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रक्षा क्षेत्र के सवाल-जवाब और सार्वजनिक अनभिज्ञता

अजय शुक्ला /  August 16, 2018

देश के सांसद रक्षा क्षेत्र को लेकर जब संसद में सरकार से सतही प्रश्न करते हैं और रक्षा मंत्रालय इनके आधे-अधूरे जवाब देता है तो उससे यह चिंता पैदा है कि सर्वोच्च स्तर पर राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर किस कदर उदासीनता है। केंद्र के व्यय का 16-18 प्रतिशत हिस्सा सेना को जाता है। एक पल के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा को किनारे भी कर दें तो भी आर्थिक आधार पर भी हमारे विधि निर्माताओं को कड़े प्रश्न करने चाहिए। सरकार को देश को आश्वस्त करना चाहिए कि सेना पर खर्च किए जा रहे खरबों रुपयों का सही प्रयोग हो रहा है। अगर आप संसद की रक्षा संबंधी कार्यवाही से गुजरेंगे तो पाएंगे कि हमारे सांसद इस विषय को लेकर उतने ही अनभिज्ञ हैं जितने कि उनके पार्टी प्रवक्ता टेलीविजन पर होने वाली बहस में।

रक्षा मामलों पर संसद की स्थायी समिति तक कड़े प्रश्न करने में नाकाम रही है जबकि रक्षा मंत्रालय ने समिति की बातों के जैसे तैसे जवाब देकर काम चला लिया। कई मामलों में मंत्रालय ने सवालों की अनदेखी तक कर दी। अमेरिका में सीनेट की सशस्त्र सेवा समिति और प्रतिनिधिसभा की सशस्त्र बल समिति उन अधिकारों का प्रयोग करती हैं जो पेंटागन से मुकाबिल हों। ये समितियां सभी बड़े पदों के नामितों को मंजूरी देती हैं। इसमें सेना प्रमुख और कमांडर आदि शामिल हैं। बजट को मंजूरी देने में भी इनकी भूमिका होती है। हमारी स्थायी समिति तो सेना प्रमुख या रक्षा मंत्री को तलब करने तक में आतंकित है। आकलन समिति ने गत सप्ताह कहा कि सन 1962 के बाद यह सबसे कम रक्षा खर्च है। 40.40 खरब रुपये का हमारा रक्षा खर्च शिक्षा या स्वास्थ्य से कहीं अधिक है और रक्षा क्षेत्र को केंद्रीय बजट का 33 फीसदी हिस्सा मिलता है। ऐसे में कम बजट वाली किसी भी बात के साथ यह भी बताया जाना चाहिए कि शिक्षा और स्वास्थ्य पर क्या खर्च किया जाता है। रक्षा व्यय बढ़ाना विकल्प नहीं है। समितियों को व्यय को समुचित बनाने पर ध्यान देना चाहिए।

नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) तकनीकी रक्षा मामलों का आकलन करता है। गत सप्ताह उसने कहा कि बोइंग पी-8 पोसेडियन समुद्री जासूसी विमान को भारतीय नौसेना ने बिना समुचित परख के खरीदा। ईएडीएस सीएएसए द्वारा निर्मित ए 319 एमएमए के लिए कहीं अधिक नीची बोली लगी थी। इससे पता चलता है कि सैन्य मामलों को लेकर किस कदर बेरुखी है। हर रक्षा विशेषज्ञ मानता है कि बोइंग पी8 अपनी श्रेणी में दुनिया का सबसे आधुनिक विमान है। बहरहाल, सीएजी की रिपोर्ट आ गई है और भारतीय नौसेना चार अन्य अनुबंधित पोसेडियन विमानों के आगमन को लेकर राजनीतिक अवसरवाद की बाट जोह रही है। सैन्य मामलों की गंभीर पड़ताल होनी चाहिए लेकिन पूरी जागरूकता भी बरती जानी चाहिए। 

