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कारोबारी गतिविधियों में राजनीतिक दखल

नितिन पई /  August 17, 2018

किस्से-कहानियों को अनुभवजन्य प्रमाण नहीं माना जाता है लेकिन वे अपने आप में एक दास्तान समेटे होते हैं। मैं आपको एक ऐसा ही किस्सा सुनाता हूं जो मुझे इससे जुड़े एक व्यक्ति ने बताया था। कुछ वर्ष पहले एक मझोले आकार की पश्चिमी बहुराष्ट्रीय कंपनी के शीर्ष अधिकारी पेइचिंग में अपनी चीनी अनुषंगी कंपनी की नीतिगत बैठक में शामिल होने गए थे।

जब वे दिए गए एजेंडे पर बात कर चुके तो उन्होंने पाया कि उनका स्थानीय सीईओ उनके भारतीय कारोबार के बारे में चर्चा कर रहा है कि कैसे वे कारोबारी अवसर गंवा रहे हैं। इन अधिकारियों को लगा कि यह कार्यालयों में होने वाली आम राजनीति का हिस्सा है। परंतु तभी उन्होंने पाया कि इस चर्चा में दो और लोग शामिल हो गए। दरअसल उनकी मांग थी कि संस्थान अपना समूचा एशियाई कारोबार भारत से हटाकर चीन में स्थानांतरित कर दे।

बहुराष्ट्रीय निगमों की अंदरूनी राजनीति की दृष्टि से देखें तो यह सब उचित ही प्रतीत होता है। यहां दिक्कत केवल यह थी कि चर्चा में शामिल दो चीनी अधिकारी चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के पदाधिकारी थे। उन्हें आमतौर पर कॉमिसार कहकर पुकारा जाता है। वे कारोबार स्थानांतरित करने का केवल प्रस्ताव नहीं रख रहे थे।

पश्चिमी अधिकारियों को उनकी बात में एक धमकी की झलक दिखाई दी। एशियाई कारोबार भारत में इसलिए रखा गया था क्योंकि यह निगम की सबसे पुरानी और सबसे अधिक मुनाफा देने वाली इकाई थी। इस व्यवस्था को बदलने की कोई वजह अब तक उनके सामने नहीं आई थी। अब चीन के अधिकारी न केवल एशियाई कारोबार चाहते थे बल्कि उनकी इच्छा थी कि भारतीय इकाई को भी चीन स्थानांतरित कर दिया जाए। एक वर्ष बाद ऐसा हो भी गया। अब भारतीय सीईओ पेइचिंग स्थित क्षेत्रीय मुख्यालय को रिपोर्ट करता है।

चीन के कानून के तहत सभी कंपनियों को पार्टी संगठनों की गतिविधियों के लिए आवश्यक परिस्थितियां मुहैया करानी होती हैं। इनकी स्थापना कंपनी के भीतर होनी चाहिए। इसके अलावा अगर कंपनी में तीन या अधिक पार्टी सदस्य हों तो उन्हें अपने कार्यस्थल पर पार्टी संगठन बनाना होता है। यह बात सभी स्थानीय और विदेशी, सरकारी और निजी कंपनियों पर लागू होती है। शी चिनफिंग के कार्यभार संभालने के पहले भी इन शर्तों का पालन करना होता था लेकिन इन्हें बहुत गंभीरता से नहीं लिया जाता था। पार्टी बैठकें सामाजिक आयोजनों की तरह होती थीं जहां कई बार पेइचिंग से आया औपचारिक पैगाम पढ़ा जाता था।

अब इसका इस्तेमाल शी चिनिफिंग के राजनीतिक, आर्थिक और भूआर्थिक एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए किया जाने लगा है। चीन में पार्टी कार्यालय रखने वाली विदेशी कंपनियों की तादाद वर्ष 2011 के 47,000 से बढक़र 2016 के अंत तक 106,000 हो चुकी थी। चीन की 27 लाख निजी कंपनियों में से 70 प्रतिशत से अधिक में पार्टी इकाई है। इनकी तादाद बढ़ाने के लिए जो प्रयास किए जा रहे हैं वे पिछले कई दशकों में देखने को नहीं मिले थे। गत अगस्त में रॉयटर्स के माइकल मार्टिना ने कहा था कि यूरोप की बहुराष्ट्रीय कंपनियों के करीब एक दर्जन अधिकारियों ने पेइचिंग में इस बात पर चर्चा की कि कैसे उनके कारोबारी परिचालन में पार्टी की घुसपैठ हो रही है।

