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एनएचएआई पर कर्ज का बोझ

मेघा मनचंदा / नई दिल्ली August 17, 2018

सरकार सडक़ निर्माण पर जोर दे रही है, जिससे वर्ष 2014 से भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) की उधारी 18 गुना से अधिक बढक़र 620 अरब रुपये पर पहुंच गई है। वर्ष 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुआई वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सत्ता में आया था। सडक़ निर्माण को आर्थिक गतिविधियों का एक महत्त्वपूर्ण सूचक माना जाता है। 

एनएचएआई की उधारियां 2014-15 तक 33.43 अरब रुपये थी। इससे राजमार्ग प्राधिकरण पर कर्ज के भारी बोझ की चिंताएं पैदा हुई हैं। एनएचएआई ने टोल आधारित बिल्ड, ऑपरेट ऐंड ट्रांसफर (बीओटी) मॉडल की जगह हाइब्रिड एन्युटी मॉडल (एचएएम) अपनाया है। एचएएम के अलावा ईपीसी (इंजीनियरिंग प्रोक्योरमेंट ऐंड कंस्ट्रक्शन) मॉडल के आधार पर भी परियोजनाओं का निर्माण किया जा रहा है, जिनके लिए पूरा पैसा सरकार मुहैया कराती है। 

एचएएम मॉडल आने से सडक़ निर्माण में निजी क्षेत्र की वापसी हुई है, लेकिन इससे सरकार पर कर्ज का भार भी बढ़ा है। केंद्र सरकार इन परियोजनाओं के लिए 40 फीसदी पैसा मुहैया कराती है, लेकिन यह पैसा परियोजना की भौतिक एवं वित्तीय प्रगति के आधार पर वितरित किया जाता है। 

एनएचएआई ने हाल में चालू वित्त वर्ष की खातिर पैसा जुटाने के लिए भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के साथ 250 अरब रुपये के कर्ज के लिए करार किया है। एनएचएआई को कर्ज देने के लिए विभिन्न बैंकों से 440 अरब रुपये के प्रस्ताव मिले हैं। एनएचएआई के एक अधिकारी ने कहा, ‘हम घरेलू बाजार के लिए अपना 100 अरब रुपये का बॉन्ड निर्गम जल्द लाने जा रहे हैं। राष्ट्रीय लघु बचत कोष (एनएसएसएफ) से 50 अरब रुपये और एलआईसी से 40 अरब रुपये पहले ही जुटाए जा चुके हैं।’ अधिकारी ने कहा कि पैसा जुटाने का समय सही होना जरूरी है। उन्होंने कहा, ‘वित्त व्यवस्था करने के समय हमारा मुख्य सरोकार यही है कि यह हमें अच्छी दर पर मिले।’

मामले के जानकार एक दूसरे अधिकारी के मुताबिक एनएचएआई  अंतरराष्टï्रीय बाजार में 250 अरब रुपये मूल्य की मध्यम अवधि की प्रतिभूतियां भी जारी करेगा। भले ही प्राधिकरण अधिक से अधिक राजमार्गों के निर्माण के लिए धन जुटाने की योजनाओं की रूपरेखा को स्पष्ट और क्रमबद्घ ढंग से प्रस्तुत करता है, चुनौती भूमि अधिग्रहण को लेकर होती है। 
मैक्वायरी रिसर्च की एक रिपोर्ट कहती है, ‘एक ओर जहां एनएचएआई परियोजानाएं आवंटित करने में तेज गति से आगे बढ़ रहा है, इन परियोजनाओं को पूरा करने के लिए कर्ज देने वाले बैंकों की संख्या सीमित हैं। हम मानते हैं कि एक बार में सडक़ क्षेत्र में इतनी परियोजनाओं के वित्तपोषण से बैंक थोड़ा हिचक सकते हैं।’
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