बिजनेस स्टैंडर्ड - वाकई, एक अच्छे इंसान थे पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Thursday, September 20, 2018 08:31 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

वाकई, एक अच्छे इंसान थे पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी

सम सामयिक
टीसीए श्रीनिवास-राघवन /  August 20, 2018

प्रधानमंत्री पद पर आसीन व्यक्ति जब 'भूतपूर्व' हो जाते हैं तो वे हमेशा विलक्षण दिखने लगते हैं। यहां तक कि भारत को कई तरह से नुकसान पहुंचाने वालीं इंदिरा गांधी को भी उनके उत्पीडऩ के शिकार लोगों ने ही एक प्रतिमान बताया था। गत गुरुवार को दिवंगत हुए अटल बिहारी वाजपेयी भी इस सामान्य नियम के अपवाद नहीं हैं। लेकिन दूसरे प्रधानमंत्रियों के उलट वाजपेयी वास्तव में एक अच्छे इंसान थे। उनका साथ आपको सुरक्षा का अहसास दिलाता था। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वर्तमान नेतृत्व के उलट वह एक नरम इंसान थे और मौजूदा सत्तासीनों की तुलना में उनकी भारत के बारे में समझ काफी बेहतर थी। उन्होंने कभी भी हिंदुओं की इस तरह बात नहीं की कि मानो वही सताए जा रहे अल्पसंख्यक हों और असली अल्पसंख्यकों को प्रताडि़त करने से ही उनके मनोरथ को पूरा किया जाना है। उनके लिए राजधर्म का मतलब कुछ अलग ही था।

 
न तो वह अपने सियासी दोस्त पी वी नरसिंह राव की तरह चालाक या दोषदर्शी थे और न उनकी तरह उनमें साहस की कमी थी। उनके प्रधानमंत्री रहते समय सांसदों को खरीदने की कोशिश भी नहीं हुई। जब उन्हें जरूरी लगा तो उन्होंने पोकरण-2 परीक्षण कर दिया। जबकि नरसिंह राव को परीक्षण की तैयारी को लेकर अमेरिकी दबाव का सामना करना पड़ा था। हमें यह नहीं पता है कि बाबरी मस्जिद विध्वंस की घटना अगर वाजपेयी के प्रधानमंत्री रहते समय हुई रहती तो उन्होंने क्या कदम उठाए होते? लेकिन संकट आने पर वह जिस शिद्दत से उसका सामना करते थे, उसे देखकर यही लगता है कि उन्होंने अपनी तरफ से पूरा जोर लगाया होता। संभवत: वह विध्वंस रोक पाने में नाकाम हो जाते लेकिन उसे रोकने की कोशिश जरूर करते। 
 
राजीव गांधी की तरह वह प्रधानमंत्री बनते समय राजनीति में कोई नए खिलाड़ी नहीं थे। लिहाजा जब उन्हें आंतरिक प्रतिरोध का सामना करना पड़ा तो वह राजीव के उलट अपने खेमे को एकजुट रखने में सफल रहे। हालांकि यह भी सच है कि वाजपेयी के किसी साथी ने उस तरह साथ नहीं छोड़ा जिस तरह वी पी सिंह ने राजीव का साथ छोड़कर उनके खिलाफ जंग का ऐलान कर दिया था। मनमोहन सिंह की तरह वाजपेयी भी बहुत कम शब्दों में अपनी बात रखना पसंद करते थे। अपने सहयोगियों और अधिकारियों के साथ भी उनका संवाद सीमित ही रहता था। लेकिन यह समानता यहीं पर खत्म हो जाती है क्योंकि वह सही और गलत का भेद बेहतर तरीके से कर पाते थे। निश्चित रूप से अपना हित बाकी चीजों पर भारी नहीं पड़ता था।
 
