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इमरान खान के लिए शांति की अनकही कहानी

शेखर गुप्ता /  August 19, 2018

जिस समय इमरान खान ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली, देश में जनरल जिया उल हक की 30वीं बरसी मनाने का सिलसिला चल रहा था। यह एकदम उचित समय है दोनों देशों के निर्वाचित नेताओं के बीच शांति बहाली की नाटकीय कोशिश की एक अनकही कहानी कहने का।

इस प्रक्रिया में शामिल दो नेताओं में से एक का गुरुवार को निधन हो गया जबकि दूसरा रावलपिंडी की जेल में कैद है। इस कहानी में आंशिक भूमिका मेरी भी है। यह एक तरह की आत्म स्वीकृति भी है। सन 1997 में नवाज शरीफ दूसरी बार पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने थे। कुछ ही समय बाद भारत में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की सरकार बनी।

पोकरण-2 और बदले में चगाई में परमाणु परीक्षण के बाद दोनों देशों के रिश्तों पर बर्फ पड़ गई थी। सन 1998 की अंतिम तिमाही तक दोनों पक्षों का धैर्य समाप्त हो चला था। दोनों नेता बातचीत चाहते थे लेकिन दोनों देशों के तंत्र में अविश्वास बहुत गहरा था। दिल्ली-लाहौर बस सेवा का सुझाव भी अफसरशाही की उलझनों का शिकार था। 

जाड़ों के उन शुरुआती दिनों में मेरे पास पाकिस्तान से एक डाक आई। लिफाफे पर लिखा था ‘पाकिस्तान के प्रधानमंत्री की ओर से’। यह पत्र कई सप्ताह के सफर के बाद मुझ तक पहुंचा था और उसकी हालत बता रही थी कि उसे विभिन्न एजेंसियों ने कई बार खोला था।

उनकी उत्सुकता लाजिमी थी क्योंकि इससे पहले शायद ही उन्होंने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री का कोई पत्र साधारण डाक में देखा हो। मैंने कुछ महीने पहले पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के साक्षात्कार का निवेदन किया था, यह पत्र उसी का सौहार्दपूर्ण जवाब था। मैंने उन्हें फोन करके पूछा कि क्या मैं साक्षात्कार के लिए पाकिस्तान आ सकता हूं। हमारे बीच थोड़ी बहुत दिल्लगी हुई। मैंने उनसे पूछा कि अगर दोनों प्रधानमंत्री कोई पहल ही नहीं करते हैं तो बातचीत किस विषय पर होगी? मैंने उनसे कहा कि बड़े कदम तो भूल जाइए आप लोग तो एक बस तक नहीं चला पा रहे। नवाज शरीफ ने धीमी आवाज में अधिकारियों से अपनी शिकायत दर्शाई। मैंने उस हल्की फुल्की बातचीत में पंजाबी में कहा कि वह साक्षात्कार में ही बस से जुड़ी घोषणा क्यों नहीं कर देते और पहली बस में हमारे प्रधानमंत्री को आमंत्रित क्यों नहीं करते?

नवाज शरीफ को मेरी बात पसंद आई। उन्होंने मुझसे पूछा कि अगर वह आमंत्रित करें लेकिन भारतीय प्रधानमंत्री पेशकश ठुकरा दें तो यह बहुत खराब लगेगा। मैंने उनसे कहा कि मैं देखता हूं कि मैं क्या कर सकता हूं। वाजपेयी को भी यह विचार पसंद आया। उन्होंने कहा कि मैं वापस आने के बाद उनसे मिलूं और तब तक इसे प्रकाशित न करूं। साक्षात्कार लाहौर में शरीफ के घर पर हुआ। हालांकि उस दौरान क्रिकेट बार-बार बीच में आता रहा। 

पीठ दर्द से जूझ रहे सचिन तेंडुलकर चेन्नई टेस्ट में एक बेमिसाल पारी खेलते हुए भारत को पाकिस्तान के खिलाफ जीत के करीब तक ले गए थे। शरीफ ने अपना वादा निभाया। उन्होंने कहा कि बस सेवा शुरू हो और वाजपेयी उसी बस से पाकिस्तान आएं। उन्होंने कहा कि उनका ऐसा स्वागत किया जाएगा कि इतिहास याद रखेगा।

वाजपेयी ने मुझसे कहा कि साक्षात्कार को एक दिन रोक कर रखूं। वह चाहते थे कि जिस दिन सुबह वह लखनऊ पहुंचें, साक्षात्कार उस दिन प्रकाशित हो। वह चाहते थे कि एक पत्रकार उनसे शरीफ के इस आमंत्रण के बारे में सवाल करे और इससे पहले कि विदेश मंत्रालय अपने स्वाभाविक शुबहों के साथ सामने आए, वह इसे सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर लें। बाकी बातें इतिहास में दर्ज हैं। भारी नाटकीयता के बाद यात्रा संपन्न हुई।

कुछ असहज स्थितियां भी बनीं। खासतौर पर तब जबकि तत्कालीन पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल परवेज मुशर्रफ ने वाजपेयी को स्वागत में सैल्यूट देने से मना कर दिया। वाजपेयी ने मीनार ए पाकिस्तान की सीढिय़ां चढ़ीं और कहा कि एक स्थिर और समृद्ध पाकिस्तान भारत के हित में है। ऐसा लगा कि इतिहास बन रहा है। आज कोई यह भी कह सकता है कि साक्षात्कार ‘फिक्स’ था। अगर ऐसा था भी तो इसका उद्देश्य अच्छा था। यह एक जबरदस्त खबर भी थी। 

