बिजनेस स्टैंडर्ड - मराठा आरक्षण आंदोलन के कई चेहरे
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मराठा आरक्षण आंदोलन के कई चेहरे

अभिषेक वाघमारे /  08 13, 2018

आरक्षण आंदोलन

हाल में सरकारी नौकरियों की भर्ती प्रक्रिया के मद्देनजर उग्र मराठा युवा
सामान्य श्रेणी में आरक्षण की मांग कर रहे हैं

बिजनेस स्टैंडर्ड मराठा आरक्षण आंदोलन के कई चेहरेकई साल पहले सन 1978 में महाराष्ट्र के मराठा समुदाय में राजनीतिक प्रभुत्व को शरद पवार ने बदल दिया था। जाति से मराठा लेकिन उसकी कई परंपराओं का पालन नहीं करने वाले 38 साल के युवा मुख्यमंत्री मराठा अभिजात वर्ग का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। इसके दो दशक बाद राज्य को मनोहर जोशी के रूप में पहला ब्राह्मण मुख्यमंत्री मिला, जिन्हें अगले राज्य विधानसभा चुनाव में सत्ता गंवानी पड़ी। इस हार के कई कारण रहे जिनमें जाति भी प्रमुख था और इसने तटीय कोंकण से मराठा नेता नारायण राणे का रास्ता तैयार किया। 

वर्ष 2018 में महाराष्ट्र को देवेंद्र फडणवीस के रूप में दूसरा ब्राह्मण मुख्यमंत्री मिला। इस बीच जाति न सिर्फ राज्य की राजनीति का केंद्र बन गई, बल्कि यह समाज में मनौवेज्ञानिक स्तर पर काफी गहरी जड़ें जमा चुकी थीं। प्रमुख रूप से शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण के लिए हो रहे मराठा आंदोलन की विशेषता शहरों और कस्बों में शांतिपूर्ण धरना और जुलूस निकालना रहा। सितंबर 2016 से इस शांतिपूर्ण जुलूस की शुरूआत हुई और पिछले साल 9 अगस्त को 58वां शातिपूर्ण जुलूस निकाला गया। ठीक एक साल बाद, पिछले सप्ताह इस आंदोलन ने हिंसात्मक रूप ले लिया और सरकारी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया गया। मुंबई, पुणे, उस्मानाबाद और मराठवाड़ा क्षेत्र के दूसरे कस्बों से कई प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार किया गया। रिपोर्ट के अनुसार आंदोलन के चलते पिछले कुछ महीनों में लगभग 18 मराठा युवाओं ने आत्महत्या की है। 

कानूनी लड़ाई

बिजनेस स्टैंडर्ड मराठा आरक्षण आंदोलन के कई चेहरेमराठा राज्य की कुल जनसंख्या का लगभग 30 प्रतिशत हैं और महाराष्ट्र में अपना प्रभुत्व रखते हैं। हाल ही में 72,000 सरकारी नौकरियों की भर्ती प्रक्रिया के मद्देनजर उग्र मराठा युवा सामान्य श्रेणी में आरक्षण की मांग कर रहे हैं। मंडल आयोग से पहले किसी जाति को अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल करने का अधिकार राज्यपाल (अप्रत्यक्ष तौर पर राज्य सरकार) के पास था। 1992 के इंदिरा साहनी मामले के बाद केंद्र और राज्य स्तर पर पिछड़ा वर्ग आयोग का प्रावधान कर दिया गया लेकिन महाराष्ट्र ने वर्ष 2005 में आयोग को विधायी दर्जा दिया। 

धीमी गति से काम के बाद भी 2005 में बना आयोग डेटा जुटाने और विवेचना करने में भी काफी कमजोर रहा। मामले के जानकार एक वकील ने बताया कि इसके बाद भी ये रिपोर्ट राज्य विधानसभा के सामने पेश नहीं की गई। बंबई उच्च न्यायालय ने नारायण राणे समिति की सिफारिशों को अस्वीकार कर दिया, जिसे कांग्रेस सरकार ने मराठा आरक्षण के मामले पर अध्ययन के लिए बनाया था। इसने 2 सप्ताह से भी कम समय में 18 लाख लोगों के आंकड़ों पर अध्ययन किया था। पुणे के एक आंदोलनकारी ने कहा, ‘कांग्रेस-राकांपा सरकार और भाजपा , किसी ने भी आयोग और न्यायालय के सामने समुदाय की मांगों को सही तरीके से व्यक्त नहीं किया। अब हमारे पास केवल एक विकल्प बचा है, सडक़ों पर प्रदर्शन करना।’

