बिजनेस स्टैंडर्ड - बेहतर व्यापार नीतियों की आवश्यकता
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बेहतर व्यापार नीतियों की आवश्यकता

शंकर आचार्य /  August 16, 2018

विगत कुछ वर्षों के दौरान दो बड़े आर्थिक सुधार हुए हैं। पहला देशव्यापी एकीकृत वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी और दूसरा ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी)। वहीं दूसरी ओर इस अवधि में रुपये की वास्तविक प्रभावी विनिमय दर (आरईईआर) में लगातार तेजी आई है और उच्च सीमा शुल्क दर देखने को मिली है।

मैंने अपने पिछले आलेख में लिखा था कि आरईईआर में जनवरी 2014 और जनवरी 2018 के बीच 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है जिसने हमारे निर्यात को काफी नुकसान पहुंचाया होगा। वर्ष 2017-18 में गैर तेल निर्यात गिरकर जीडीपी के मात्र 10.2 फीसदी के बराबर रह गया है जो 15 वर्ष का सबसे निचला स्तर है। इसके अलावा व्यापार घाटा तथा चालू खाते का घाटा तेजी से बढ़ रहा है। रुपये के इस अधिमूल्यन ने वस्तुओं एवं सेवाओं के आयात में बढ़ोतरी को गति प्रदान की और हमारे नेता-बाबू वर्ग और घरेलू उद्योग जगत को संरक्षणवाद की ओर रुख करने के लिए प्रेरित किया। ये बातें कतई चकित नहीं करतीं क्योंकि रुपये के मूल्य में 20 फीसदी का इजाफा होना हर तरह के निर्यात पर 20 फीसदी कर लगने और आयात में 20 फीसदी की सब्सिडी के समान है। सरकार और आरबीआई ने ऐसा क्यों होने दिया यह अपने आप में रहस्य है।

निश्चित रूप से बीते एक वर्ष के दौरान उच्च संरक्षणवादी शुल्कों (टैरिफ) ने सुधारों के प्रति प्रतिबद्धता को प्रभावित किया है। प्रतिबद्धता यह जताई गई थी कि शुल्क दरों को पूर्वी एशियाई देशों के उन स्तर पर लाया जाएगा जो सन 1991 से मौजूद थे। उच्च संरक्षण शुल्क की दिशा में पेशकदमी की शुरुआत सन 2016 में हुई और इस फरवरी में प्रस्तुत बजट में यह चरम पर पहुंच गई। मैंने फरवरी में भी यह बात लिखी थी कि विविध जिंसों पर आयात शुल्क बढ़ाने का पश्चवर्ती प्रभाव वाला प्रस्ताव बहुत महत्त्वपूर्ण है। इन जिंसों में वाहन और उनके कलपुर्जे, मोबाइल फोन तथा उनके कलपुर्जे, कुछ प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ और तेल, सौंदर्य प्रसाधन, जूते-चप्पल, फर्नीचर, कलाई घड़ी और दीवार घड़ी, खिलौने और खेल के सामान आदि शामिल हैं।

जैसा कि जेटली ने खुद कहा भी, इससे 20 वर्ष से अधिक समय से चली आ रही आयात शुल्क कमी की स्थिति समाप्त हो जाएगी। उन्होंने कहा कि मेक इन इंडिया को बढ़ावा देने के लिए ऐसा करना आवश्यक है। सच तो यह है कि कई दशकों का वैश्विक अनुभव और हमारा अपना आर्थिक इतिहास यह दिखाता है कि शुल्क संरक्षण बहुत बुरा असर डालता है। अतीत में ऐसे कदमों ने गैर किफायती माहौल बनाया, घरेलू लागत बढ़ाई, निर्यात को नुकसान पहुंचाया, कई अन्य क्षेत्रों में शुल्क बढ़ाने का माहौल बनाया और कारोबारी साझेदारों की ओर से विरोध को आमंत्रित किया। कुल मिलाकर इससे किफायती और प्रतिस्पर्धी विनिर्माण क्षेत्र को नुकसान पहुंचा। यह बात प्रधानमंत्री द्वारा दावोस में संरक्षणवाद की तीखी आलोचना से मेल नहीं खाती है। बल्कि इससे उस प्रतिबद्घता पर भी बुरा असर पड़ सकता है जो हमने हाल ही में आसियान देशों तथा क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी वाले देशों के साथ मजबूत व्यापारिक और आर्थिक रिश्तों को लेकर जताई है। 

