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पारिस्थितिकी संकट से वापसी मुश्किल

श्याम सरन /  August 14, 2018

इन गर्मियों में यूरोप और यूरोप के समशीतोष्ण क्षेत्र के वनों में भीषण आग लगी। स्पेन में तापमान 47 डिग्री सेल्सियस तक जा पहुंचा। यह यूरोप के अपेक्षाकृत ठंडे इलाके के बजाय राजस्थान के रेतीले इलाकों से अधिक मेल खाता है। जापान के कई हिस्सों में भारी बाढ़ आई।

दुनिया भर में चक्रवात और तूफान की आवृत्ति और उनकी तीव्रता में बढ़ोतरी हुई है। वैश्विक तापमान में तेज इजाफा हुआ है। विश्व इतिहास के 17 सबसे गर्म वर्ष 2001 के बाद सामने आए हैं। बर्फ और ग्लेशियर के पिघलने की घटनाओं में भी तेजी आई है। नासा के मुताबिक अंटार्कटिका में पिघलने वाली बर्फ की मात्रा वर्ष 2012 के बाद से तीन गुनी हो चुकी है। इतने कम समय में ही समुद्री जल स्तर में 3 मिमी का इजाफा देखने को मिला है। नासा का अनुमान है कि वर्ष 2012 के पहले दुनिया के ग्लेशियर और बर्फ के पिघलने की दर 76 अरब टन वार्षिक थी। वर्ष 2012 के बाद से यह दर 219 अरब टन वार्षिक हो चुकी है। 

वहीं समुद्री जल स्तर 0.3 मिमी वार्षिक के वैश्विक स्तर से दोगुना बढक़र 0.6 मिमी वार्षिक हो गया है। इस दृष्टिï से देखें तो फिलहाल जितनी भी बर्फ अंटाकर्टिका में बर्फ की चादरों में लिपटी हुई है, वह अगर पिघल कर समुद्र में मिल जाए तो समुद्र के स्तर में 58 मीटर का इजाफा होगा और दुनिया के अधिकांश प्रमुख शहर, तटीय इलाके और द्वीप डूब जाएंगे। 

वैश्विक तापवृद्घि का संबंध पृथ्वी के वातावरण में एकत्रित ग्रीन हाउस गैसों से है जिनमें कार्बन डाइऑक्साइड प्रमुख है। नासा के मुताबिक मौजूदा घनत्व 408 पीपीएम (पाट्र्स पर मिलियन) है। मौजूदा औद्योगिक युग की शुरुआत के पहले यह 280 पीपीएम था। सन 1880 से तुलना करें तो औसत वैश्विक तापमान में एक डिग्री सेल्सियस का इजाफा हो चुका है। वैज्ञानिक इस बात पर एकमत हैं कि अगर तापमान 2 डिग्री सेल्सियस से अधिक बढ़ा तो बहुत बड़ी आपदा आ सकती है। हमारी पृथ्वी की पारिस्थितिकी को ऐसा नुकसान हो सकता है जिसे सुधारना संभव नहीं होगा।

हालांकि 2 डिग्री सेल्सियस की वृद्घि और कार्बन उत्सर्जन के घनत्व के रिश्ते को लेकर अस्पष्टïता है लेकिन 480 पीपीएम के आंकड़े पर सब सहमत हैं। यानी अगर वातावरण में मौजूद कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में 72 पीपीएम का इजाफा और होता है तो पर्यावरण को इस कदर नुकसान हो जाएगा कि उसमें सुधार करना संभव नहीं रह जाएगा। 

परंतु ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो एक डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी में ही हम संकट में हैं।  आशंका तो यही है कि हमारा खराब भविष्य एकदम करीब आ चुका है। ऐसा इसलिए क्योंकि जलवायु में होने वाला परिवर्तन दुनिया भर में बड़े पैमाने पर पर्यावरण को पहुंच रही क्षति से जुड़ा हुआ है। समुद्रों में लाखों टन अपघटनीय प्लास्टिक का कचरा डाला जा रहा है। हमारे वन खत्म हो रहे हैं और नदियां रासायनिक गंदे नाले में बदल रही हैं।

शहरी कचरे के ढेर मीथेन के खतरनाक भंडार बन चुके हैं। जलवायु परिवर्तन को लेकर इनका प्रभाव कार्बन डाइऑक्साइड से भी अधिक है। जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण के स्तर में आ रही गिरावट का गहरा संबंध है जो दोनों के असर को बढ़ा रहा है। 