वह मनमोहन की तरह खुद को किसी का बंधक भी नहीं महसूस करते थे। हालांकि इसके चलते उनका राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ कुछ तनाव भी हुआ लेकिन वह अपने पद की गरिमा से कोई समझौता किए बगैर उन्हें हल करने में सफल रहे। नरेंद्र मोदी के उलट वह बहुत कड़ी मेहनत करने वाले प्रधानमंत्री नहीं थे। दिन में 15-17 घंटे काम करने का विचार ही उन्हें बेतुका लगता था। इस वजह से उनके पास लक्ष्यों का पीछा करने के बजाय वास्तविक अहमियत रखने वाली बातों पर ध्यान देने के लिए अधिक वक्त होता था। वह हर बात को चुनावों के इकलौते चश्मे से नहीं देखते थे। निश्चित रूप से जीत महत्त्वपूर्ण थी और ऐसा होना भी चाहिए। लेकिन मौजूदा दौर की तरह किसी भी कीमत पर नहीं। जब वह प्रधानमंत्री थे तो उनकी ही पार्टी के कई लोग उनके बुजुर्ग-समान रवैये को लेकर उनका तिरस्कार किया करते थे। एक मंत्री तो हमेशा उन्हें 'वो बुड्ढïा' कहकर बुलाते थे। इस मामले में वह काफी हद तक नरसिंह राव की तरह थे जिनकी उनके ही कुछ मंत्री हंसी उड़ाया करते थे। 
 
हालांकि राव के उलट वाजपेयी को अपनी पार्टी का अध्यक्ष बनने की जरूरत नहीं महसूस हुई। उन्होंने पार्टी संभालने का काम दूसरों पर छोड़ रखा था। वैसे राजनीति में इस तरह का भरोसा बहुत कम ही दिखता है। (मोदी ने भी पार्टी का जिम्मा अमित शाह को दिया हुआ है लेकिन शाह किसी भी मायने में उनके प्रतिद्वंद्वी नहीं हैं।) कुछ प्रधानमंत्रियों ने ही वैसे सियासी हेरफेर का सामना किया होगा जैसा वाजपेयी को करना पड़ा था। वर्ष 1996 में जब वह पहली बार प्रधानमंत्री बने थे तो उन्हें 13 दिनों के भीतर ही हटना पड़ा था। दूसरी बार उनका कार्यकाल थोड़ा लंबा चला लेकिन इस बार भी उन्हें अïिवश्वास प्रस्ताव के जरिये बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। इस बार तो महज एक मत से वाजपेयी सरकार गिर गई थी। गठबंधन से अन्नाद्रमुक के बाहर होने के बाद विपक्ष ने वाजपेयी सरकार के खिलाफ वह अविश्वास प्रस्ताव पेश किया था। उस प्रस्ताव पर चली संसदीय कार्यवाही देखने वाला कोई भी शख्स उस नीरव चुप्पी को नहीं भूल सकता है जो मत विभाजन के बाद सदन में छाई थी।  यह वाजपेयी का दुर्भाग्य ही था कि तीसरी बार भी उनकी सरकार गिर गई लेकिन इस बार संसद के भीतर नहीं बल्कि 2004 के आम चुनाव में लोगों ने उन्हें बेदखल कर दिया। यह चुनावी नतीजा कुछ उसी तरह बेतुका था जैसा 1999 में केवल एक वोट से सरकार का गिरना। अब भी लोगों के जेहन को यह झकझोरता है। उसके कुछ समय बाद वाजपेयी ने स्वैच्छिक तौर पर राजनीति से खुद को अलग कर लिया और फिर वह बीमार पड़ गए। उनके प्रतिद्वंद्वी रहे शख्स ने कमान संभाली लेकिन 2009 के चुनाव में वह जीत नहीं हासिल कर पाए। उसके बाद वह 2013 में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के लिए दावेदारी जता रहे शख्स को भी मात नहीं दे पाए।
 
यह वाजपेयी ही थे जिन्होंने इस दावेदार को जन्म दिया था। उन्होंने ही 2001 में उस व्यक्ति को गुजरात का मुख्यमंत्री बनाया था। वह दावेदार अब देश का प्रधानमंत्री बन चुका है लेकिन वाजपेयी ने जिस पार्टी को इतने प्यार से संवारा था, आज वह पूरी तरह बदल चुकी है। वाजपेयी अगर सक्रिय रहे होते तो वह कभी भी इस पार्टी के कामकाज के मौजूदा तरीकों या विचारों को स्वीकृति नहीं देते।
Keyword: atal bihari, manmohan singh, narendra modi,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या मोर सौदे से रिटेल स्टोर कारोबार में बढ़ेगा एमेजॉन का दबदबा?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.