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अजातशत्रु थे अटल बिहारी वाजपेयी

अर्चिस मोहन /  August 16, 2018

वर्ष 2016 में प्रकाशित पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जीवनी की प्रस्तावना में गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने उन्हें भारतीय राजनीति का एक दुर्लभ अजातशत्रु कहकर संबोधित किया है। यानी एक ऐसा व्यक्ति जिसका कोई दुश्मन न हो। प्रशंसा के दौर में अक्सर असहज करने वाले तथ्यों की अनदेखी कर दी जाती है।

वाजपेयी समकालीन भारतीय राजनीति के सबसे बढिय़ा और पसंदीदा राजनेताओं में से एक थे लेकिन ऐसा भी नहीं कि उनके शत्रु नहीं थे। दिलचस्प बात है कि उनके सभी शत्रु संघ परिवार से थे। वाजपेयी के राजनैतिक कार्यकाल के अलग-अलग मोड़ पर बलराम मधोक, नानाजी देशमुख और सुब्रमण्यन स्वामी उनके बडे आलोचक या प्रतिद्वंद्वी के रूप में उभरे। वाजपेयी को एक उदारमना व्यक्ति माना जाता था लेकिन उन्होंने भाजपा के महासचिव रहे के एन गोविंदाचार्य को कभी माफ नहीं किया। गोविंदाचार्य ने एक बार उन्हें आरएसएस का मुखौटा कह दिया था। जब तक वाजपेयी सक्रिय राजनीति में रहे उपरोक्त चारों में से कोई व्यक्ति संघ परिवार में दोबारा आसरा नहीं पा सका। 

वाजपेयी ने भारतीय जनसंघ में तेजी से ऊंचाइयां छुईं। भाजपा का पूर्ववर्ती जनसंघ सन 1951 में स्थापित हुआ। पहले श्यामा प्रसाद मुखर्जी और उनके निधन के बाद दीन दयाल उपाध्याय ने उनके भीतर छिपे वक्ता को पहचाना। उपाध्याय वाजपेयी से सात वर्ष बड़े थे। सन 1952-53 तक उन्हें देश भर में भाषण देने भेजा जाने लगा।

ग्वालियर में पले बढ़े वाजपेयी की मराठी बहुत अच्छी थी तो उन्हें महाराष्ट्र भी भेजा जाता। सन 1955 में वाजपेयी ने अपना पहला लोकसभा चुनाव एक उपचुनाव के रूप में लड़ा। पंडित जवाहरलाल नेहरू की छोटी बहन विजयलक्ष्मी पंडित ने संयुक्त राष्ट्र जाने के लिए लखनऊ सीट खाली की थी। सन 1957 में वाजपेयी लखनऊ समेत तीन सीटों से लड़े। वह लखनऊ से हार गए, मथुरा में उनकी जमानत जब्त हो गई लेकिन वह बलरामपुर से जीतने में कामयाब रहे। सन 1957 में जनसंघ की जीती चार सीटों में एक बलरामपुर भी थी। 

परंतु वाजपेयी सन 1962 में बलरामपुर सीट बरकरार नहीं रख सके और कांग्रेस के सौभद्र जोशी से 2,000 वोटों से हार गए। पार्टी ने उन्हें राज्यसभा में भेजा। उस वर्ष वाजपेयी ने कंपनी अधिनियम में संशोधन के लिए एक निजी विधेयक पेश किया और कंपनियों द्वारा राजनीतिक चंदे पर रोक लगाने की मांग की। सन 1967 में उपाध्याय की संदिग्ध परिस्थितियों में मृत्यु के बाद वाजपेयी जनसंघ के शीर्ष नेताओं में शुमार हो गए।

मधोक के साथ उनकी प्रतिद्वंद्विता थी। मधोक ने आरएसएस प्रमुख माधव सदाशिव गोलवलकर को पत्र लिखकर वाजपेयी की शिकायत की। इसमें कहा गया था कि वाजपेयी जन संघ कार्यालय का दुरुपयोग कर रहे हैं। मधोक को पार्टी विरोधी गतिविधियों के लिए निकाल दिया गया। आपातकाल के दौरान आरएसएस को स्वामी में संभावित नेता दिख रहा था लेकिन वह पार्टी में बने नहीं रह सके। पहले वह समाजवादी नेता चंद्रशेखर की ओर गए और बाद में राजीव गांधी के करीब हो गए। वह वाजपेयी पर आरोप लगाते रहे कि उन्हें दूर करने में उनका हाथ था।