मार्टिना के मुताबिक कंपनियों पर इस बात का दबाव डाला जा रहा था कि प्रबंधन में पार्टी को और अधिक औपचारिक अधिकार प्रदान किए जाएं। मार्टिना के मुताबिक एक वरिष्ठ अधिकारी जिसकी कंपनी का प्रतिनिधित्व बैठक में था, ने रॉयटर्स को बताया कि कुछ कंपनियों पर राजनीतिक दबाव डाला जा रहा है कि वे चीन की सरकारी कंपनियों के साथ संयुक्त उपक्रम वाले मामलों में शर्तें बदलें ताकि पार्टी को कारोबारी परिचालन और निवेश संबंधी निर्णयों में अंतिम फैसला लेने का अधिकार हो। अधिकारी ने कहा कि एक बार संचालन का हिस्सा बनने के बाद उनको सीधा अधिकार मिल जाता।

तंग श्याओफिंग ने पार्टी को कारोबार से अलग करने की शुरुआत की थी लेकिन शी चिनफिंग पुराना सिलसिला वापस ला रहे हैं। सरकारी अधिकारी और राजनीतिक पार्टी के कार्यकर्ताओं को कभी मूल्य निर्माण, नवाचार या प्रतिस्पर्धा के लिए नहीं जाना गया। जैसा कि मैं पहले भी लिख चुका हूं, शी चिनफिंग जिस तेजी से तंग की नीतियों को पलट रहे हैं उसका चीन के उभार पर भी नकारात्मक असर होगा।

हालांकि अल्पावधि में पार्टी घरेलू और विदेशी निगमों में अपने प्रभाव का इस्तेमाल चीन के भूआर्थिक और विदेश नीति संबंधी लक्ष्यों को प्राप्त करने में करेगी। निश्चित तौर पर अमेरिका के साथ व्यापार युद्ध की आशंका के बाद चीन निजी निगमों का इस्तेमाल प्रत्यक्ष व्यापार और निवेश के लिए कर सकता है। यह बात भी दीर्घावधि में चीन के हितों को प्रभावित करेगी लेकिन इस प्रक्रिया के दौरान पहले यह क्षेत्र के कारोबार और अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाएगी।

सवाल यह है कि भारत को क्या करना चाहिए? केंद्र सरकार, खासतौर पर वाणिज्य एवं विदेश मंत्रालयों के पास अवसर है कि वे चीन में काम कर रही भारतीय कंपनियों का गोपनीय सर्वे कराएं ताकि उन्हें इस समस्या की विकरालता और गंभीरता का सही-सही अंदाजा लग सके। उसके बाद जरूरी कदम उठाए जा सकते हैं।

सबसे अहम बात यह है कि निजी उपक्रमों में चीन का हस्तक्षेप और अमेरिका के साथ व्यापार और मुद्रा युद्ध में उसकी संलिप्तता भारत को यह अवसर प्रदान करती है कि वह अंतरराष्ट्रीय कारोबारी समुदाय के समक्ष प्रतिस्पर्धी विकल्प पेश करे। यहां प्रतिस्पर्धी विकल्प पर जोर रहेगा क्योंकि उसके लिए बड़े आर्थिक उदारीकरण मसलन श्रम सुधार और नियामकीय शिथिलता की आवश्यकता होगी।

आगामी लोकसभा चुनाव के पहले ऐसे सुधारों की अपेक्षा करना सही नहीं होगा लेकिन राजनीतिक दलों के घोषणापत्र तैयार करने वालों को यह ध्यान में रखना चाहिए कि इस समय कारोबारों को चीन से बाहर निकालने और भारत में लाने का एक दुर्लभ अवसर हमारे सामने है।
Keyword: शी चिनिफिंग, राजनीतिक, आर्थिक, Loksabha, Election, Company,
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