बिजनेस स्टैंडर्ड - सबके लिए रहूंगा निष्पक्ष
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सबके लिए रहूंगा निष्पक्ष

शिखा शालिनी /  08 19, 2018

बीएस बातचीत

राज्यसभा के नवनियुक्त उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह का कहना है कि वह सदन में अपनी नई भूमिका में पत्रकारिता और अन्य अनुभवों का इस्तेमाल करेंगे। उन्होंने शिखा शालिनी को बताया कि सदन की गरिमा बनाए रखने के लिए उन्हें सदस्यों के सहयोग की अपेक्षा है

सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तनाव कम हो, बहस के स्तर में सुधार, सदन में भागीदारी बढ़ाने और राज्यसभा की गरिमा स्थापित करने में आपकी क्या भूमिका होगी?

बिजनेस स्टैंडर्ड सबके लिए रहूंगा निष्पक्षमैं राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) का प्रत्याशी रहा लेकिन अब मैं पूरे सदन के लिए और निष्पक्ष हूं। मेरी पूरी कोशिश होगी कि हम संविधान की मर्यादा बरकरार रखते हुए नियमों और प्रक्रिया को ध्यान में रखते हुए काम करें। मैं महज चार वर्ष से मैं प्रत्यक्ष राजनीति में हूं लेकिन इससे पहले पत्रकारिता के पेशे में मैं करीब 40 सालों तक रहा जहां से मैंने राजनीति को नजदीक से देखा। जब मैं सांसद बना तो बिहार में 1857 के एक बड़े नायक बाबू कुंवर सिंह की धरती आरा में मैं एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने गया। वहां उपस्थित बच्चों ने मुझसे कुछ सवाल पूछे और मैंने वही सवाल संसद में पक्ष-विपक्ष में बैठे लोगों के सामने रखा। एक बच्चे ने मुझसे सवाल पूछा कि हमारी पूरी संसदीय प्रणाली वेस्टमिंस्टर मॉडल पर आधारित है, हमने उसके ही अनुरूप लोकतांत्रिक व्यवस्था का अनुसरण किया लेकिन इनके शिष्टाचार का अनुसरण संसद में क्यों नहीं किया जाता और जब संसद सदस्य सदन की कार्यवाही चलने नहीं देते तो वे संसद की सुविधाएं क्यों लेते हैं? मैं इस पर उत्तर देने की स्थिति में नहीं था और यह महाभारत के यक्ष प्रश्न की तरह मेरा यक्ष प्रश्न था। निश्चित तौर पर संसद में बहस और संवाद का स्तर पहले बेहतर था। मैंने संसद में कहा कि इन सवालों का जवाब हम सबको ढूंढना है क्योंकि मैं उन लोगों में से हूं जो यह मानते हैं कि राजनीति ही अंतत: चीजों को बदलती हैं। आज देश के सामने बढ़ती आबादी, रोजगार के मौके, पेयजल, गांवों से बड़े शहरों में पलायन जैसे कई ज्वलंत मुद्दे हैं। मैं सदन की पुरानी गरिमा और बेहतरीन संवाद प्रक्रिया कायम करने के लिए प्रतिबद्ध हूं जिसमें मुझे सदस्यों के सहयोग की जरूरत होगी। 

एक रिपोर्ट के मुताबिक भाजपा में ऐसे सांसदों और विधायकों की तादाद सबसे ज्यादा है जिन पर गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं। ऐसे माहौल में आप राजनीति के स्तर में सुधार लाने के लिए दलों को क्या सुझाव देंगे? 

राजनीतिक दलों और नेताओं को गौर करना होगा कि वे राजनीति करते क्यों हैं। हमारा मकसद कल्याणकारी समाज बनाने के साथ ही, दलितों, आदिवासी, गांधी के शब्दों में अंतिम व्यक्ति को ताकत देना है। कोई भी दल जब तक लोगों की समस्याओं का हल करते हैं तभी तक उसकी प्रासंगिकता रहेगी। अंतत: लोगों के बीच बने रहने के लिए सभी दलों को राजनीति के मूल सवालों का हल निकालना होगा। जब तक आप किसी समस्या की गहराई में नहीं पहुंचेंगे तो उसका निदान कैसे कर पाएंगे। निदान ढूंढने के लिए ही संसद है। बुनियादी समस्याओं की ओर लौटे बगैर राजनीति या राजनीतिक दल अपनी जड़े मजबूत नहीं बना सकते हैं।

आपके अखबार पर जदयू और भाजपा को एक साथ लाने और बिहार में मौजूदा सरकार के पक्ष में काम करने के आरोप हैं? इस पर आपका क्या कहना है?

