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सख्त अनुशासन और निष्पक्ष कार्यवाही के लिए रहेंगे याद

अर्चिस मोहन /  08 13, 2018

स्‍मृति शेष : सोमनाथ चटर्जी (1929-2018)
बिजनेस स्टैंडर्ड सख्त अनुशासन और निष्पक्ष कार्यवाही के लिए रहेंगे यादलोकसभा के पूर्व अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी का सोमवार की सुबह निधन हो गया। चटर्जी करीब 40 सालों तक माकपा के सदस्य रहे और उन्होंने संसद में 10 बार पार्टी का प्रतिनिधित्व किया। लेकिन उनकी पार्टी को उनके निधन पर शोक प्रकट करने के लिए एक बयान जारी करने में करीब पांच घंटे लग गए। हालांकि उस बयान में एक बार भी यह जिक्र नहीं किया गया कि वह पार्टी के सदस्य थे। इस बयान ने उस पार्टी की मानसिकता को ज्यादा जाहिर किया जिसे कभी ज्योति बसु, हरकिशन सिंह सुरजीत और खुद चटर्जी जैसे नेताओं ने तैयार किया था।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने पूरे सम्मान के साथ चटर्जी को श्रद्धांजलि दी। माकपा के लोकसभा सदस्य मोहम्मद सलीम पार्टी के ऐसे दुर्लभ वरिष्ठ नेता थे जिन्होंने चटर्जी के निधन के कुछ वक्त बाद और पार्टी से पहले ही उन्हें सार्वजनिक श्रद्धांजलि दे दी। सलीम ने ट्वीट किया, ‘मैंने पिता सरीखे व्यक्ति को खो दिया है। मैं सोमनाथ चटर्जी को श्रद्धांजलि देता हूं जिनका मैं ऋणी हूं। मैं महान नेता को सलाम करता हूं।’

पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने दिल को छू लेने वाली श्रद्धांजलि व्यक्त करते हुए कहा, ‘वह संविधान विशेषज्ञ होने के साथ एक उत्कृष्ट सांसद रहे हैं। वह लोगों के हितों के प्रति प्रतिबद्ध बने रहे और व्यावहारिक सर्वसम्मति में उनका अटूट विश्वास था। उनके निधन से मैंने अपना एक दोस्त खोया है और देश ने अपना एक महान सपूत खोया है।’

मीडिया में चर्चा होने के बाद माकपा ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की जिसे मीडिया को दोपहर 1 बजकर 46 मिनट पर भेजा गया। चटर्जी का निधन कोलकाता के अस्पताल सुबह 8.15 बजे हो गया। माकपा के पोलित ब्यूरो ने अपने बहुप्रतीक्षित बयान में लिखा, ‘पूर्व लोकसभा अध्यक्ष और 10 बार लोकसभा के सदस्य रहे सोमनाथ चटर्जी के निधन पर दुख है।’ इस बयान में कहा गया कि दिग्गज सांसद चटर्जी ने भारतीय संविधान की नींव की हिफाजत करने में अहम भूमिका निभाई खासतौर पर धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक नींव और संघवाद में उनकी भूमिका रही। लेकिन माकपा के बयान में इस बात का जिक्र एक बार भी नहीं किया गया कि वह पार्टी और इससे संबद्ध विभिन्न संगठनों से 40 सालों तक जुड़े रहे और उन्होंने पार्टी के विभिन्न श्रमिक संगठनों के साथ काम किया। 

अगस्त 2003 में चटर्जी ने गैर-भाजपाई विपक्षी नेताओं को एक साथ लाने और तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के साथ उनके आवास पर मुलाकात कराने में अहम भूमिका निभाई थी। इस बैठक से आखिरकार संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन बना। 

पांच सालों के बाद प्रकाश करात के नेतृत्व में माकपा ने 2008 में भारत-अमेरिका परमाणु समझौते से जुड़े सवालों को लेकर मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली संप्रग (संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन) की पहली पारी की सरकार से समर्थन वापस लिया। माकपा चाहती थी कि चटर्जी भी लोकसभा अध्यक्ष का पद छोड़ दें लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया और इसी वजह से उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया गया। बाद में 2015 में जब सीताराम येचुरी ने माकपा की कमान संभाली तब उन्होंने चटर्जी की पार्टी में फिर से वापसी करने के लिए पेशकश की थी। लेकिन चटर्जी इस बात पर अड़े रहे कि उन्होंने 2008 में अपने विवेक का अनुसरण करते हुए फैसला किया था। चटर्जी किसी और पार्टी से भी नहीं जुड़े। उन्होंने कांग्रेस के साथ गठबंधन न करने के लिए करात की आलोचना भी की।

जनवरी 2018 में चटर्जी ने कहा कि 2019 के लोकसभा चुनावों के लिए कांग्रेस के साथ माकपा के गठबंधन न करने के फैसले की वकालत कर प्रकाश करात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा की मदद कर रहे हैं। चटर्जी ने जीवनभर गरीबों की जिंदगी में सुधार के लिए प्रतिबद्धता जताईं और वह संघ परिवार से संघर्ष करते रहे।

वह 1994 से 2004 तक पश्चिम बंगाल औद्योगिक विकास निगम के अध्यक्ष बने रहे। वर्ष 1929 को जन्मे चटर्जी ने अपने पिता निर्मल चंद्र चटर्जी का अनुसरण, पढ़ाई, वकालत और बाद में राजनीति में किया। उनके पिता एक बार अखिल भारतीय हिंदू महासभा के अध्यक्ष थे जबकि वह माकपा से जुड़े। 1971 में चटर्जी ने माकपा के समर्थन से एक स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर बोलपुर लोकसभा सीट से जीत हासिल कर अपने पिता की जगह ले ली। बाद में 1984 के लोकसभा चुनावों में जाधवपुर सीट से उभरती तत्कालीन कांग्रेस नेता ममता बनर्जी ने उन्हें हराया। 

सदन की कार्यवाही का टेलीविजन प्रसारण कराने, पैसे लेकर संसद में सवाल पूछने के मामले में सदस्यों को निष्कासित करने और सदन की निष्पक्ष कार्यवाही के लिए लोकसभा अध्यक्ष के तौर पर चटर्जी को याद किया जाएगा।
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