एक जवाबदेह सरकार जो संसदीय निगरानी में यकीन करती है वह सदस्यों के सवालों को तवज्जो देगी। परंतु न तो पिछली सरकार की रुचि थी और न ही इस सरकार की इसमें कोई रुचि है। रक्षा मंत्रालय के पास रटारटाया जवाब है कि रक्षा क्षेत्र का आधुनिकीकरण निरंतर प्रक्रिया है और यह खतरे की अवधारणा, परिचालन चुनौतियों, तकनीकी बदलावों और उपलब्ध संसाधनों पर निर्भर करती है। इसके बाद नई रक्षा खरीद प्रक्रिया का जिक्र आता है जो वास्तव में आज भी धीमी और निष्प्रभावी है। साथ ही सामरिक साझेदार नीति, सहज मेक प्रक्रिया, उदार प्रत्यक्ष विदेशी निवेश नीति (कुल 180,000 डॉलर की राशि आई), नए ऑफसेट दिशानिर्देश और तकनीकी विकास फंड आदि का जिक्र आता है। रोचक बात यह है कि सवाल करने वाला इन बातों को मंजूर भी कर लेता है। 

सरकार ने 8 अगस्त को उदार लाइसेंसिंग मानकों पर एक सवाल का जवाब दिया:  ‘लाइसेंसिंग नीति को सुसंगत बनाया गया है। औद्योगिक लाइसेंस के लिए जरूरी चीजों की जरूरत कम की गई है। रक्षा उपकरण बनाने के लिए 230 भारतीय कंपनियों को कुल 379 लाइसेंस जारी किए गए।’ लेकिन उत्पादन मूल्य के आकलन के बिना इन आंकड़ों का कोई अर्थ नहीं। यह भी देखना होगा कि क्या इस प्रक्रिया में स्वदेशी उपकरण बने या नहीं। इसमें से कितना कुछ निर्यात होना है, कितनी चीजें देश में इस्तेमाल होनी हैं वगैरह। इसका जवाब भी खामोशी ही है। 

सांसद रक्षा क्षेत्र से जुड़े प्रश्न करते ही क्यों हैं? ऐसा भी देखने को मिला है कि ग्रामीण इलाकों से आने वाले कम चर्चित सांसद रक्षा क्षेत्र की खरीद से जुड़े ऐसे प्रश्न पूछते हैं जो वे अन्यथा शायद ही पूछते। दिसंबर 2005 में एक टीवी स्टिंग में भाजपा के 11 सांसदों, बसपा के तीन सांसदों और कांग्रेस और राजद के एक-एक सांसद को संसद में सवाल पूछने के बदले नकदी लेते रिकॉर्ड किया गया था। 

इन तमाम निराश करने वाले हालात में यह जानकर किसी को समस्या नहीं होगी कि सरकार अक्सर रक्षा क्षेत्र से जुड़े सवालों के गलत जवाब देती है। उसके आंकड़ों में अरबों रुपये का हेरफेर होता है। गत 3 जनवरी को दिए एक उत्तर में रक्षा मंत्रालय ने कहा कि वर्ष 2016-17 का पूंजीगत व्यय 68,252 करोड़ रुपये रहा। बमुश्किल एक महीने बाद 7 फरवरी को उसने इस राशि को 69,150 करोड़ रुपये करार दिया। दोनों राशियों में 900 करोड़ रुपये का अंतर है। उन्हीं उत्तरों में इससे पिछले वर्ष के आंकड़ों में क्रमश: 279 करोड़ और 106 करोड़ रुपये का अंतर आया। 

एक के बाद एक सरकारों ने इस अनुमान के आधार पर काम किया कि जनता और विपक्ष को रक्षा के बारे में जितनी कम जानकारी होगी सरकार पर उतने ही कम हमले होंगे। यह दूरदर्शिता नहीं है। रक्षा क्षेत्र शासन का एक पहलू है जहां जनता और विपक्ष को साथ रखना सबसे आवश्यक है। उनको पूरी तरह सूचित रखकर ही यह काम हो सकता है।

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