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उम्मीद जगाती रिपोर्ट

संपादकीय /  August 10, 2018

विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) विभिन्न देशों पर जो वार्षिक रिपोर्ट तैयार करते हैं, प्राय: नरमी के साथ लिखी जाती हैं और आलोचना को हरसंभव तरीके से मृदु बनाकर पेश किया जाता है। विनम्रता के आवरण में छिपे संदेश को पढऩे के लिए मेहनत करनी होती है। उस दृष्टिï से देखें तो इस वर्ष भारत को लेकर जारी की गई सालाना रिपोर्ट उम्मीदों से भरी हुई है। रिपोर्ट में सरकार के वृहद आर्थिक प्रबंधन और सुधार संबंधी उपायों को सराहा गया है। 

अनुमान जताया गया है कि आर्थिक वृद्घि में सुधार का सिलसिला अगले वर्ष भी जारी रहेगा और मध्यम अवधि में यह दर 7.75 फीसदी के आसपास रहेगी। गत वर्ष मुद्रास्फीति 17 वर्ष के निचले स्तर पर थी और मौद्रिक नीति के कदमों को भी सहमति प्रदान की गई। अर्थव्यवस्था का बाहरी खाते का घाटा दबाव में आ सकता है लेकिन चिंतित होने की कोई बात नहीं है क्योंकि भुगतान संतुलन की स्थिति बेहतर है। राजकोषीय गिरावट के तेज होने और मौद्रिक सख्ती जारी रहने को लेकर हल्की चेतावनी भरी बातें कही गई हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि देश में कारोबार करना सुगम हुआ है, विदेशी निवेश के नियम उदार हुए हैं, बुनियादी निवेश बढ़ रहा है, दिवालिया कानून प्रभावी ढंग से काम कर रहा है और वस्तु एवं सेवा कर का आगे चलकर सकारात्मक असर देखने को मिलेगा। हालांकि अभी भरपूर तेजी की बात कहना उचित नहीं होगा क्योंकि आर्थिक वृद्घि दर बीते दशक के औसत से अधिक नहीं है लेकिन मोदी सरकार को रिपोर्ट से प्रसन्न होना चाहिए।

रिपोर्ट में ऐसी बातों की सूची पेश की गई है जिन पर चुनाव के बाद सरकार को ध्यान देना होगा। श्रम सुधार, सरकारी बैंकों को मजबूत बनाना, बुनियादी ढांचा विकास, कृषि सुधार, मुद्रास्फीतिक दबाव पर नियंत्रण और राजकोषीय सुदृढ़ीकरण को मजबूत करना आदि इस सूची में शामिल हैं। संक्षेप में यह मोदी सरकार का अधूरा काम है।

कुछ आलोचना भी है। मसलन कुछ प्रमुख कृषि जिंसों को लेकर सुधार अपनाने के बजाय उनके न्यूनतम समर्थन मूल्य में इजाफा करना। नोटबंदी की भी सावधानी के साथ आलोचना करते हुए कहा गया है कि इसने वृद्घि दर पर असर डाला। यह गिरावट आरंभिक अनुमानों की तुलना में 1.8 फीसदी है। यह भी कहा गया कि कर राजस्व में वृद्घि के अलावा नोटबंदी का कोई अन्य फायदा देखने को नहीं मिला। भुगतान के डिजिटलीकरण, जनधन खातों के बैलेंस और जीडीपी के संदर्भ में नकदी आदि को लेकर कोई सफलता नहीं नजर आई। संगठित क्षेत्र में रोजगार बढ़ाने के बारे में भी साफ संकेत देखने को मिला। भूमि अधिग्रहण की दिक्कत के चलते परियोजनाओं को मंजूरी में देरी और पर्यावरण मंजूरी में देरी की बात कही गई। अगर वह रिपोर्ट हाल में बनी होती तो सरकार द्वारा हालिया शुल्क वृद्घि की बात भी इसमें शामिल होती। 

आलोचक श्रम सुधारों और भूमि अधिग्रहण कानून में सुधार में नाकामी के लिए सरकार की खिंचाई करना चाहेंगे। मुद्राकोष ने मौद्रिक नीति को जो समर्थन दिया है उस पर भी सवाल उठेंगे क्योंकि रुपया स्पष्ट तौर पर अधिमूल्यित है और निर्यात को नुकसान पहुंचा रहा है। आखिर में दोहरी बैलेंस शीट की समस्या को हल करने की बात करें तो सरकार मूल मुद्दे पर केंद्रित नहीं रह सकी है। वह है बैंकों की जोखिम के आकलन की आंतरिक क्षमता में सुधार और ऋण प्रबंधन में सुधार। यही वजह है कि अधिकांश सरकारी बैंकों के प्रबंधन नए ऋण को लेकर बेहद सतर्क हैं। उन्होंने कंपनियों को नया कर्ज देना लगभग बंद कर दिया है। मुद्राकोष ने सरकारी बैंकों के विनिवेश के बारे में भी कोई बात शायद ही की है।

मध्यम अवधि में 7.75 फीसदी की वृद्घि दर का आकलन बहुत प्रशंसापूर्ण लगता है क्योंकि यह दर पिछले दशक की 7.3 फीसदी की औसत से तेज है। परंतु जब लंबी अवधि के वृद्घि चक्र में अर्थव्यवस्था बेहतर स्थिति में है तो उसे 8-9 फीसदी की वृद्घि दर प्राप्त करनी चाहिए। पूर्वी एशिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं ऐसा कर रही हैं। भारत ने 2003 से 2011 तक 8 फीसदी की औसत वृद्घि दर हासिल की। परंतु वैश्विक अर्थव्यवस्था इसमें से अधिकांश वक्त तक औषधियों पर ही थी। दोहरी बैलेंस शीट की समस्या उसी समय उत्पन्न हुई थी। 8 फीसदी की सतत विकास दर अभी भी दूर है।

Keyword: World bank, IMF, annual report, Monetary policy, Mid term, economy, growth, reform, श्रम सुधार,
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