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आज का सच: दोस्ताना पूंजीवाद या अरबपति राज

कनिका दत्ता /  August 12, 2018

राहुल गांधी शायद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने सबसे मजबूत एवं यकीन दिलाने वाला विपक्षी चेहरा न हों, लेकिन राहुल ने वर्ष 2015 में मोदी पर ‘सूट बूट की सरकार’ के जरिये जो हमला बोला था उसने निश्चित रूप से सरकार को उद्वेलित किया। दोस्ताना पूंजीवाद को लोकोक्ति के तौर पर पेश करने वाली राहुल की यह शब्दावली गत जुलाई में पेश अविश्वास प्रस्ताव के दौरान टेलीविजन चर्चाओं में भी खूब चर्चा में रही। यह उदारीकरण के बाद भारत की राजनीतिक अर्थव्यवस्था के बारे में असुविधाजनक सच को भी बयां करता है।

वह सच यह है कि आज भले ही लाइसेंस-राज खत्म हो चुका है लेकिन दोस्ताना पूंजीवाद जिंदा है। लाइसेंस एवं परमिट राज के दौरान फला-फूला सरकार और कारोबारी जगत का नाता थोड़े बदले रूप में अब भी कायम है। निश्चित रूप से कुछ प्रतीक बदल गए हैं और उनके चेहरे भी अब अधिक युवा नजर आते हैं।

मोदी भले ही चौकीदारी का दावा करते हों लेकिन 1991 के बाद बनी सभी सरकारें कमोबेश ऐसा दोस्ताना रवैया अपनाती रही हैं। वर्ष 1992 के एक नाटकीय संवाददाता सम्मेलन में सरकार पर उंगली उठाने वाले हर्षद मेहता को याद कीजिए। वर्ष 2000 के दशक के शुरुआती दौर में विनिवेश और दूरसंचार लाइसेंसिंग को लेकर फैली गड़बड़ी को याद कीजिए। इसी तरह संप्रग के दूसरे कार्यकाल में कोयला एवं दूरसंचार क्षेत्र में हुए घोटालों के बारे में सोचिए जिसने 2014 में संप्रग को लोकसभा चुनाव हारने की स्थिति में ला खड़ा किया। विजय माल्या की जमींदोज हो रही एयरलाइन पर बढ़ते कर्ज बोझ को भी जोड़ लीजिए। विमानन नीति में मददगार बदलावों का फायदा उठाते हुए ही माल्या इस स्थिति में पहुंचा था। ऐसे में मोदी आसानी से राहुल गांधी और उनकी पार्टी को यह जवाब दे सकते थे कि ‘अगर जूते फिट होते हों तो उन्हें पहन लेना चाहिए’।

अगर मौजूदा प्रधानमंत्री की मेहनत से बनी साफ छवि के बावजूद मौजूदा सरकार पर लगे आरोप टिके रहते हैं तो उसकी जड़ में आर्थिक सुधारों और कारोबारी सुगमता मानकों का नाकाफी होना ही है। ऐसा होने से भारतीय कंपनियां लगातार याचक की स्थिति में बनी रहती हैं (इसे लॉबीइंग के तौर पर भी जाना जाता है)। हमें यह ध्यान रखना होगा कि घोटालों की सबसे ज्यादा चपेट में आने वाले क्षेत्र वे हैं जो अब भी लाइसेंस प्रणाली या मूल्य नियंत्रण मानकों के तहत हैं। ऐसा नहीं है कि 1991 के बाद निजी क्षेत्र का विकास और विस्तार नहीं हुआ है। उदारीकरण के बाद से ही निजी क्षेत्र रोजगार पैदा करने वाला प्रमुख क्षेत्र रहा है और इस तरह राजनीतिक अर्थव्यवस्था में निजी क्षेत्र की भूमिका का जबरदस्त विस्तार हुआ है। सूचना प्रौद्योगिकी, ऑटोमोबाइल, होटल एवं आतिथ्य, रियल एस्टेट, स्वास्थ्य देखभाल, खुदरा, दूरसंचार, बैंकिंग और हाल में उभरा ई-कॉमर्स क्षेत्र उदारीकरण के बाद उभरे साहसी भारत के प्रतीक हैं। इसी वजह से देश के वित्त मंत्री बजट पेश करने के बाद सबसे पहले सीआईआई, एसोचैम और फिक्की जैसे उद्योग संगठनों के परिचर्चा सत्रों में ही पहुंचते हैं। मोदी का अर्थव्यवस्था में उद्योगपतियों की अहमियत को रेखांकित करना सही है। इसी से शायद यह पता चलता है कि मोदी अपने विदेश दौरों पर कारोबारियों का प्रतिनिधिमंडल लेकर क्यों जाते हैं जबकि बहुत पहले ही उन्होंने गैर-सरकारी मीडिया को साथ ले जाना बंद कर दिया था।