शक्ति संतुलन

बिजनेस स्टैंडर्ड मराठा आरक्षण आंदोलन के कई चेहरेसावित्रीबाई फूले पुणे यूनिवर्सिटी के अभय दातार और विवेक घोताले द्वारा महाराष्ट्र के कैबिनेट मंत्रियों के सामाजिक और क्षेत्रीय प्रोफाइल पर किए गए शोध के अनुसार राज्य कैबिनेट में मराठा नेताओं की भागीदारी 1999-2004 के बीच 62 प्रतिशत थी, जो हालिया कैबिनेट में घटकर 44 प्रतिशत रह गई। राज्य की ऊंची जातियों और उसके इर्द-गिर्द की जातियों में बेहतर प्रतिनिधित्व के लिए गैर-कांग्रेसी सरकारें मंत्रियों के बीच सामाजिक संतुलन का प्रदर्शन कर रही हैं। मनोहर जोशी कैबिनेट (1995-1999) में अगड़ी जातियों का प्रतिनिधित्व मराठों से ज्यादा था। दूसरी ओर, 1999 से 2014 तक तीन बार लगातार कांग्रेस-राकांपा गठबंधन वाली सरकारें और आपातकाल से पहले के समय में राज्य कैबिनेट में सबसे अधिक मराठा मंत्री थे।

पिछड़ापन?

पुणे स्थित गोखले इंस्टीट्यूट ऑफ पॉलिटिक्स एंड इकनॉमिक्स ने मराठा समुदाय में पिछड़ेपन और उस पर सरकार के निर्देशों को लेकर एक अध्ययन किया। इसमें मजदूरों और आत्महत्या करने वाले किसानों में मराठाओं के शामिल होने जैसे कारक रखे गए। अध्ययन में पाया गया कि आत्महत्या करने वाले किसानों में 26 प्रतिशत मराठा थे, जो किसी भी एक समुदाय से सर्वाधिक थे। हालांकि यह भी पाया गया कि सिंचाई की अनुपलब्धता आत्महत्या का सबसे बड़ा कारण था। मराठवाड़ा के 84 प्रतिशत और विदर्भ के 90 प्रतिशत किसान बिना सिंचाई वाले खेत जोत रहे थे। अध्ययन में बताया गया कि आरक्षित श्रेणी के मजदूरों से तुलना करने पर मराठा मजदूर अधिक पढ़े-लिखे और कर्ज आदि कई वित्तीय सेवाओं का लाभ ले रहे थे। 

कमजोर राजनीतिक प्रभाव

बिजनेस स्टैंडर्ड मराठा आरक्षण आंदोलन के कई चेहरेमराठा समुदाय द्वारा राकांपा और कांग्रेस को समर्थन की आम मान्यता के इतर राजनीतिक विश्लेषक सुहास पलशिकर ने 2014 में सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज के आंकड़ों का अध्ययन करके बताया कि 2014 चुनाव में मराठाओं के बहुत से मत शिवसेना और बीजेपी को मिले थे। कांग्रेस और राकांपा का समुदाय में एकजुटता दिखाने का यह एक कारण हो सकता है। एक सूत्र ने बताया कि महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस समिति प्रमुख अशोक चव्हाण और पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने सरकार के खिलाफ बड़ी संख्या में इस्तीफे की बात कही थी, लेकिन कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व ने इसे नकार दिया। 

सरकार में मराठा नेता, शिवसंग्राम संस्था के संचालक और शिवाजी मेमोरियल कमेटी के अध्यक्ष विनायक मेते तीन दशक से आरक्षण की लड़ाई लड़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि सरकार ने मराठाओं और ओबीसी उद्यमियों को वित्तीय सहायता तथा छात्रों को हॉस्टल और छात्रवृत्तियां देकर इस दिशा में एक कदम बढ़ाया है। लेकिन वह मानते हैं कि इसके पालन में काफी शिथिलता देखी जा रही है। उन्होंने कहा, ‘विपक्षियों की एकजुटता केवल आगामी चुनावों को लेकर उठाया गया एक कदम है।’ अब महाराष्ट्र राज्य पिछड़ा जाति आयोग की आने वाली रिपोर्ट पर सभी की नजरें टिकी हैं। राज्य में मराठाओं पर अध्ययन पर केंद्रित यह रिपोर्ट 15 नवंबर तक सामने आएगी।

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