बिजनेस स्टैंडर्ड - जीएसटी प्रशासन के समक्ष शेष मुद्दे
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जीएसटी प्रशासन के समक्ष शेष मुद्दे

पार्थसारथि शोम /  August 20, 2018

जीएसटी की शुरुआत का एक वर्ष बीतने के बाद भी ई-वे बिल और अभियोग चुनौती बने हुए हैं। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं पार्थसारथि शोम 

 
अपने पिछले आलेख में मैंने वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के पहले वर्ष में केद्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड (सीबीआईसी) के चेयरमैन के निर्देशों के बारे में विस्तार से बताया था। इनकी तादाद 50 थी। मैंने कहा था कि यह संचार मददगार था और अधिकारियों को प्रत्यक्ष तौर पर यह निर्देश देता था कि वे ग्राहकों को ध्यान में रखकर काम करें। मैंने कहा था कि यह सफलता विभागीय अधिकारियों द्वारा किए जाने वाले क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी। इस आलेख में वंचना, ई-वे बिल और मुकदमेबाजी के रूप में बरकरार चुनौतियों के बारे में बात की जा रही है। 
 
जीएसटी वंचना: चेयरमैन ने अधिकारियों को याद दिलाया कि वे राजस्व संग्रह का हिसाब रखें और राजस्व संग्रह में किसी भी तरह की गिरावट को रोकने के लिए ठोस प्रयास किए जाएं। किसी भी तरह के नकारात्मक विचलन का विश्लेषण किया जाना चाहिए और इसकी वजह को वरिष्ठïों के सामने स्पष्टï किया जाना चाहिए। यह भी कहा गया कि पुरानी से नई व्यवस्था के बीच बदलाव क्रेडिट का गलत लाभ लिए जाने का राजस्व संग्रह पर बुरा असर होगा। इसके अलावा निगरानी और प्रमाणन भी जीएसटी प्रशासन नीति के लिए प्रमुख बना हुआ है।
 
चेयरमैन ने स्वचालित केंद्रीय उत्पाद और सेवा कर व्यवस्था (एसीईएस) में लंबित रिटर्न के मामलों को भी प्रमुखता दी थी। जोनल सदस्यों से कहा गया था कि वे दैनिक आधार पर इसकी निगरानी करें और लंबित मामलों की संख्या कम करके शून्य करें। कुछ नियमों में सुधार करने की आवश्यकता है। माइग्रेशन की कट ऑफ अवधि कम की जानी चाहिए। अगर किसी संभावित कर दाता के माइग्रेशन में देरी की जाती है तो उसे स्वैच्छिक प्रवेश से क्यों रोका जाना चाहिए, भले ही कितनी भी देरी क्यों न हो? इसके बजाय इसे खुला रखने और देरी होने पर जुर्माना बढ़ाए जाने से बदलाव की प्रक्रिया को अधिक सुखद बना देता है। खासतौर पर एमएसएमई के लिए जिन्हें माइग्रेशन में चुनौती का सामना करना पड़ता है। 
 
ई-वे बिल व्यवस्था: इसमें दो राय नहीं कि यह वंचना को कम करने के लिए एक अग्रगामी कदम है और चेयरमैन फरवरी 2018 से ही बार-बार यह निर्देश देते रहे हैं कि अंतरराज्यीय और राज्य के भीतर परिवहन के लिए इसे तेजी से लागू किया जाए। परंतु व्यापारियों और ट्रांसपोर्टरों का अनुभव यह है कि ई-वे बिल तैयार करने में तकनीकी दिक्कतें आ रही हैं। इसी तरह चेयरमैन ने कहा था कि ई-वे बिल जारी करने और ले कर चलने की परीक्षण अवधि को राज्यों के भीतर और बाहर के लिए बढ़ाया जाएगा। 
 
चेयरमैन ने अनुरोध किया कि सभी मुख्य आयुक्त, राज्य आयुक्तों के साथ मशविरा करके राज्य के भीतर वस्तुओं के आवागमन पर ई-वे बिल की व्यवस्था लागू करने के बारे में अंतिम निर्णय करें। चेयरमैन की एक और उपयुक्त सलाह थी यह आश्वस्ति कि अधिकारी इस कानून से जुड़ी किसी भी प्रक्रिया को समझने के लिए बोर्ड की मदद ले सकते हैं। ई-वे बिल व्यवस्था की समुचित जांच परख जरूरी है। यह एक इलेक्ट्रॉनिक बिल है जिसमें विस्तृत डाटा जरूरी है। इसे ट्रांसपोर्ट को वस्तुओं की ढुलाई के समय साथ रखना होता है प्राप्तकर्ता और आपूर्तिकर्ता को भी इसे रखना होगा चाहे वे पंजीकृत हों या नहीं। जरूरी कदमों और घटकों को देखते हुए हर इनवॉयस के लिए 50,000 रुपये की मौजूदा सीमा कम प्रतीत होती है। उम्मीद है कि अगले दौर में इसमें सुधार किया जा सकेगा। 
 