लेकिन बजट की कवायद आर्थिक गतिविधियों पर सरकारी वर्चस्व को रेखांकित करती है। कारोबारी समुदाय अब भी बजट का उसी बेसब्री से इंतजार करता है जैसा नब्बे के दशक से पहले करता था। हालांकि केवल कर प्रस्तावों के लिए ही नहीं बल्कि राजकोषीय घाटे के अनुमान और सरकार के उधारी कार्यक्रम पर उसके अंतर्निहित संकेतकों का अंदाजा लगाने के लिए बजट का इंतजार रहता है। नब्बे के दशक से पहले हमने बजट को कारोबारी समूहों के लिए शुल्क वृद्धि या कटौती से होने वाले लाभों की गणना के तौर पर सीखा था और आज भी वह कवायद जारी है।

आज यह सच है कि अमेरिका जैसी उन्नत अर्थव्यवस्थाओं में भी लॉबीइंग एक प्रमुख गतिविधि बन चुकी है। लेकिन राजनीतिक दलों को चंदा देने संबंधी सख्त प्रावधान होने और लॉबी करने वाले लोगों का बाकायदा पंजीकरण अनिवार्य होने से वहां पर काफी हद तक पारदर्शिता नजर आती है। इसके उलट भारत में चंदा देने वाले के खुलासे से संबंधित कानून सख्त नहीं हैं। इस सरकार ने राजनीतिक चंदे के लिए आरबीआई के बॉन्ड जारी करने का जो प्रस्ताव रखा है वह इतना निकम्मा है कि उसे गंभीरता से नहीं लिया जा सकता है। बड़े सौदों को अंजाम दिलाने वाले फिक्सरों और मौकापरस्तों का अब भी रायसीना हिल पर बने मंत्रालयों में दखल कायम है और उनके निशाने पर केवल रक्षा सौदे ही नहीं होते हैं। नेताओं और कारोबारी समुदाय दोनों के लिए दोस्ताना पूंजीवाद पर आधारित व्यवस्था की सुंदरता इस मायने में है कि यह दोनों को ही खंडन की छूट देती है, भले ही इस साथ के असर सार्वजनिक रूप से नजर आते हों। इसी से हमें पता चलता है कि यह संस्कृति क्यों फल-फूल रही है? लेकिन इसमें एक समस्या भी है: प्रश्रय देने वाला दोस्ताना जब तक किसी न किसी रूप में बना रहता है तब तक कारोबार का दायरा और आकार सिमटता जाएगा।

भारत के कारोबारी जगत के ढांचे में हम इस पहलू को देख सकते हैं जहां परिवारों के नियंत्रण वाले चुनिंदा कारोबारी समूहों का ही दबदबा रहा है। ऐसे ताकतवर प्रतिद्वंद्वियों के होने से छोटे एवं मझोले क्षेत्र को टिके रहने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती है। स्थानीय स्तर पर फैला भ्रष्टाचार उनकी समस्या को और बढ़ाता है। भारतीय आर्थिक ढांचे के मौजूदा दौर को जेम्स क्रैबट्री ने ‘अरबपति राज’ की संज्ञा दी है। ‘अरबपति राज’ दोस्ताना पूंजीवाद से कहीं अधिक बेहतर तरीके से मौजूदा हालात को बयां करता है। यह अलग बात है कि इसके चलते लंबी अवधि में भारत को बहुत कुछ गंवाना पड़ेगा।

Keyword: Information Technology, Automobile, Hotel, Real Estate, Healthcare, retail, Banking, Telecom, E-Commerce, Rahul Gandhi,
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