अनुमान के मुताबिक ही शुल्क वृद्घि ने कई उत्पाद श्रेणियों को प्रभावित किया। जुलाई में कपड़ा एवं वस्त्र क्षेत्र की 70 से अधिक वस्तुओं पर शुल्क बढ़ाया गया। अगस्त में इसी क्षेत्र की 328 अन्य वस्तुओं पर शुल्क बढ़ाने की अधिसूचना जारी हुई। इस माह के आरंभ में सरकार ने एक उच्च स्तरीय कार्यबल का गठन किया ताकि उन उत्पादों और नीतिगत हस्तक्षेपों की पहचान की जा सके जो आयात पर निर्भरता कम कर सकें। यह समिति कैबिनेट सचिव के अधीन गठित की गई है। पिछले दिनों की कारोबारी खबरों के मुताबिक कई टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुओं मसलन टेलीविजन, वॉशिंग मशीन और फ्रिज आदि पर ऐसा ही शुल्क लगाया जा सकता है। 

नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष और विदेश व्यापार नीति के जाने माने विशेषज्ञ प्रोफेसर अरविंद पानगडिय़ा यह दलील देते रहे हैं कि आयात में रियायत का मौजूदा रुख अथव्यवस्था को कमजोर स्थिति की ओर ले जाएगा। शुल्क में बढ़ोतरी से आयात में कमी आएगी लेकिन निर्यात भी कमजोर होगा। 80 वर्ष से भी ज्यादा पहले अर्थशास्त्री अब्बा लर्नर ने कहा था कि आयात पर लगने वाला कर निर्यात पर कर लगाने जैसा ही है। दलील एकदम साफ है। आयात शुल्क कीमतों और मुनाफे में अंतर पैदा करता है। शुल्क बढ़ाने से घरेलू उत्पादकों का मुनाफा बेहतर होता है। अगर यह शुल्क स्टील, टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुओं के कलपुर्जों या कपड़े से जुड़े कच्चे माल पर लगता है तो निर्यात की लागत भी बढ़ जाती है और आयात प्रतिस्पर्धी उत्पादन की लागत भी। इस तरह पूरा उद्योग ही उच्च लागत वाला बन जाता है। संक्षेप में कहें तो आयात शुल्क और निर्यात कर दोनों ही कारोबार को हतोत्साहित करते हैं। जरूरी नहीं कि ये व्यापार घाटे को कम करें। ये विनिर्माण क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा को कतई बढ़ावा नहीं देते। 

इतना ही नहीं व्यापार (खासतौर पर निर्यात) की उच्च वृद्घि आमतौर पर राष्ट्रीय उत्पादन में उच्च वृद्घि और रोजगार से संबद्घ होती है। सन 1950 से 1980 के दशक के बीच जब देश की व्यापार वृद्घि धीमी थी तब हमारी आर्थिक वृद्घि की वार्षिक दर औसतन 4 फीसदी से कम थी। सन 1991 के बाद से उच्च व्यापार वृद्घि के दौर (सन 1992 से 1997 और 2003 से 2011) में आर्थिक वृद्घि की दर भी बहुत तेज रही। 

अगर शुल्क वृद्घि कम व्यापार घाटे और प्रतिस्पर्धी विनिर्माण क्षेत्र के लिए गलत है तो फिर सरकार और आरबीआई आखिर किन वैकल्पिक नीतियों को आगे बढ़ा सकते हैं? उन्हें रुपये के भारी भरकम अधिमूल्यन को कम करना होगा। जनवरी 2014 से जनवरी 2018 के बीच रुपये का अधिमूल्यन होने देना गलत नीति थी। कुछ हद तक देखा जाए तो पिछले कुछ महीनों में अवमूल्यन हो भी रहा है। बाहरी भुगतान की स्थिति दबाव में है क्योंकि निर्यात में ठहराव है और आयात बढ़ रहा है। यह गिरावट जारी रहनी चाहिए। भारी भरकम विदेशी मुद्रा भंडार का इस्तेमाल रुपये के अवमूल्यन में किया जाना चाहिए। इससे दोनों लक्ष्य हासिल करने में मदद मिलेगी। 

बेहतर विनिमय दर नीति को अपनाने से बड़े क्षेत्रीय व्यापार समझौतों में हमारी भागीदारी सुधारने में भी मदद मिलेगी। खासतौर पर रीजनल कांप्रिहेंसिव इकनॉमिक पार्टनरशिप (आरसीईपी)। संरक्षणवाद समर्थक घरेलू लॉबियों को आरसीईपी से कोई लगाव नहीं है। उन्हें लगता नहीं कि आज की तारीख में इनका कोई महत्त्व है। डब्ल्यूटीओ आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यापार व्यवस्था पहले ही खतरे में पड़ चुकी है। ऐसे में आरसीईपी में भागीदारी दीर्घावधि के दौरान देश की अंतरराष्ट्रीय व्यापार और समृद्घि को अहम संरक्षण प्रदान कर सकती है। इनसे बाहर रहना दीर्घावधि में हमारे हित में नहीं होगा।
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