यह तब है जबकि हम पृथ्वी के पर्यावास में घटित हो रही अन्य चिंताजनक बातों को ध्यान में रखकर बात नहीं कर रहे हैं। जलवायु परिवर्तन को लेकर किए गए हालिया अध्ययन के मुताबिक करीब 20-30 प्रतिशत पौधे और जीव प्रजातियां विलुप्त होने के जोखिम की शिकार हैं।

इसमें मानवीय घुसपैठ और ताप वृद्घि के कारण हमारी आदतों में हो रहा बदलाव दोनों शामिल हैं। यह ध्यान देने वाली बात है कि वैश्विक तापवृद्घि की समस्या वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड और ग्रीन हाउस गैसों के एकत्रित होने से उपजी है। फिलहाल हो रहा उत्सर्जन इन गैसों के भंडार में और इजाफा कर रहा है लेकिन वह अपने आप में वैश्विक तापवृद्घि की वजह नहीं है। 

इतना ही नहीं, चूंकि कार्बन उत्सर्जन का भंडार कई दशकों में बहुत धीरे-धीरे पर्यावरण में घुलता है इसलिए अगर इसमें बढ़ोतरी को समाप्त भी कर दिया जाए तो भी वैश्विक तापवृद्धि का सिलसिला जारी रहेगा और इसके परिणाम दीर्घावधि के होंगे। इस लिहाज से देखें तो पेरिस जलवायु परिवर्तन समझौते में कार्बन उत्सर्जन कम करने पर जो जोर दिया गया है वह इस समस्या का आंशिक उत्तर ही देता है।

पर्यावरण में आ रही गिरावट को पलटना भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि बिगड़ता पर्यावरण जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कई गुना बढ़ा देता है। उदाहरण के लिए व्यापक प्रदूषण के चलते समुद्र की कार्बन डाइऑक्साइड खपत करने की क्षमता कम हुई है।

वैज्ञानिक प्रगति और हमारे रोजमर्रा के अनुभवों ने यह जागरूकता बढ़ाई है कि हम सब आपस में पूरी तरह संबद्ध पारिस्थितिकी में निवास करते हैं। यहां एक हिस्से में पैदा हुई समस्या अन्य हिस्सों के लिए परेशानी बन सकती है। संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य इसे समझते हैं लेकिन अधिकांश अंतरराष्ट्रीय बहस और मानक निर्धारण अभी भी इससे दूर हैं। विभिन्न देश अपने हितों की रक्षा के लिए काम करते हैं, वे अपने दायित्व कम करना चाहते हैं और पूरा बोझ दूसरों पर डालना चाहते हैं। जलवायु परिवर्तन पर भी यही बात लागू होती है।

दशकों से जीवाश्म ईंधन जलाकर कार्बन डाइऑक्साइड को मौजूदा स्तर पर पहुंचाने के के उत्तरदायी देश अपनी ऐतिहासिक जवाबदेही स्वीकार करने से इनकार कर रहे हैं। वे भारत जैसे देशों से अपेक्षा कर रहे हैं कि वे अपने विकास की संभावनाओं को तिलांजलि देकर जलवायु परिवर्तन का मुकाबला करें। 

द इकनॉमिस्ट पत्रिका ने अपने ताजा अंक में भारत की आलोचना की है कि उसे कोयले से ज्यादा ही लगाव है और यह बात जलवायु परिवर्तन से निपटने में बाधक बन रही है। हकीकत में भारत की कोयला आधारित ताप विद्युत क्षमता आज भी केवल 192 गीगावॉट है जबकि चीन में यह 940 गीगावॉट है और वह 200 गीगावॉट क्षमता तैयार कर रहा है।

जापान ने बीते दो वर्ष में आठ नए संयंत्र लगाए हैं और अगले एक दशक में 36 नए संयंत्र लगाने जा रहा है। सन 2030 तक कोयला आधारित विद्युत उत्पादन कुल उत्पादन का 26 फीसदी होगा जबकि लक्ष्य 10 फीसदी का है। भारत को खुद को निशाना बनाए जाने से तो बचना ही होगा, साथ ही एक व्यापक पारिस्थितिकी समझौते के लिए काम करना होगा जो विश्व के पर्यावास को बचाने में सहायक हो, बजाय कि केवल जलवायु परिवर्तन से निपटने के। फिलहाल तो मनुष्य के अस्तित्व को ही चुनौती उत्पन्न हो गई है। ऐसे में इस पहल को तत्काल उठाया जाना अनिवार्य हो चुका है।

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