किस्सा यहीं खत्म नहीं हुआ। दोनों प्रधानमंत्री जहां शांति स्थापना में लगे थे वहीं उनकी अनभिज्ञता में पाकिस्तानी सेना करगिल में मीलों भीतर तक घुस आई थी। मई के मध्य में पहली झड़प सामने आई। भारत ने 26 मई को हवाई शक्ति का इस्तेमाल किया। अगले दिन कंधे पर रख कर दागी गई मिसाइलों से दो मिग विमान नष्ट हो गए। एक कैनबरा विमान का एक इंजन मिसाइल से क्षतिग्रस्त हुआ लेकिन उसे सुरक्षित उतारने में कामयाबी मिली। हम इन परिस्थितियों के लिए तैयार नहीं थे। मैं मुंबई के एक होटल में था। सुबह 6.30 बजे ही मेरा फोन बज उठा। सामने से कहा गया कि प्रधानमंत्री बात करना चाहते हैं। उन्होंने पूछा, ‘ये क्या कर रहा है मित्र आपका?’ उनकी आवाज में चिंता थी।

उन्होंने कहा कि हर कोई चकित है। भला मुजाहिदीन के पास मिसाइल कैसे हो सकती हैं और यह सब तब जबकि पाकिस्तानी सेना प्रमुख चीन में हैं। उन्होंने मुझसे कहा, ‘क्या आप अपने मित्र से पूछेंगे कि यह सब क्या हो रहा है?’ मैंने इस्लामाबाद उस नंबर पर एक संदेश दिया। उसी रात मेरे पास फोन आ गया। नवाज शरीफ भी उतने ही उलझे हुए थे जितने कि वाजपेयी। उन्होंने मुझसे कहा, मित्र ‘आप उनसे कह सकते हैं कि मैं उन्हें धोखा नहीं दूंगा। मुझसे कल कहा गया कि नियंत्रण रेखा पर कुछ झड़प हुई है जैसी कि अक्सर होती रहती है। आज बताया गया कि हवाई सीमा का उल्लंघन हुआ है। मैं चकित हूं।’ उन्होंने वाजपेयी से बात करने की इच्छा जताई।

मेरी वापसी पर वाजपेयी और ब्रजेश मिश्रा ने मुझे बुलाया। उन्होंने कहा, ‘हमारे लोगों’ ने जनरल मुशर्रफ और उनके डिप्टी के बीच बातचीत के कुछ फोन टेप किए हैं जिनसे पुष्टि होती है कि करगिल पूरी तरह सैन्य ऑपरेशन है। उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मैं पुन: एक साक्षात्कार के बहाने पाकिस्तान जाकर नवाज शरीफ को उन टेप के बारे में बताऊंगा। अब तक मैं खुद को संभाल चुका था। मैंने विनम्रतापूर्वक कहा कि ऐसा करना उचित नहीं होगा।

मैंने जो साक्षात्कार किया था वह सही मायनों में एक अनूठी खबर थी। बस यात्रा तो उससे जुड़ा हुआ लाभ था। अब मुझे जो करने को कहा जा रहा था वह पत्रकारिता से कुछ ज्यादा ही था। वे समझ गए। उन्होंने एक पूर्व संपादक से यह करने को कहा। उस वक्त ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन से जुड़े आर के मिश्रा ने इस्लामाबाद की कई यात्राएं कीं। उन्होंने शरीफ को वे टेप भी प्रमाण स्वरूप सौंपे। मेरी खबर या कहें पत्रकारिता से परे का रोमांच समाप्त हो चुका था। वाजपेयी के नेतृत्व में भारत करगिल विजय में कामयाब रहा। उनके कद में भारी इजाफा हुआ। अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के दबाव में नवाज शरीफ शांति स्थापना के लिए आए लेकिन सेना के साथ उनके रिश्ते बिगड़ गए। 

कुछ ही महीनों के भीतर सैन्य तख्तापलट हुआ और उन्हें पहले जेल फिर निर्वासन झेलना पड़ा। इसके साथ ही पाकिस्तान के किसी नेता का भारत संबंधी विदेश और सामरिक नीति को सेना से अपने हाथ में लेने का सबसे प्रतिबद्ध प्रयास समाप्त हो गया। लगता नहीं कि ऐसा अवसर दोबारा आएगा। इमरान खान में यह साहस नहीं नजर आता कि वह सेना और आईएसआई प्रतिष्ठान को चुनौती दे सकें।

पाकिस्तान के नए प्रधानमंत्री के पास सीखने को कई सबक हैं। पहला, भारत के साथ शांति स्थापना के प्रयास जोखिम भरे हैं और सेना को परे रखकर ऐसा करना आत्मघाती हो सकता है। दूसरा, पाकिस्तान के किसी निर्वाचित प्रधानमंत्री ने अपना कार्यकाल पूरा नहीं किया है और तीसरा, हर निर्वाचित प्रधानमंत्री का निर्वासन हुआ, जेल हुई या उसे अपनी जान गंवानी पड़ी है। इमरान खान ने जीवन में कई जोखिम उठाए हैं। क्रिकेट में, रिश्तों में, शादी और राजनीति में भी। परंतु उनके देश में सत्ता का मूल समीकरण अपरिवर्तित है। 

अगर वह शांति स्थापना का प्रयास करेंगे तो साफ है कि सेना के इशारे पर। अगर कोई नई शुरुआत होती है तो मैं इसका हिस्सा कभी नहीं बनूंगा। यह लुभावना लेकिन दिक्कतदेह काम है। भले ही यह एक चौंकाने वाली बड़ी खबर का मौका हो। आज यह किस्सा बयां करने की चार वजह हैं: वाजपेयी का निधन हो चुका है। नवाज शरीफ जेल में हैं। इमरान खान ने शपथ ग्रहण कर ली है और सबसे अहम अब उस बात को 20 वर्ष बीत चुके हैं।
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