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भारतीय राजनीति में अटल युग का अवसान

आदिति फडणीस / नई दिल्ली 08 16, 2018

अटल बिहारी वाजपेयी (1924-2018)
बिजनेस स्टैंडर्ड भारतीय राजनीति में अटल युग का अवसानक्या वह खुद तक सीमित रहने वाले व्यक्ति थे? हां, लेकिन जिस तरह उन्होंने अपनी जिंदगी जी, उससे कभी आप यह अंदाजा नहीं लगा पाते। अगर पूछें कि क्या वह सार्वजनिक जीवन जीने वाले व्यक्ति थे? तो जवाब होगा हमेशा नहीं। उनकी राजनीतिक चालें, खासकर अपने विरोधियों के खिलाफ, इतनी परोक्ष और रहस्यमय लेकिन इतनी तीखी होती थी कि वे इससे संभल भी नहीं पाते थे। 

देश के सबसे चहेते नेताओं और ओजस्वी वक्ताओं में से एक तथा दसवें प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का आज अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में निधन हो गया। डॉक्टरों के मुताबिक 93 वर्षीय नेता ने शाम पांच बजकर पांच मिनट पर अंतिम सांस ली। एक डॉक्टर ने समाचार एजेंसी को बताया कि वाजपेयी को न्यूमोनिया था और उनके कई अंगों ने काम करना बंद कर दिया था। सरकार ने उनके निधन पर सात दिन के राजकीय शोक की घोषणा की है। गृह मंत्रालय ने कहा कि इस दौरान राष्टï्र ध्वज आधा झुका रहेगा। उनका अंतिम संस्कार शुक्रवार शाम 4 बजे दिल्ली के स्मृति स्थल पर राजकीय सम्मान के साथ किया जाएगा। 

वाजपेयी का जन्म 25 दिसंबर, 1924 को मध्य प्रदेश के ग्वालियर में ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम कृष्ण बिहारी वाजपेयी और मां का नाम कृष्णा देवी था। वाजपेयी ने कानपुर के डीएवी कॉलेज से कानून की पढ़ाई की थी। जब उन्होंने इस पाठ्यक्रम में दाखिला लिया था तो स्कूल में शिक्षक उनके पिता ने कहा कि वह भी कानून की पढ़ाई करना चाहते हैं। पिता-पुत्र का दाखिला एक ही कक्षा में हुआ और वे छात्रावास में एक ही कमरे में रहते थे। जब दूसरे छात्र ने पिता-पुत्र के बारे में बातें करने लगे तो उन्हें अलग-अलग वर्गों में रखा गया। लेकिन वाजपेयी के साथ पढऩे वाले याद करते हैं कि वे शाम को मिलकर खाना बनाया करते थे। यही वे दिन थे जिन्होंने वाजपेयी को चटोरा बनाया था। उन्हें खासकर मालपुए बहुत पसंद थे। आपातकाल के दौरान जब वाजपेयी को चंडीगढ़ जेल में रखा गया था तो उन्हें मुख्य रसोइया बनाया गया था।

वाजपेयी ने राजनीति का ककहरा श्यामा प्रसाद मुखर्जी से सीखा और 1957 में वह पहली बार संसद सदस्य बने। इसी दौरान उन्हें देश को बेहद करीब से समझने जानने का मौका मिला और उन्होंने कई ऐसे दोस्त बनाए जो ताउम्र उनके साथ रहे। 1953 में जब मुखर्जी ने कश्मीर में आमरण अनशन किया था तो वाजपेयी उनके साथ थे। मुखर्जी कश्मीर जाने के लिए परमिट की अनिवार्यता और मुस्लिम बहुल होने के कारण कश्मीर को दिए गए विशेष दर्जे का विरोध कर रहे थे। 

मुखर्जी को जेल में डाल दिया गया जहां कमजोरी और बीमारी के कारण उनका निधन हो गया। उनके अंतिम संस्कार पर वाजपेयी फूट-फूटकर रोए थे। यह उनकी राजनीति के लिए निर्णायक क्षण था। कई साल तक वाजपेयी पहले जनसंघ में और फिर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के साथ राजनीतिक हाशिये पर रहे। उन दिनों पार्टी के पास बहुत कम संसाधन थे और संगठन मजबूत नहीं था। वाजपेयी और भैरों सिंह शेखावत जैसे नेता दो और कभी-कभी तीन सीटों से चुनाव लड़ते थे। कुछ स्थानों पर उनकी जीत होती थी और कहीं हार। दोहरी सदस्यता के मुद्दे पर जनता पार्टी से अलग होने पर भी जनसंघ या भाजपा को किसी ने भी भारत की हिंदूवादी दक्षिणपंथी पार्टी के तौर पर नहीं देखा था। मोरारजी देसाई के नेतृत्व वाली जनता पार्टी सरकार में वाजपेयी विदेश मंत्री थे। 

