बिजनेस स्टैंडर्ड - मोदी, वाजपेयी और मैक्रां
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मोदी, वाजपेयी और मैक्रां

संपादकीय /  August 17, 2018

स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर अपने लंबे भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी सरकार की कई उपलब्धियां गिनाईं। उन्होंने कहा कि वह बदलाव के लिए अधीर हैं और जोर देकर कहा कि पिछले साढ़े चार वर्ष में उन्होंने कई कठोर निर्णय लिए। ये तमाम बातें सच हैं। हालांकि यह भी सच है कि नोटबंदी के रूप में उठाया गया उनका सबसे सख्त कदम उलटा प्रभाव डालने वाला साबित हुआ।

इसमें दो राय नहीं कि नरेंद्र मोदी ने एक उद्देश्यपूर्ण और ऊर्जावान सरकार का नेतृत्व किया। एक ऐसी सरकार जो महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित करने से नहीं घबराती और उन लक्ष्यों को प्राप्त करने का प्रयास भी करती है। उस दृष्टि से देखा जाए तो सरकार की उपलब्धियों को प्राय: बढ़ाचढ़ाकर पेश किया जाता है।

मौजूदा सरकार न तो वृद्घि दर हासिल करने में सफल रही है और न ही निवेश दर में इजाफा ला पाई है। बल्कि निवेश दर घटी है। अन्य वृहद आर्थिक कारकों मसलन राजकोषीय घाटे, मुद्रास्फीति और चालू खाते के घाटे की स्थिति में सुधार हुआ है। इसका श्रेय सरकार को मिलना चाहिए लेकिन इसके लिए कच्चे तेल की कम कीमतें भी काफी हद तक वजह रहीं। 

विभिन्न योजनाओं की बात करें तो मोदी उनका नाम बदलने, उन्हें बड़े पैमाने पर लागू करने और उनके बारे में चर्चा करने में अधिक संलग्न रहे। यह बात जहां एक खास किस्म के सातत्य की ओर इशारा करती है, वहीं मोदी सरकार के प्रदर्शन के बारे में यह भी स्पष्टï कहा जा सकता है कि यह सरकार अपनी पूर्ववर्ती सरकार से बेहतर है। लेकिन नीतिगत मोर्चे पर बहुत बड़े बदलाव का प्रयास न करना और सन 1991 के बाद के सुधारों के उलट संरक्षणवाद को अपनाना अफसोसनाक है।

हालांकि सरकार की यह कोशिश निर्यात में आ रही कमी और बढ़ते व्यापार घाटे से निपटने की प्रक्रिया का हिस्सा है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का निधन इसी सप्ताह हुआ है, ऐसे में उनकी सरकार की आर्थिक पहलों को याद करना उचित होगा। ऐसा करने के पीछे किसी तरह की तुलना का मकसद नहीं है। यह केवल एक याद को दोहराना है और यह देखना है कि उस समय क्या कुछ किया जा सका था जब भाजपा के पास सदन में केवल एक तिहाई सीटें थीं (गठबंधन सरकार को बाहरी समर्थन से मामूली बहुमत हासिल था)।

अप्रत्यक्ष कर सुधार की प्रक्रिया शुरू हुई थी और अब वह वस्तु एवं सेवा कर के रूप में सामने है। विनिवेश के बजाय निजीकरण किया गया था। राजकोषीय उत्तरदायित्व कानून पेश किया गया, ब्याज दरों में कटौती की गई ताकि बीते दशक की आर्थिक तेजी हासिल हो सके, दूरसंचार सुधार शुरू किए गए, एक महत्त्वाकांक्षी राजमार्ग परियोजना शुरू की गई, नए निजी बैंक खोले गए और स्कूल संबंधित एक बड़ा कार्यक्रम शुरू किया गया। आपदा प्रबंधन की दृष्टि से देखें तो सन 1998 के परमाणु परीक्षण के बाद थोपे गए प्रतिबंधों से तत्कालीन सरकार बखूबी निपटी थी और यह सुनिश्चित किया था कि अर्थव्यवस्था एशियाई संकट के भंवर में न उलझे। वृद्घि दर बहुत अच्छी नहीं रही क्योंकि अर्थव्यवस्था सन 1994-97 की तेजी के बाद के असर से जूझ रही थी, डॉटकॉम का बुलबुला फूट चुका था और लगातार सूखों और अल्प बारिश से कृषि प्रभावित थी। यह कहना उचित होगा कि दोनों प्रधानमंत्रियों ने अपनी क्षमता से कमतर प्रदर्शन किया।

विचार कीजिए कि फ्रांसीसी राष्ट्रपति एमैनुएल मैक्रां ने मात्र 15 महीने में क्या कर दिखाया है। उन्होंने फ्रांस की कर व्यवस्था सुधारी है, राजकोषीय घाटे को कम करके दशक के निम्रतम स्तर पर ले आए हैं, जीडीपी की तुलना में कर्ज का स्तर कम किया है, श्रम बाजार को लचीला बनाया है, छोटे और मझोले उद्यमों की राह आसान की है और ऐसा निजीकरण कार्यक्रम शुरू किया है जिसका लाभ नवाचार फंड को मिलेगा। आगे वह पेंशन सुधार करने वाले हैं, वेतन को योग्यता पर आधारित किया जाएगा और सरकार के लिए तय अवधि के अनुबंध बढ़ाए जाएंगे। 

अफसरशाही का आकार छोटा किया जाएगा और शिक्षा और कौशल विकास में निवेश बढ़ाया जाएगा। इनमें से कुछ कदमों की वाम ने तो कुछ की दक्षिणपंथी धड़ों ने आलोचना की है। वृद्घि दर अभी भी धीमी है और बेरोजगारी ज्यादा है। मैक्रां की लोकप्रियता पर भी असर हुआ है। उन्हें वहां ‘सूट-बूट की सरकार’ जैसा कहा जा रहा है लेकिन वह देश के सरकारी क्षेत्र का आकार घटाने, अर्थव्यवस्था को किफायती बनाने, कर बदलावों के जरिये निवेश जुटाने और तेजी वृद्घि लाने के लिए प्रतिबद्घ हैं। मोदी की तरह उन्हें भी दंभी माना जाता है और वह भी बहुत कम साक्षात्कार देते हैं। परंतु यह तय है कि वह अन्य नेताओं की तुलना में कहीं अधिक सक्रिय हैं।
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