इलेक्ट्रॉनिक पोर्टल सही ढंग से काम नहीं करता। कम कर्मचारियों वाली एमएसएमई को शायद जीएसटी के बढ़े हुए अनुपालन बोझ से न जूझना पड़े। निश्चित तौर पर इस बोझ में कमी आनी चाहिए। ई-वे बिल की वैधता अवधि भी जरूरत से कम है। निर्माण के बाद यह 100 किलोमीटर से कम दूरी के परिवहन पर एक दिन में एक्सपायर हो जाती है। हर 100 किमी के लिए इसमें एक दिन का प्रावधान है। सड़क परिवहन की अनिश्चितता को देखते हुए यह अवधि बढ़ाई जानी चाहिए।  विभिन्न राज्य, राज्य जीएसटी नियम, 2017 के नियम 138 (14) के तहत अलग-अलग रियायतें दे रहे हैं। चेयरमैन ने संबंधित क्षेत्रों के मुख्य आयुक्तों से कहा कि वे अपने राज्यो की रियायतें प्रकाशित करें लेकिन भ्रम को दूर करने का कोई ठोस तरीका नहीं है। ई-वे बिल की अवधि को बढ़ाया जाना आवश्यक है क्योंकि उसका कर वंचना की संभावना बढऩे से कोई रिश्ता नहीं। 
 
जीएसटी परिषद की हालिया बैठक में एफएमसीजी की दरों को 28 फीसदी से घटाकर 18 फीसदी करने पर कोई प्रश्न नहीं उठ रहा है। वहीं निरंतर बदलती उत्पादन कर दर या रियायत का इनवॉयस, बिल या चालान में नए सिरे से आकलन जरूरी है। सबसे बढ़कर एजेंटों को मुनाफाखोरी की निगरानी करने वाले संस्थान एनएए के समक्ष यह साबित करना है कि मुनाफे में हुआ कोई भी लाभ ग्राहकों तक संप्रेषित किया गया। राज्यों और केंद्र के नीति निर्माताओं को यह समझना चाहिए कि इनका विनिर्माताओं, कारोबारियों और डीलरों पर इस अनिश्चय का कितना गंभीर प्रभाव पड़ेगा।
 
कानूनी विवाद कम करना: एक उभरती समस्या आपूर्ति की जगह को लेकर होने वाले विवाद से जुड़ी है। कर विवाद की ऑनलाइन ट्रैकिंग की व्यवस्था के बावजूद ऐसी दिक्कतें पैदा हो रही हैं। असली समस्या ढांचागत है। विभिन्न राज्यों के एडवांस रूलिंग अथॉरिटी (एआरए) को आपूर्ति की जगह निर्धारित करने में कोई अधिकार प्राप्त नहीं है। इसे समझा जा सकता है कि क्योंकि किसी राज्य को आपूर्ति स्थल निर्धारित करने का अधिकार नहीं होना चाहिए जो उसके हित में तथा अन्य के नहीं।  परंतु केंद्रीय स्तर के एआरए के पास भी भी इस मामले में कोई अधिकार नहीं है। आदर्श स्थिति में उसे राज्यों के एआरए के बीच उपजे विवादों को हल करना चाहिए। इसलिए इस बात की भी काफी संभावना है कि अपीलीय पंचाट या अदालत के स्तर पर मामलों का ढेर लग जाए। जब तक इस चुनौती से ठीक से नहीं निपटा जाता है तब तक जीएसटी  सुधार का एक बड़ा घटक तेजी से गंवा दिया जाएगा। 
 
कॉर्पोरेट कर दर: मौजूदा वित्त वर्ष में जीएसटी राजस्व बेहतर बना हुआ है। ऐसे में अवसर है कि कॉर्पोरेट कर दर में कमी की जाए। वर्ष 2016-17 के बजट में ऐसा वादा भी किया गया था। मझोले टर्नओवर वाली कंपनियों के लिए तो यह कर दर कम की गई जबकि बड़ी कंपनियों को बहुराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धियों से मुकाबिल होना पड़ता है जिन्हें अपने क्षेत्र में दरों में सतत गिरावट का लाभ मिला है। अगर आगामी बजट में दरों में कमी नहीं की जाती है तो हम अंतरराष्ट्रीय व्यापार और प्रतिस्पर्धा के तेजी से बदलते परिदृश्य में पिछड़ जाएंगे। 
Keyword: GST, वस्तु एवं सेवा कर, जीएसटी,,
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