आपातकाल के दौर में स्वामी नायक के समान थे। उन्हें लगता रहा कि वाजपेयी इस बात को पचा नहीं पाए। सन 1997 में स्वामी ने एक तमिल प्रकाशन में वाजपेयी को लेकर कई लेख लिखे। उन्होंने उनके व्यक्तिगत जीवन पर भी आक्षेप लगाए। सन 1999 में वाजपेयी की 13 महीने पुरानी सरकार गिराने में उनकी अहम भूमिका थी। लेकिन सभी राजनीतिक दलों में वाजपेयी को चाहने वालों की कोई कमी न थी। सन 1961 में जब राष्ट्रीय एकीकरण परिषद बनाई गई तो नेहरू ने वाजपेयी को इसमें शामिल करने पर जोर दिया। वाजपेयी जनता पार्टी की सरकार में विदेश मंत्री रहे। वह घटना मशहूर है जिसमें उन्होंने साउथ ब्लॉक से नेहरू की मूर्तियां नहीं हटने दी थी। 

सन 1990 के दशक के मध्य में दलित नेता संजय पासवान भाजपा में शामिल हुए। उन्होंने एक रैली में वाजपेयी को आमंत्रित किया। रैली में पासवान ने जब कई बार जय श्री राम का नारा लगाया। पासवान कहते हैं कि इससे नाराज वाजपेयी ने उनसे कहा कि भाजपा में जय श्री राम कहने वाले नेताओं की कमी नहीं है। उन्होंने कहा कि पासवान दलितों के मुद्दे ही उठाएं तो बेहतर।

अमेरिका में 9/11 के आतंकी हमले के बाद अमेरिका ने वाजपेयी सरकार पर दबाव बनाया कि वह अफगानिस्तान में सेना भेजे। वाजपेयी मंत्रिमंडल के कई सदस्य इसके लिए तैयार भी थे लेकिन वाम दलों ने इसका विरोध किया। वाजपेयी ने वाम नेताओं के साथ बैठक की। वाम नेता उनकी आर्थिक नीतियों को लेकर पहले ही उनसे मिलना चाहते थे। बातचीत के दौरान अफगानिस्तान में सेना भेजने का प्रश्न भी आया। वाजपेयी ने उन्हें चौंकाते हुए कहा कि विपक्ष इस मुद्दे पर जो चाहे कदम उठा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर वाम दल संसद के बाहर विरोध प्रदर्शन करते हैं तो वे उन्हें नहीं रोक सकते। इतना संकेत पर्याप्त था। वाम दलों ने जमकर विरोध किया और वाजपेयी अपने सहयोगियों और अमेरिकियों को समझाने मे कामयाब रहे कि भारतीय सैनिकों को अफगानिस्तान भेजने का क्या असर हो सकता है। सन 1990 के दशक में वाजपेयी ने संसद में तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह पर हमला बोला। सिंह ने दुखी होकर इस्तीफे की पेशकश कर दी। तत्कालीन प्रधानमंत्री पी वी नरसिंह राव ऐसा नहीं चाहते थे।

उन्होंने अपने पुराने मित्र वाजपेयी को फोन किया। वाजपेयी सिंह की संवेदनशीलता को भांप गए। उन्होंने उनसे बात की और उन्हें इस्तीफा न देने के लिए मनाया। भाजपा के अन्य नेताओं और आरएसएस के लोगों के उलट वाजपेयी का जीवन खुली किताब था। वाजपेयी को उनकी कविताओं और वाक् कला के लिए भी जाना जाता है।

आपातकाल हटने पर वाजपेयी ने लिखा था, ‘अब सवेरा हो गया है, दीपक बुझाने का वक्त आ गया है।’ लखनऊ से पहला लोकसभा चुनाव हारने के बाद भी सन 1991 से 2004 तक वह लगातार वहां से जीतते रहे। वाजपेयी ने लखनऊ में एक कविता पढ़ी थी, ‘हिंदू तन मन, हिंदू जीवन, रग रग हिंदू मेरा परिचय।’

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