जब मैं अखबार का संपादक था उस वक्त के अखबार का सोशल ऑडिट कराने के लिए मैं किसी को भी आमंत्रित कर सकता हूं लेकिन वह एक सार्वजनिक संस्था होनी चाहिए जिसमें निष्पक्ष लोग होने चाहिए। उस दौरान प्रेस काउंसिल के चेयरमैन मार्कंडेय काटजू ने बिहार के सारे अखबारों को कहा वे बिहार सरकार समर्थक खबरें छाप रहे हैं। उन्होंने जांच के लिए एक कमेटी बनाई। प्रभात खबर अकेला ऐसा अखबार था जिसने दो पन्ने का एक पत्र काटजू के नाम लिखकर सरकार के खिलाफ  की गई खबरों की सूची भेजी। हमारे समाज में बड़ी आसानी से आरोप लगा दिए जाते हैं। यह लोगों का अधिकार भी है और इस पर मुझे कुछ नहीं कहना है। हमने बिहार में पशुपालन घोटाला को सामने लाने सहित कई विषयों पर काम किया। झारखंड में 2000 से 2014 तक मैं संपादक था उस वक्त मंत्री, प्रशासनिक अधिकारियों और एक मुख्यमंत्री से लेकर राज्य लोक सेवा आयोग के चेयरमैन सहित उनकी पूरी टीम जेल गई क्योंकि उन्होंने चयन प्रक्रिया का मजाक बना दिया था। जिस राज्य में आप अखबार चलाते हैं वहां के मुख्यमंत्री के खिलाफ  अभियान छेडऩा कोई आसान काम नहीं था। यह जरूर है कि बिहार में जो अच्छे प्रयास हुए हमने उसे भी दिखाया। अगर प्रभात खबर सरकार समर्थक अखबार होता तो 400 प्रति वाले अखबार का प्रसार नहीं बढ़ता और यह 10 लाख प्रति के आंकड़े तक नहीं पहुंचता।

जदयू और भाजपा के बीच 2019 के चुनावों को लेकर सीट बंटवारे में मतभेद की स्थिति बनेगी तो उसमें आपकी भूमिका क्या होगी?

मैं संवैधानिक पद पर हूं। इन चीजों से मेरा अब कोई सरोकार नहीं है। मेरे पास संवैधानिक पद है तो मुझे उस पद की मर्यादा का पालन तो करना ही चाहिए।

लोकतंत्र में पत्रकारिता जब सत्ता के साथ खड़ी हो जाती है तो उसकी विश्वसनीयता कम होती है, इस दौर में यह संकट ज्यादा नहीं देखा जा रहा?

1991 से ही हमारा देश उदारीकरण के रास्ते पर चल रहा है जिसका मकसद है मुनाफा बढ़ाना था। इसके बाद हमारी पत्रकारिता में भी बड़े बदलाव देखे गए और इसमें पूंजी की जरूरत बढ़ती गई। पूंजी निवेश की एक लागत होती है ऐसे में स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रखना मुश्किल होता है। लेकिन प्रतिबद्ध पत्रकारों को किसी ने नहीं रोका है कि वे एक अपना कोऑपरेटिव बनाएं और स्वतंत्र उद्यम शुरू करें। लंदन में इंडिपेंडेंट का प्रयोग हुआ था भले ही वह बाद में असफ ल रहा। मेरा अनुभव भी 400 प्रति वाले एक मृतप्राय अखबार को बड़े घराने वाले अखबारों के सामने खड़ा करने का रहा है।  
Keyword: Harivansh Naryan Singh, opposition, Rajyasabha, Parliament, NDA, House, BJP,
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