1960 के दशक में दिल्ली का सांसद रहते हुए वाजपेयी बीएन कौल के संपर्क में आए जो दिल्ली के रामजस कॉलेज में लेक्चरर थे। जब कौल का निधन हुआ तो वाजपेयी ने उनके परिवार को अपना लिया। उनके निजी जीवन को लेकर बहुत बातें हुईं लेकिन वाजपेयी ने हमेशा इसे नजरअंदाज किया। लाल कृष्ण आडवाणी के साथ उनके रिश्ते एक अबूझ पहेली की तरह थे। आडवाणी शुरुआत में वाजपेयी को लेकर थोड़ा सतर्क रहते थे। लेकिन यह आडवाणी ही थे जिन्होंने सबसे पहले यह प्रस्ताव रखा था कि अगर भाजपा सत्ता में आती है तो वाजपेयी प्रधानमंत्री बनेंगे। 

वाजपेयी राजनीति में भाव भंगिमा के माहिर थे और इसका मतलब निकालने का काम दूसरों पर छोड़ देते थे। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए रथ यात्रा निकालकर आडवाणी ने अपना कद बढ़ा लिया था। वह वाजपेयी से आगे भले ही नहीं निकले थे लेकिन उनके समकक्ष आ गए थे। आडवाणी की रथ यात्रा को लेकर वाजपेयी खुश नहीं थे। एक बार उन्होंने टिप्पणी की थी, ‘देखो, आडवाणीजी की वानर सेना जा रही है।’ बाबरी मस्जिद विध्वंस के दौरान वाजपेयी कहीं नजर नहीं आए। उनकी राजनीति का यह दूसरा पहलू गोधरा कांड के बाद हुए दंगों में भी देखने को मिला था। जब वह गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से मिले थे तो उन्होंने उन्हें राजधर्म निभाने की नसीहत दी थी। 

संघ के पूर्व प्रचारक मोदी को घूमने खासकर अमेरिका जाने का बड़ा शौक था। एक बार जब करीब चार महीने वह अमेरिका में थे और उन्हें वहां वाजपेयी से मिलने का मौका मिला। वाजपेयी आधिकारिक दौरे पर वहां गए थे। वाजपेयी ने उनसे पूछा, ‘स्वदेश वापस आने का विचार है।’ इस पर मोदी सकपका आ गए थे और उन्होंने हकलाते हुए कुछ कहा था। संभवत: यह मोदी के जीवन में एकमात्र मौका था जब वह हकलाए थे। यह वाजपेयी ही थे जो मोदी की दंगों से निपटने की शैली की आलोचना कर सकते थे। लेकिन जब हिमाचल प्रदेश के कद्दावर नेता शांता कुमार ने सार्वजनिक तौर पर वाजपेयी का समर्थन करने की कोशिश की तो उन्हें केंद्र सरकार से हटा दिया गया।

वाजपेयी ने पाकिस्तान के साथ रिश्ते सुधारने के लिए बहुत कोशिशें कीं। वर्ष 2009 में वाजपेयी ऐसी दुनिया में चले गए थे जहां वह अकेले थे। इनमें उनके करीबी मित्र, संघर्ष के साथी और उनकी सरकार में रक्षा मंत्री रहे जॉर्ज फर्नाडिस और जसवंत सिंह शामिल हैं। कारगिल युद्घ में ताबूतों की खरीद में भ्रष्टाचार का आरोप लगने के बाद वाजपेयी ने फर्नांडिस को पद से हटा दिया था लेकिन बाद में उच्चतम न्यायालय ने पाया कि इन आरोपों में लेशमात्र भी सच्चाई नहीं थी। जसवंत सिंह वाजपेयी सरकार में वित्त, रक्षा और विदेश मंत्री रहे थे। वाजपेयी उन्हें अपने तीन करीबी दोस्तों में से एक मानते थे। बाकी दो दोस्त ब्रजेश मिश्र और एन एम घटाटे थे। वाजपेयी के जाने से एक ऐसे दौर का अंत हो गया है जो विनम्र और निश्चित रूप से ज्यादा उदार था।

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