वयन दोनों गलत थे। उसने अर्थव्यवस्था को गहरा झटका दिया।
 
बहरहाल आखिरकार सुधार की प्रक्रिया की शुरुआत हो गई। सकल मूल्यवर्धन की जिस दर में नोटबंदी के बाद गिरावट आई थी, वह दोबार गति पकडऩे लगी है। सकल जमा पूंजी निर्माण ने भी गति पकड़ी है लेकिन निवेश की दर वर्ष 2011-12 में हासिल 35 प्रतिशत के स्तर से नीचे है। निजी क्षेत्र में बड़ी परियोजनाएं भी शुरू होती नहीं दिख रहीं। बिजली क्षेत्र भी गंभीर संकट में है। कई निजी और सरकारी कंपनियों की हालत खस्ता है। समाचार पत्रों में आई रिपोर्ट के अनुसार सूक्ष्म, लघु और मझोले उद्यम (एमएसएमई) क्षेत्र अभी तक नोटबंदी और जीएसटी के दोहरे झटके से नहीं उबर सका है। दो अंकों में वृद्धि की बात करें तो हमें इसके लिए निवेश दर को 40 फीसदी से ऊपर ले जाना होगा। फिलहाल यह मुश्किल नजर आ रहा है।
 
मुदास्फीति के रुझान में तब्दीली और चालू खाते का बढ़ता घाटा चिंता का विषय बना हुआ है। आंकड़े बताते हैं कि उपभोक्ता मूल्य महंगाई इस वर्ष की पहली तिमाही तक तो तेजी से गिरी लेकिन इसके बाद उसमें इजाफा होना शुरू हो गया। खाद्य और ईंधन महंगाई इसमें  शामिल नहीं हैं। ये दोनों आपूर्ति क्षेत्र से संबंधित हैं। तथाकथित मूल मुद्रास्फीति में तेजी आई और वह वित्त वर्ष की पहली तिमाही में 6 फीसदी का स्तर पार कर गई। चूंकि यह मांग से प्रेरित होती है इसलिए रिजर्व बैंक ने हाल ही में रीपो दर में इजाफा कर दिया। इससे मध्यम अवधि में सुधार की प्रक्रिया धीमी हो सकती है, हालांकि पहली तिमाही के आंकड़े अगस्त के अंत तक आ जाएंगे और कम आधार प्रभाव के कारण उनमें बेहतर वृद्धि नजर आ सकती है।
 
चालू खाते के घाटे में बढ़ोतरी चिंता का विषय है। विदेशी पूंजी की सामान्य आवक और धनप्रेषण से करीब 50 अरब डॉलर के चालू खाते के घाटे की भरपाई हो सकती है। वर्ष 2017-18 का घाटा करीब-करीब इतना ही रहा। परंतु आशंका है कि इस वर्ष घाटा बहुत ज्यादा हो सकता है क्योंकि निर्यात वृद्धि कमजोर रही, अमेरिका-चीन व्यापारिक विवाद ने विश्व व्यापार को प्रभावित किया, मुद्रा युद्ध की आशंका बनी हुई है और कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी हुई है। आयात शुल्क में इजाफा जैसे कदम उत्पादकता को प्रभावित कर सकते हैं।
 
महज सुधार वापसी से तेज वृद्धि तक की दूरी तय करने के लिए हमें समय पर और दूरदर्शी उपाय अपनाने होंगे। आईएमएफ की रिपोर्ट में मजबूत राजकोषीय और मौद्रिक विवेक दिखाने की अपेक्षा जताई गई है। परंतु वृद्धि दर को गतिशील बनाने के लिए हमें विवेक को लेकर समझदारी दिखानी होगी। आईएमएफ का सुझाव है कि सकल घरेलू उत्पाद के अनुपात में सार्वजनिक व्यय में कटौती की जाए। परंतु देश का शहरीकरण और औद्योगीकरण बुनियादी खर्च में इजाफे की मांग कर रहा है।  बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा की मांग को पूरा करने के लिए भी सार्वजनिक व्यय की हिस्सेदारी में इजाफा करना होगा। जाहिर है हमें इन जरूरतों को पहचानते हुए जीडीपी में सार्वजनिक व्यय की हिस्सेदारी बढ़ानी होगी। यही समझदारी होगी। राजकोषीय सुदृढ़ीकरण की बात करें तो उसे हासिल करने के लिए कर अनुपालन और उसका दायरा बढ़ाना होगा। कर व्यवस्था के डिजिटलीकरण और संपत्ति कर तथा उपभोक्ता शुल्क आदि के रूप में अब तक अनदेखे क्षेत्र की ओर ध्यान देकर ऐसा किया जा सकता है। 
 
घाटे को सीमित करने के मामले में राजकोषीय विवेक की सकारात्मक भूमिका हो सकती है। मौजूदा दौर में सरकार 70 फीसदी बैंकिंग और बीमा परिसंपत्तियों पर अपना नियंत्रण गंवा नहीं सकती। बैंकों के सांविधिक तरलता अनुपात और निवेश की दिशा तय करने के मामले में उसे इन संसाधनों की आवश्यकता होती है। बीमा धारकों या जमाकर्ताओं की तुलना में यह उनकी अधिक मददगार साबित होती है। मोटेतौर पर ये वही काम कर रहे हैं जो राष्टï्रीयकरण के जरिये ठीक किया जाना था। यानी जमाकर्ताओं या पॉलिसीधारकों का प्रतिफल बढ़ाने के बजाय संसाधन मालिकों द्वारा उनका अपनी जरूरत पर इस्तेमाल। आईएमएफ की रिपोर्ट इसे समझ रही है लेकिन वह कुछ खास कहने की स्थिति में नहीं है। 
 
सरकारी क्षेत्र के वित्तीय संस्थानों का राष्टï्रीयकरण समाप्त करना समस्या का हल नहीं है। हमारे पास ऐसा निजी क्षेत्र नहीं है जो स्वतंत्र ढंग से वित्तीय संस्थानों को चला सके। कॉर्पोरेट हित का मामला बीच में आएगा। कुछ सफल निजी बैंक इसलिए स्वतंत्र हैं क्योंकि उनका स्वामित्व विदेशी संस्थागत निवेशकों के पास है। सरकारी बैंकों और बीमा कंपनियों को प्रत्यक्ष सरकारी नियंत्रण से दूर करने से बेहतर पूंजी बाजार अवश्य बनेगा। इससे भविष्य में फंसे हुए कर्ज का जोखिम कम हो सकता है। ऋण बाजार मजबूत हो सकता है और बड़े संस्थागत घरेलू निवेशकों मसलन एलआईसी आदि का राजनीतिकरण कम हो सकता है। इससे मध्यम अवधि में वृद्घि को गति देने में मदद मिलेगी और ढांचागत बदलाव स्वीकार्य होंगे तथा उनको लागू करना आसान होगा। अगर हम मौद्रिक नीति को राजनीतिक नियंत्रण से मुक्त कर सकते हैं तो हम सरकारी क्षेत्र की वित्तीय संस्थानों के साथ भी ऐसा अवश्य कर सकते हैं। 
Keyword: economy, IMF, fund, india,,
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