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लाभांश के बजाय निवेश को टुकड़ों में भुनाएंगे तो आसानी से बचेगा कर

तिनेश भसीन /  August 12, 2018

प्रियेश पटेल अपने म्युचुअल फंड वितरक के पास पहुंचे और उससे बैलेंस्ड फंड में लाभांश के विकल्प को वृद्घि के विकल्प में बदलने के लिए कहा। पटेल को फंड में निवेश करते हुए तकरीबन 4 साल हो चुके हैं। उनके वितरक ने उन्हें कोई फेरबदल नहीं करने और लाभांश विकल्प के साथ ही बने रहने की सलाह दी।

वितरक का कहना था कि लाभांश विकल्प छोडक़र वृद्घि के विकल्प में आने का मतलब यह माना जाएगा कि पुरानी यूनिटों को बेचकर नई यूनिट खरीदी गई हैं और पुरानी यूनिटों की बिक्री पर लाभांश वितरण कर मांगा जाएगा। वृद्घि के विकल्प में जाने के लिए नए सिरे से निवेश करना पड़ेगा। वितरक ने पटेल को समझाया कि चाहे यूनिट बेचने पर कर लगे या लाभांश पर कर लगे, उसकी दर 10 फीसदी ही रहेगी।

कर के मामले में तो वितरक ने बिल्कुल सही बात कही, लेकिन उसने यह नहीं बताया कि लाभांश का विकल्प अपनाने पर लंबी अवधि में ज्यादा कर नहीं बच सकेगा। वितरक ने इस बात पर भी ध्यान नहीं दिया कि यदि किसी वित्त वर्ष के दौरान इक्विटी निवेश पर होने वाला कुल लाभ 1 लाख रुपये से कम होता है तो निवेशक को दीर्घावधि पूंजीगत लाभ ‘एलटीसीजी’ कर नहीं देना पड़ता। अरविंद राव ऐंड एसोसिएट्स के संस्थापक अरविंद राव ने कहा, ‘छोटे निवेशकों को जो राहत मुहैया कराई गई है, उससे उन्हें अपने करों पर नियंत्रण करने और उनका बेहतर नियोजन करने में मदद मिलती है। यही वजह है कि छोटे निवेशकों के लिए लाभांश का विकल्प छोडक़र फौरन वृद्घि के विकल्प में जाना ही समझदारी है।’

मान लेते हैं कि पिछले 4 साल के दौरान बैलेंस्ड फंड में निवेश कर पटेल ने 31 जनवरी, 2018 तक 5 लाख रुपये जमा कर लिए हैं। एलटीसीजी का हिसाब लगाते समय निवेशक को देखना होगा कि 31 जनवरी, 2018 को फंड की कीमत क्या थी। फिर उसे देखना होगा कि उस तारीख के बाद उसे कितना मुनाफा हुआ है। माना कि उसकी रकम में उसके बाद से 5 फीसदी का इजाफा हुआ है। अब अगर पटेल अपनी यूनिट बेचते हैं यानी निवेश भुनाते हैं तो 31 जनवरी, 2018 के बाद से उनका मुनाफा केवल 25,000 रुपये रहेगा। 

अगर पटेल को शेयरों से कोई और फायदा नहीं हुआ है तो 25,000 रुपये की इस पूरी रकम पर कर देने से वह बच जाएंगे क्योंकि यह रकम 1 लाख रुपये की कर छूट सीमा से बहुत कम है। मगर यदि फंड कह देता है कि 25,000 रुपये की यह रकम असल में लाभांश है तो नियम के तहत उस रकम पर 10 फीसदी का लाभांश वितरण कर वसूल लिया जाएगा। राव सलाह देते हैं, ‘भविष्य में निवेशक कुछ साल तक नियमित या सिस्टेमैटिक निकासी योजना पर काम कर सकता है। योजना इस तरह बनाई जाएगी कि किसी भी एक वित्त वर्ष में शेयरों से होने वाला कुल मुनाफा 1 लाख रुपये से कम ही रहे ताकि निवेशक को उस पर एलटीसीजी कर चुकाने की जरूरत ही नहीं पड़े।’ निवेश सलाहकारों की राय यह भी है कि निवेशक जितनी जल्दी लाभांश विकल्प छोडक़र वृद्घि का विकल्प अपनाएंगे उतना ही अच्छा है क्योंकि अधिकतर इक्विटी फंडों ने 31 जनवरी के बाद से इकाई अंक में ही प्रतिफल दिया है। 

 

नियमित निकासी इक्विटी निवेश पर ही नहीं बल्कि डेट फंडों में भी कर की बचत के लिहाज से बेहतर है। डेट फंडों पर उपकर और अधिभार समेत कुल 28.33 फीसदी लाभांश वितरण कर लगता है। इक्विटी फंड में तो एलटीसीजी कर 1 साल तक यूनिट रखने के बाद ही लागू होता है, लेकिन डेट फंडों में अगर तीन साल पूरे होने से पहले निकासी कर ली जाती है तो उसे अल्पावधि पूंजीगत लाभ (एसटीसीजी) मान लिया जाता है और उस पर कर वसूल लिया जाता है। दोनों ही तरह के लाभ निवेशक की आय में जुड़ जाते हैं और निवेशक के आयकर स्लैब के अनुसार ही उन पर कर काट लिया जाता है। अगर कोई निवेशक 20 फीसदी या उससे कम के आयकर स्लैब में आता है और डेट फंड में वह लाभांश का विकल्प चुन लेता है तो उसे बहुत अधिक कर चुकाना पड़ेगा।

डेट फंडों में लाभांश का विकल्प केवल उन लोगों के लिए फायदेमंद या काम के होते हैं, जो सर्वाधिक आयकर दायरे में आते हैं और जो निवेश के पहले साल से ही नकदी हाथ में चाहते हैं। पॉजिटिव वाइब्स कंसल्टिंग ऐंड एडवाइजरी में पार्टनर और सलाहकार मल्हार मजूमदार ने कहते हैं, ‘अगर कोई निवेशक सर्वाधिक कर की श्रेणी (उपकर एवं अधिभार सहित 33.99 फीसदी) में आता है तो भी उसे प्रतिफल पर तकरीबन 5.7 फीसदी की बचत हो जाती है।’ अगर निवेशक निकासी पर कम से कम कर देना चाहते हैं तो उनके लिए मजूमदार का मशविरा बहुत आसान है - निवेश के तीन साल बाद नियमित यानी सिस्टेमैटिक निकासी की योजना शुरू कर दीजिए।
Keyword: Debt Fund, Fund, Mutual Fund, Investment, Company, Share market, Stock Exchange, Share,
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